क्या आपने भी महंगाई प्रतिरोधक टीका लगवाया...?

यह पहली बार हुआ है, जब एक राजनीतिक वर्ग के रूप में महंगाई के सपोर्टर का उदय हुआ है. महंगाई के ये सपोर्टर कहीं भी आराम से महंगाई के पक्ष में तरह-तरह की दलीलें देते हैं और शास्त्रार्थ जीत जाते हैं.

महंगाई मुद्दा तो है लेकिन महंगाई राजनीतिक मुद्दा नहीं है. इस फर्क को समझ लेने से महंगाई पर बात करना आसान हो जाता है. यह पहली बार हुआ है, जब एक राजनीतिक वर्ग के रूप में महंगाई के सपोर्टर का उदय हुआ है. महंगाई के ये सपोर्टर कहीं भी आराम से महंगाई के पक्ष में तरह-तरह की दलीलें देते हैं और शास्त्रार्थ जीत जाते हैं. कई बार इनकी ताक़त के कारण भी लोग शास्त्रार्थ हार जाते हैं. महंगाई के सपोर्टरों का सबसे बड़ा योगदान यह है कि उन्होंने महंगाई को राजनीतिक मुद्दा नहीं बनने दिया. लोगों की जेब से कमाई रेत की तरह सरक रही है, लेकिन जुबान पर महंगाई के विरोध में वैसा नारा तो कत्तई नहीं है जैसा हुआ करता था. अगर प्रधानमंत्री को महंगाई पर बात करनी थी या पेट्रोल डीज़ल पर बात करनी थी तो क्या उन्हें अलग से इसकी बैठक नहीं बुलानी चाहिए थी, कोविड की बैठक में पेट्रोल की बात हो गई, कहीं ऐसा तो नहीं कि महंगाई की बहस किसी और दिशा में मुड़ जाए, इसके लिए यह सब किया गया.

आपने सरकार से कहा कि हमें जिस चांद का वादा किया था, वह चांद कहां है, तब सरकार ने दूरबीन की दिशा मोड़ दी और कहा कि अब तारे देखो, आसमान तो तारों से भरा है. हर तारा अपने आप में चांद है. दूरबीन का मोड़ देना ही बहस की दिशा मोड़ देना है. आप तारों को कोसने लग जाते हैं कि इनके कारण आसमान में चांद ढंक गया है. महंगाई पर चर्चा नहीं महंगाई को लेकर बीजेपी बनाम गैर बीजेपी राज्यों की चर्चा है. 

पेट्रोल और डीज़ल के दाम बढ़े हैं. क्या वो केवल राज्यों के टैक्स के कारण बढ़े हैं? केवल गैर बीजेपी राज्यों के टैक्स के कारण बढ़े हैं? क्या केंद्र सरकार के टैक्स के कारण नहीं बढ़े? जैसे आप हिन्दू मुस्लिम डिबेट में उलझा दिए जाते हैं, ठीक वैसे ही पेट्रोल डीज़ल को लेकर केंद्र बनाम राज्य के डिबेट में उलझा दिए गए हैं और राज्यों में बीजेपी बनाम गैर बीजेपी के डिबेट में उलझा दिए गए हैं ताकि आप यह बात ही भूल जाएं कि पेट्रोल कितना सस्ता होना चाहिए. 

