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This Article is From Sep 14, 2017

बुलेट ट्रेन को प्राथमिकता कितनी सही? रवीश कुमार के साथ प्राइम टाइम

Ravish Kumar
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    सितंबर 15, 2017 01:10 am IST
    • Published On सितंबर 14, 2017 21:15 pm IST
    • Last Updated On सितंबर 15, 2017 01:10 am IST
नमस्कार मैं रवीश कुमार, ऑल इंडिया पेट्रोल पंप फेडरेशन के अध्यक्ष अजय बंसल ने बताया कि भारत भर में पिछले एक महीने में पेट्रोल की बिक्री में 4 फीसदी की कमी आ गई है और डीज़ल की बिक्री में 10 प्रतिशत की कमी आ गई है. दिल्ली में ही पेट्रोल की बिक्री में 10 प्रतिशत की कमी आई है. क्या पेट्रोल डीज़ल के बढ़ते दामों के कारण लोगों ने ख़रीदना बंद कर दिया है? 70 रुपये से अधिक पेट्रोल ख़रीदने की सहनशीलता बुलेट ट्रेन के उत्साह के कारण और भी बढ़ गई है. बुलेट ट्रेन के समर्थन और विरोध में दिए जाने वाले कई तर्कों में समस्या है. अगर हम वाकई इतने गंभीर थे तो शिलान्यास से पहले इस पर चर्चा करते कि एक ट्रैक पर सवा लाख करोड़ ख़र्च कर रहे हैं जबकि काकोदकर कमेटी ने कहा था कि मौजूदा रेल पटरियों के पूरे ढांचे को ठीक करने के लिए एक लाख करोड़ चाहिए. इस ज़रूरी काम के लिए पैसा नहीं आ सका. 

2022 में चलने वाली यह बुलेट ट्रेन भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जापान के प्रधानमंत्री शिंज़ो आबे की दोस्ती की मिसाल है. 350 किमी प्रति घंटे की रफ्तार के कारण अहमदाबाद से कोई ढाई तीन घंटे में मुंबई पहुंच जाएगा. मीडिया रिपोर्ट में अनुमानित भाड़े का रेंज 3000 से 5000 रुपया बताया जा रहा है. फर्स्ट पोस्ट में एन आर मोहंती ने लिखा है कि जापान में एक घंटे का किराया 100 डालर यानी 4751 रुपया है. अहमदाबाद से मुंबई के बीच दो घंटे से ज्यादा के सफर का किराया 13000 से कम में नहीं होगा. मोहंती ने लिखा है कि जापान में प्रति व्यक्ति आय 32 लाख 12 हज़ार से अधिक है. जापानी एक घंटे का किराया 100 डॉलर दे सकते हैं. भारत में इस वक्त प्रति व्यक्ति आय इस वक्त मात्र 1500 डॉलर है यानी 96,382 रुपया है. ज़मीन आसमान का अंतर है. क्या भारतीय 200 डॉलर यानी एक तरफ की यात्रा का 13000 रुपया दे सकते हैं. कितने लोग देंगे. इन सवालों को आप मज़ाक में नहीं उड़ा सकते हैं. टीवी पर चलने वाली यह तस्वीर आम लोगों को सपने दिखा रही है लेकिन इसमें चलेगा कौन, यह आम लोगों को नहीं बताया जा रहा है. इसमें कोई शक नहीं कि बुलेट ट्रेन एक नया ईवेंट और नया सपना है जिसे देखने और दिखाने की होड़ मच जाएगी. नोटबंदी की तरह रातों रात बुलेट ट्रेन का फैसला नहीं किया गया है. कई साल से इस रूट पर सर्वे चल रहा था. तब मोदी रेलमंत्री नहीं थे इसलिए यह कहना ठीक नहीं कि गुजरात के चुनावों के कारण बुलेट ट्रेन अहमदाबाद से मुंबई के बीच चलने जा रही है. 
VIDEO: बुलेट ट्रेन पर प्राइम टाइम
कई लोग सवाल पूछने पर कहते हैं कि इतना पोज़िटिव हो रहा है, निगेटिव बात क्यों कर रहे हैं. सही बात है, लेकिन डाक्टर जब आपसे जांच रिपोर्ट लेता है तो देखता है कि कहीं पोज़िटिव रिज़ल्ट तो नहीं आ गया. पोज़िटिव मतलब बीमारी सही पाई गई है. इसलिए बुलेट ट्रेन से किसका भला होगा यह सवाल निगेटिव सवाल नहीं है. 

