नई दिल्ली : ऐसा क्या बुरा बचा होगा, जो राहुल गांधी के बारे में नहीं कहा गया है। यहां तक कि राहुल गांधी के कारण कांग्रेस की मृत्यु की घोषणा भी हो चुकी है। नाकारेपन के हर पैमाने पर राहुल को खरा बताया गया है। उन पर लिखे गए तमाम विश्लेषणों को देखिए, आपको राहुल गांधी एक अभिशाप की तरह मिलेंगे। जानकार राहुल गांधी के बारे में अपनी तमाम बातों को लेकर जितने आश्वस्त नज़र आते हैं, उतने किसी नेता के बारे में नहीं होंगे। राहुल गांधी पर लिखे किसी भी लेख में उन्हें खारिज ही किया जाता है, उनका मज़ाक ही उड़ाया जाता है।
तमाम टिप्पणीकारों की बातों से ऐसा लगता है कि राहुल गांधी को नेता होने का अधिकार ही नहीं है। उन्हें 'मूर्ख' से लेकर 'विदूषक' तक कहा गया है। कम से कम कोई यह शिकायत नहीं कर सकता कि गांधी परिवार का होने के कारण किसी ने राहुल गांधी पर अंगुली नहीं उठाई। गांधी परिवार का होने के बावजूद और कारण भी राहुल गांधी की जो मज़म्मत हुई है, वह अपने आप में दुर्लभ और कई मायनों में सुखद राजनीतिक घटना है।
इसके लिए राहुल गांधी को अपने आलोचकों का शुक्रिया अदा करना चाहिए। कम से कम इन आलोचनाओं ने उन्हें शून्य से शुरुआत करने का एक शानदार मौका दिया है। सचिन तेंदुलकर जब शून्य पर आउट होते थे तो कमेंटेटर कहते थे कि उम्मीदों का दबाव नहीं झेल पाए होंगे। राहुल गांधी से तो कुछ करने की उम्मीद ही नहीं की जाती है।
बिना उम्मीद के माहौल में जीने का मौका मिले, इससे अच्छी बात क्या हो सकती है। समाज और राजनीति ने राहुल गांधी को एक मौका दिया है। वह उम्मीदों के बोझ से मुक्त हैं। राहुल गांधी सचिन तेंदुलकर की तरह शिकायत नहीं कर सकते कि दुनिया ने उन्हें उम्मीदों के बोझ से लाद दिया। अगर वह कभी राजनीति में पास हो गए तो ज़रूर आलोचना की इन कॉपियों को गर्व से देखेंगे कि दुनिया कभी मुझे फेलियर समझती थी। अक्सर फेल होते रहने वाले की कामयाबी इतिहास में बड़ी जगह पा जाती है। नाकामी का वैसे भी कोई इतिहास नहीं होता।
हिन्दुस्तान की राजनीति दुर्लभ किस्सों से भरी है। राजनीतिक दल से लेकर नेता तक न जाने कितने खारिज किए गए हैं। अटल बिहारी वाजपेयी, ममता बनर्जी, कांशीराम, मायावती, चंद्रबाबू नायडू। अनेक उदाहरण हैं, ताज़ा उदाहरण अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी का है। अनेक दल हैं, जिन्होंने शून्य से अपनी यात्रा की है, शिखर पर पहुंचे हैं और वापस शून्य पर आए हैं। बीजेपी दो सीटों पर पहुंच गई थी। तब अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी ने कैसे उन परिस्थितियों का सामना किया होगा, यह भी कभी-कभी सोचना चाहिए। कुछ हद तक नरेंद्र मोदी के बारे में भी सोचा जा सकता है, मगर आलोचनाओं को सहते हुए वह बारह साल तक मुख्यमंत्री के पद पर भी रहे हैं। बारह साल लगे नरेंद्र मोदी को मुख्यमंत्री से प्रधानमंत्री का दावेदार बनने में।
कांग्रेस क्यों हारी। क्या राहुल गांधी के होने की वजह से हारी या मनमोहन सिंह सरकार की नाकामी से या फिर हालात ही ऐसे थे, जिनमें कांग्रेस के लिए कुछ बचा नहीं था। सच-से लगने वाले भ्रष्टाचार के आरोप, महंगाई और नेताओं का अहंकार। ऐसी परिस्थिति में राहुल गांधी क्या कर लेते कि वह विजेता बन जाते। अगर नेता ही विजय रचता है तो फिर दिल्ली में क्यों नहीं बीजेपी ने जीत रच दी। शानदार बहुमत हासिल करने से पहले बीजेपी ने अपनी पार्टी के भीतर क्या बदलाव किया था, जो राहुल गांधी नहीं कर रहे हैं। क्या बीजेपी लोकतांत्रिक हो गई। क्या बीजेपी में चयन की प्रक्रिया पारदर्शी हो गई।