याद कीजिए जब पेट्रोल 70 रुपया हुआ था, तब भारत बंद तक हो गया था. आप कितने गुस्से में थे. आपने तब भी सब्र किया जब पेट्रोल 80 रुपया लीटर हुआ. 90 रुपया लीटर हुआ और फिर पिछले साल 100 रुपया लीटर हो गया. तब से 100 रुपया लीटर बेस प्राइस बना हुआ है. अब आपको यह न दिखे इसलिए 111 बनाम 121 के रेट के झगड़े में उलझाया जा रहा है. ताकि आप चांद छोड़ कर तारों को देखने लग जाएं और गिनने लगें कि कहां 103 है, कहां 107 है और कहां 121 है. जब 2012 में 70 रुपया हुआ तब लोग सड़कों पर आ गए. संतों ने एलान किया कि पेट्रोल इससे भी कम होगा. उस समय आपको 70 कितना बड़ा लगता था. शायद आज के 100 से भी बड़ा. जब से आप महंगाई के सपोर्टर हुए हैं मुझे तो लगता है कि अब आपको 100, 70 रुपये लीटर से छोटा लगता है. अगर आप महंगाई के सपोर्टर हैं तो शर्तिया बता सकता हूं कि आपको 100 रुपया लीटर छोटा दिखेगा. तभी तो जिन्होंने 70 रुपया लीटर को बहुत ज्‍यादा माना था उन्हें अब इस सवाल से ही फर्क नहीं पड़ता. अगर महंगाई के सपोर्टर न होते तो क्या वे ऐसा कह सकते थे? 

बहसोत्पादन नया सकल घरेलु उत्पादन है. महंगाई कम मत करो, महंगाई को लेकर डिबेट पैदा कर दो. मार्च के महीने में महंगाई 17 महीने के अधिकतम स्तर पर पहुंची तब क्या प्रधानमंत्री ने बात की? पिछले साल मई से लेकर अक्टूबर भर आप पेट्रोल के बढ़े हुए दाम देते रहे तब क्या प्रधानमंत्री ने टैक्स को लेकर कोई डिबेट की? आपको याद है 2012 में प्रधानमंत्री जब मुख्यमंत्री थे तब क्या कहा करते थे?

महंगाई से जनता परेशान है. कमाई कम हो गई है. लोग हमें भी लिख रहे हैं कि फीस नहीं दे पा रहे मगर वही लोग महंगाई के राजनीतिक सपोर्टर भी हैं. इस बहस से हुआ कुछ नहीं, लेकिन लोगों में ऊर्जा आ गई है. मोर्चे खुल गए हैं. बीजेपी और केंद्र के मंत्रियों ने बकायदा चार्ट बनाकर ट्विट करना शुरू कर दिया कि किस राज्य में पेट्रोल के क्या भाव हैं, कितने टैक्स हैं.

बीजेपी ने अपने ट्विटर हैंडल से एक पोस्टर को ट्विट किया है. इस चार्ट में 10 राज्यों में पेट्रोल और डीज़ल के दाम हैं. इन दस राज्यों में आठ गैर बीजेपी राज्य हैं जहां पर टैक्स बहुत ज़्यादा है. इस सूची में बीजेपी शासित मध्य प्रदेश और बिहार भी शामिल हैं. पूरी सूची में न्यूनतम रेट 111 रुपये प्रति लीटर है और अधिकतम 121 रुपये प्रति लीटर से अधिक है. क्या मध्य प्रदेश और बिहार ने अपने टैक्स घटा दिए, रेट कम कर दिए? एक अन्य ट्विट में हरदीप पुरी ने कहा है कि भाजपा-शासित राज्यों में पेट्रोल और डीजल पर VAT ₹14.50 से ₹17.50/लीटर के रेंज में है, जबकि अन्य दलों द्वारा शासित राज्यों द्वारा लगाए गए कर ₹26 से ₹32/लीटर की रेंज में है. अंतर स्पष्ट है. उनका इरादा केवल विरोध और आलोचना करना है, आम लोगों को राहत देना नहीं.

पेट्रोलियम मंत्री हरदीप पुरी ने आरोप लगाया है कि गैर बीजेपी सरकारें विदेशी शराब पर टैक्स कम करती हैं और पेट्रोल डीज़ल पर नहीं, लेकिन क्या यह उदाहरण ठीक है? फिर तो आपको देखना होगा कि शराब पर किस राज्य ने कितना टैक्स लगाया है तब बहस एक और दिशा में चली जाएगी. दिव्य भास्कर ने लिखा है कि मध्य प्रदेश की तुलना में गुजरात में पेट्रोल 13-14 रुपया सस्ता है. यह कैसे हो रहा है जिस राज्य में शराब पर टैक्स नहीं है वहां पेट्रोल शराब पर टैक्स वाले राज्य से 13 रुपया सस्ता है जबकि दोनों बीजेपी की सरकार है. इस बहस को लेकर यह सोचना चाहिए कि महंगाई तो केवल पेट्रोल और डीज़ल के कारण नहीं है, वह भी कारण है लेकिन यह तो 2019 के आधे हिस्से के बाद से है जब खुदरा महंगाई की दर 6.3 प्रतिशत हो गई थी. 