90 के दशक के आख़िरी हिस्से में फ्लाईओवर ने रफ्तार और जाम से मुक्ति का सपना दिखाया था. नेताओं ने फ्लाईओवर खूब बनवाए और ठेकेदारों ने राष्ट्रनिर्माण के नाम पर अपना निर्माण कर लिया. अपवाद छोड़ दें तो ज़्यादातर फ्लाईओवर शहर को जाम से मुक्त कराने में नाकाम रहे हैं. आज दिल्ली में 90 से अधिक फ्लाईओवर बन जाने के बाद भी जाम की वही स्थिति है. फ्लाईओवर के ऊपर जाम लगा करते हैं. हालत यह है कि परिवहन मंत्री नितिन गडकरी का बयान छपा है कि उन्होंने दिल्ली को जाम से मुक्ति दिलाने के लिए 50,000 करोड़ का रोड मैप बनाया है. दिल्ली में ही मेट्रो के तीन चरणों की लागत 70 हज़ार करोड़ से अधिक है. 200 किमी मेट्रो लाइन बिछ जाने के बाद भी दिल्ली में 50,000 करोड़ चाहिए जाम से मुक्ति के लिए. आप कह सकते हैं कि ये न होता तो दिल्ली की स्थिति भयानक होती, शायद ठीक भी है, लेकिन इनके होने के बाद भी क्या दिल्ली की स्थिति भयानक नहीं है. सुबह सुबह आप रेडियो आन कीजिए, हर एफ एम पर जाम की त्राही त्राही वर्णन चल रहा होता है. इसलिए हम जिस चक्र में फंसे हैं उससे निकलने का रास्ता कोई नहीं बताता, है भी तो कोई उस पर नहीं चलना चाहता. 

शहर के बीच के ट्रांसपोर्ट और दो शहरों के बीच के ट्रांसपोर्ट की तुलना नहीं की जा सकती. बुलेट ट्रेन लंबी दूरी के दो शहरों के बीच की बात है. चीन में भी बुलेट ट्रेन का विशाल नेटवर्क है. लेकिन कहा जाता है कि चीन में आम लोग साधारण ट्रेन में ही चलना पसंद करते हैं या बुलेट ट्रेन में चलना सबके बस की बात नहीं है. बुलेट ट्रेन ने चीन की अर्थव्यवस्था को खूब चूसा है. यूरोप के कई अमीर देशों में बुलेट ट्रेन का आइडिया छोड़ दिया है. जर्मनी ने भी सोचा मगर छोड़ दिया. अमरीका में भी इसे लेकर काफी चर्चा हुई है. जब वे लोग जिनकी प्रति व्यक्ति आय भारत से अधिक है बुलेट ट्रेन को लेकर उत्साहित नहीं हैं, भारत क्यों हैं. फ्रांस ने 2008 में अर्जेटिना को बुलेट ट्रेन के लिए लोन दिया था. लेकिन वहां विरोध होने लगा कि इससे कोई लाभ नहीं. अर्जेंटिना अब चीन की मदद से अपने नेटवर्क को बेहतर कर रहा है और बुलेट ट्रेन का आइडिया छोड़ चुका है. इससे पूरे देश के नेटवर्क को लाभ मिल रहा है और खर्चा भी कम हो रहा है. लेकिन यह भी सही है कि जापान में बुलेट ट्रेन का नेटवर्क सफल है. इसके कारण टोक्यो शहर में दूर दूर से लोग आते हैं. कंपनियां बुलेट ट्रेन के किराये का खर्चा भी देती हैं. जापान का अनुभव पचास साल का होने जा रहा है. अगर नाकामी के उदाहरण हैं तो जापान की कामयाबी से भी सीखा जा सकता है. 