फिर भी कई मामलों में बीजेपी नेता-संपन्न पार्टी है। आज सभी को सिर्फ नरेंद्र मोदी दिखते हैं, लेकिन इस पार्टी में हर स्तर पर इतने नेता हैं कि कभी भी इनमें से कोई शिखर पर आकर चुनावी रथ संभाल सकता है। कम से कम आरएसएस का मज़बूत बिछौना तो है ही। कांग्रेस के पास कुछ नहीं है। एक विचारधारा थी, जिसे लेकर सब कन्फ्यूज़ हैं। विचारधारा की बात आते ही कांग्रेस और बीजेपी एक लगने लगती हैं। हर पार्टी बंद दरवाज़े की तरह चलती है। एक भी पार्टी नहीं है, जो इससे अलग तरीके से चलने का दावा कर सके।
राहुल गांधी अब विरासत के बोझ से मुक्त हैं। ऐसी मुक्ति तो इंदिरा, राजीव और सोनिया को भी नहीं मिली थी। उनके सामने एक बड़ा सा शून्य है, जिसमें अपने और अपनी पार्टी के लिए एक शिखर खोजना है। मुझे पता है कि राहुल गांधी की सहानुभूति में कोई लेख लिखना किसी जोखिम से कम नहीं है। किसी के कमज़ोर वक्त में हिंसक नहीं होना चाहिए। मुझे कमज़ोर लोगों का अध्ययन करना अच्छा लगता है। असली मज़बूत वह होता है, जो अपनी कमज़ोरी से लड़ पाता है।
मुझे लगता है कि अब राहुल गांधी को छोड़ दिया जाना चाहिए। दिल्ली चुनाव में व्हॉट्सऐप के लतीफेबाज़ों ने राहुल गांधी को चुपचाप विदाई दे दी। राहुल गांधी के कारण जिन-जिन के नाम पप्पू हैं, उन सभी पर क्या गुज़री होगी, समझ सकता हूं। ऐसा नहीं कि पप्पुओं और बबलुओं ने कमाल नहीं किया है। लोकसभा चुनाव के समय हर लतीफा राहुल गांधी पर होता था। दिल्ली चुनाव में हर दूसरा लतीफ़ा प्रधानमंत्री को लेकर बन रहा था। व्हॉट्सऐप की तरह राहुल गांधी को छोड़ देने का वक्त आ गया है।
राहुल गांधी को उत्तराखंड के खुले आसमान के नीचे लेटने दीजिए। उन किस्सों के साथ करवटें बदलने दीजिए, जिन तक हम और आम जनता कभी नहीं पहुंच पाते हैं। सत्ता की उन नाइंसाफियों के साथ जागने दीजिए, जिसके साथ जीते-जीते नेता जनता की तकलीफों को देख गहरी नींद लेने लगते हैं। पंद्रह-बीस दिनों तक उस सफेद तंबू में लेटे-लेटे राहुल गांधी को सत्ता की स्याह रातों के कुछ नोट्स बनाने दीजिए।
अगर वह चुनाव जीतने की कोई अचूक रणनीति लेकर लौटते हैं तो यकीन जानिए कि यह छुट्टी बेकार गई। कांग्रेस को रणनीतिकार नहीं चाहिए, नेता चाहिए, जो संसद में एक सामान्य नेता की तरह बोलता हो, प्रेस के सवालों का सामना करता हो, सड़कों पर भारत को खोजने के लिए नहीं, भारत को जीने के लिए जाता हो। रात को जब पहाड़ सो जाते हैं, तो आसमान जागते हैं। बहुत सारे तारों के बीच ध्रुव तारा खोज लेने का जुनून ब्रह्मांड के विराट का दर्शन करा देता है। उम्मीद है, राहुल गांधी इस राजनीति का ध्रुव सत्य फिर से समझ कर आएंगे, जिससे वही नहीं, उनकी कांग्रेस भी बहुत दूर चली गई है।
This Article is From Feb 25, 2015
रवीश कुमार : स्याह रातों के नोट्स बनाते राहुल गांधी
Ravish Kumar
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Updated:फ़रवरी 25, 2015 17:59 pm IST
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Published On फ़रवरी 25, 2015 17:53 pm IST
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Last Updated On फ़रवरी 25, 2015 17:59 pm IST
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