इस बहस के ज़रिए केवल टैक्स रेट में लोगों को उलझाने की कोशिश लगती है. जबकि टैक्स काा मसला जाकर जुड़ता है कि पेट्रोल और डीज़ल से केंद्र जो राजस्व वसूलता है उसमें से कितना हिस्सा राज्यों को देता है, केंद्र पहले से तीन गुना राजस्व वसूलता है तो क्या राज्यों का तीन गुना हिस्सा बढ़ा है? केंद्र को बकायदा चार्ट देकर बताना चाहिए कि 2014 में पेट्रोल और डीज़ल से हुए कर संग्रह में से राज्यों को कितना हिस्सा मिलता था और अब कितना मिलता है. तभी पता चलेगा कि राज्य क्यों टैक्स बढ़ाने के लिए मजबूर हैं? 

सांसद शिशिर कुमार अधिकारी ने सरकार से एक सवाल किया. इस सवाल पर ग़ौर कीजिएगा कि 2014 में ईंधन पर टैक्स प्रति लीटर 9 रुपये 48 पैसे था, उसमें से राज्यों को 3 रुपये 3 पैसे दिए जाते थे, अगर सही है तो डिटेल दीजिए. 2021 में ईंधन पर टैक्स 32 रुपये 9 पैसे लिए जा रहे थे लेकिन राज्यों को केवल 57 पैसे दिए जा रहे हैं, अगर ऐसा है तो डिटेल दें. इसे ऐसे समझिए. 2014 में 100 रुपये टैक्स में से राज्यों को 32 रुपये मिल रहे थे, 2021 में 2 रुपया मिलने लगा..

यह सवाल बेहद अहम है. इसके जवाब में 20 दिसंबर 2021 को वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने 2014 का हिसाब तो बताया कि 4 तरह के टैक्स लगते थे. इन चारों में एक टैक्स है बेसिक एक्साइज़ ड्यूटी जो कुल टैक्स में एक रुपया 20 पैसा है. इससे जो संग्रह होता है वह राज्यों के साथ साझा किया जाता है. उस समय 12 प्रतिशत तक साझा किया जाता था. तब टोटल टैक्स 10 रुपया था जो 2021 में 27रुपये 90 पैसे हो गया. केंद्र का टैक्स तो बढ़ा लेकिन राज्यों का हिस्सा कितना बढ़ा इस सवाल का जवाब वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने साफ नहीं दिया है. 

यह बेहद महत्वपूर्ण मुद्दा है.इसके जवाब से ही पता चलेगा कि राज्य सरकारें क्यों टैक्स बढ़ा रही हैं? केंद्र क्यों राज्यों को कम पैसा दे रहा है? 2014 के बाद से केंद्र सरकार ने उत्पाद शुल्क में काफी बढ़ोत्तरी की है लेकिन आरोप लगता है कि राज्यों का हिस्सा काफी घट गया है. 

क्या राज्यों को टैक्स इसलिए भी बढ़ाना पड़ा क्योंकि जीएसटी के कारण उनके पास टैक्स का स्कोप कम हुआ, जीएसटी का जो हिस्सा केंद्र से मिलना था, उसमें देरी हुई और समय पर नहीं मिला? महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने कहा कि उनका राज्य पेट्रोल और डीज़ल पर टैक्स नहीं घटाएगा क्योंकि केंद्र ने जीएसटी का बकाया नहीं दिया है. महाराष्ट्र का कहना है कि केंद्र पर जीएसटी का 26, 500 करोड़ बाकी है. तमिलनाडु का भी कहना है कि 13000 करोड़ से ज्यादा बाकी है. 

बीजेपी शासित राज्यों में पेट्रोल 103 रुपये लीटर से लेकर 118 रुपये लीटर तक है. क्या ये सस्ता है? बीजेपी शासित बिहार और मध्य प्रदेश में 118 रुपये लीटर पेट्रोल मिल रहा है. क्या ये सस्ता है? क्या पटना के लोग यह मान लेंगे कि उनके यहां पेट्रोल सस्ता हो गया है क्योंकि गैर बीजेपी शासित आंध्र प्रदेश में पेट्रोल 121 रुपया लीटर से अधिक है.  

जो बात पकड़ कर रखने वाली है वह यह कि सरकार किसी भी दल की हो, हर जगह पेट्रोल 100 रुपये लीटर से महंगा मिल रहा है. आपका भला किसी भी सरकार में नहीं हो रहा है. बड़ी चालाकी से आपको 111 बनाम 121 रुपये लीटर की बहस में उलझाया जा रहा है ताकि इस बीच 100 रुपया लीटर नया सस्ता बनकर स्थापित हो जाए. कांग्रेस का कहना है कि 2014 में पेट्रोल पर एक्साइज़ ड्यूटी 9 रुपये 48 पैसे थी जो 2021 में 27 रुपये 90 पैसे हो गई. तीन गुना ज्यादा हो गई. डीज़ल पर भी एक्साइज़ ड्यूटी तीन गुना अधिक हो चुकी है.

केंद्र सरकार को बताना चाहिए कि उसने ईंधन पर एक्साइज़ ड्यूटी इतनी क्यों बढ़ाई और उसमें केवल पांच रुपये की कमी ही क्यों की गई? 19 जुलाई 2021 में केंद्र ने लोकसभा में बताया था कि 2 फरवरी 2018 को पेट्रोल पर एक्साइज़ ड्यूटी 19 रुपये 48 पैसे थी. 6 मई 2020 को पेट्रोल पर एक्साइज़ ड्यूटी 34 रुपये 19 पैसे थी (32.98). दो साल में एक्साइज़ ड्यूटी 78 प्रतिशत बढ़ गई. 

क्या तब इस तरह से बीजेपी और केंद्र सरकार ने आगे आकर बहस की थी कि दो साल में एक्साइज़ ड्यूटी 78 प्रतिशत क्यों बढ़ानी पड़ी? 6 मई 2020 को सरकार ने एक झटके में एक्साइज़ ड्यूटी में 10 रुपये की वृद्धि कर दी थी. 22 रुपये 98 पैसे से बढ़ाकर 32 रुपये 98 पैसे कर दिया. करीब 43 प्रतिशत की वृद्धि थी. उस समय कोरोना के कारण आपको राहत की ज़रूरत थी लेकिन सरकार टैक्स बढ़ा रही थी वह भी तब जब अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल का भाव काफी गिर गया था. प्रधानमंत्री गैर बीजेपी राज्यों पर टैक्स न घटाने का आरोप मढ़ रहे हैं.

नवंबर 2021 में केंद्र सरकार ने एक्साइज़ ड्यूटी में कमी की थी, 2014 से 2021 के बीच एक्साइज़ ड्यूटी करीब 10 रुपये से 28 रुपये हो गई उसमें से पांच रुपये की कमी हुई. 18 रुपये बढ़ाकर 5 रुपये कम करना कितनी बड़ी मेहरबानी है, यह पता ही नहीं चलता अगर आप महंगाई के सपोर्टर न होते. एक तर्क दिया जा रहा है कि 2014 से 21 के बीच एक्साइज़ ड्यूटी से 26 लाख करोड़ से अधिक की वसूली हुई और इस दौरान विकास पर 90 लाख करोड़ से अधिक खर्च हुए. क्या ये पूरा जवाब है? क्या बाकी राज्यों ने पेट्रोल डीज़ल से टैक्स लेकर गंगा में डाल दिया? उन्होंने विकास नहीं किया? देश के विकास के लिए कॉरपोरेट टैक्स क्यों नहीं बढ़ाया जाता है, पेट्रोल और डीज़ल पर टैक्स ही क्यों बढ़ाया जाता है. आपको याद होगा कि 2019 में कॉरपोरेट टैक्स घटाया था तब कहा गया था कि इससे सरकार को सवा लाख करोड़ से अधिक का टैक्स घाटा सहना पड़ेगा. क्या एक्साइज़ ड्यूटी इसलिए भी बढ़ी क्योंकि कारपोरेट टैक्स में कमी की गई थी? 

22 मार्च 2021 को सरकार ने लोकसभा में जो बताया है उसे इस तरह से समझिए. 2013 में सरकार 100 रुपया राजस्व आता तो उसमें से ईंधन से 4.5 रुपया आता था. तीन साल के भीतर ईंधन से 13.3 रुपया आने लगा. 200 प्रतिशत बढ़ गया. इस पूरी बहस को एक सिम्पल सवाल में समेट दिया गया है ताकि आप बीजेपी बनाम गैर बीजेपी राज्य के टैक्स को लेकर डिबेट करें, और महंगाई, कमाई और घटती बचत के सवालों की नौबत ही न आए. 

आपको याद होगा चारों तरफ मुफ्त टीका का पोस्टर लगा. धन्यवाद मोदी जी का पोस्टर लग गया. आप समझे कि मुफ्त है फिर सरकार के मंत्री ने कहा कि इस मुफ्त के लिए पेट्रोल पर टैक्स बढ़ा है. एक हिसाब कीजिए, जितना पैसा आपने इस टैक्स के कारण पेट्रोल पर दिया, वह वैक्सीन के हज़ार रुपये से कम था या ज्यादा था. सस्ता क्या पड़ता, हज़ार रुपये का टीका या दस हज़ार का पेट्रोल. आपसे टीके का पैसा भी लिया गया और टीके को मुफ्त भी कहा गया.

महंगाई के सपोर्टर बनने का एक सबसे बड़ा फायदा यह है कि पैसा भले खर्च हो जाए, दिमाग़ खर्च नहीं होता है. अब तो मुफ्त टीका नहीं है. फिर भी देश भर में 100 रुपया लीटर से अधिक पेट्रोल मिल रहा है. और अब तो बूस्टर डोज़ के लिए आप पैसे भी दे रहे हैं और पेट्रोल के महंगे दाम भी दे रहे हैं. इस दौरान लगता है कि आपके भीतर विकास के नाम पर महंगाई का सपोर्ट करने की राजनीतिक योग्यता का ख़ूब विकास हुआ है.

पिछले साल अक्तूबर में अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल का भाव 83.54$ प्रति बैरल था तब भी आप 100 रुपया लीटर पेट्रोल खरीद रहे थे, बल्कि बेंगलुरू में 109.53 था, इस समय अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल का भाव 104.9 है. तब बेंगलुरु में 111.09 प्रति लीटर है.

137 दिनों तक जब तक चुनाव था, पेट्रोल डीज़ल का दाम नहीं बढ़ा, चुनाव बीत गया तो अब गैर बीजेपी राज्यों के टैक्स का मुद्दा खड़ा कर दिया गया है. जैसे कि बीजेपी के राज्यों में तेल पहले की तरह 80 रुपया लीटर मिल रहा है. हमें याद रखना चाहिए कि पिछले साल नवंबर में एक्साइज़ ड्यूटी कम की गई थी उसके बाद भी महामारी के पहले के टैक्स से तुलना करें तो पेट्रोल पर 8 रुपया प्रति लीटर टैक्स ज्यादा था. डीजल पर 6 लीटर प्रति लीटर ज्यादा. 

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इस पूरी बहस से आम आदमी को निकाल दिया गया है. राजनीतिक दलों और उनकी सरकारों को लाकर बहस को कहीं और ले जाया गया है. आम आदमी इस महंगाई को केवल केंद्र के हिसाब से नहीं देखता, केवल राज्य के हिसाब से नहीं देखता है. महंगाई का दर्द राजनीतिक यथार्थ से अलग हो चुका है.