सवाल इसलिए पूछा जाना चाहिए कि कहीं हम योजनाएं बनाते वक्त सपनों को बेवजह बड़ा तो नहीं कर देते हैं या फिर सपना बड़ा लगे इसलिए सिंबल यानी प्रतीक के लिए कोई योजना तो नहीं बनाने लगे हैं. 

2007 में इसी गुजरात के गांधीनगर से कुछ दूरी पर एक इंटरनेशनल फाइनेंस सेंटर बनाने की कल्पना की गई. गिफ्ट शहर के लिए 886 एकड़ की ज़मीन की पहचान हुई और करीब 80,000 करोड़ का बजट रखा गया. दस साल बीत जाने के बाद करीब 2000 करोड़ रुपये ही खर्च हुए हैं. मात्र ढाई प्रतिशत ही खर्च हुआ है. बाकी का पैसा कहां से आएगा, कब तक आएगा और कब यह प्रोजेक्ट पूरा होगा, राम ही जानते होंगे. शुरूआत में गिफ्ट के नाम पर स्मार्ट सिटी का सपना बेचा गया और यहां से दो लाख करोड़ के बिजनेस होने का दावा किया गया. पिछले साल प्रधानमंत्री ने हीरानंदानी की बनाई इमारत में इंटरनेशनल स्टाक एक्सचेंज का उदघाटन किया था. ढाई लाख वर्ग मीटर की इस इमारत में मात्र 25 फाइनांस कंपनियों के दफ्तर खुल पाए हैं. धीरे धीरे कर एक एक कंपनियां आ रही हैं. बड़ी संख्या में जगह ख़ाली है. योजना तो दस लाख लोगों को नौकरियां देने की थी, आप पूछ सकते हैं कि दस साल में कितने लोगों को गिफ्ट ने रोज़गार दिया. पूछने से पहले सोशल मीडिया का अकाउंट बंद कर दीजिएगा वर्ना ट्रोल हालत खराब कर देंगे. गिफ्ट की डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट की शर्तों के अनुसार अहमदाबाद एयरपोर्ट को भी हटाना पड़ेगा जो कि फिलहाल संभव भी नहीं लगता. 

2007 में गुजरात में गिफ्ट और केरल के कोच्चि में स्मार्ट सिटी की बुनियाद रखी गई थी. दस साल में भी स्मार्ट नहीं बन सके. 15 मार्च 2015 में अहमदाबाद में मेट्रो की बुनियाद रखी गई, आज तक पहला चरण पूरा नहीं हुआ है जबकि 1100 के कथित घोटाले का मामला भी सामने आया और इसके सी ई ओ जेल जाकर बेल पर आ बाहर आ चुके हैं. टाइम्स आफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार दिसंबर 2015 में रेल राज्य मंत्री मनोज सिन्हा ने एलान किया था कि बड़ोदरा में नेशनल अकादमी आफ इंडियन रेलवे की स्थापना होगी. 22 अक्तूबर 2016 को प्रधानमंत्री वड़ोदरा एयरपोर्ट के टर्मिनल बिल्डिंग का उदघाटन करने गए थे तब भारत की पहली रेल यूनिवर्सिटी का एलान किया था. जबकि फरवरी 2016-17 के बजट में ही वड़ोदरा में रेल यूनिवर्सिटी की बात हो चुकी थी. मार्च 2017 में राज्य सभा में पूछे गए सवाल के जवाब में रेल राज्य मंत्री ने बताया था कि राइट्स लिमिटेड यूनिवर्सिटी की शुरूआती प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार कर रही है. 100 एकड़ के इलाके में 865 करोड़ की लागत से यह यूनिवर्सिटी बननी है. 

मतलब एलान पहले होता है, शुरूआती प्रोजेक्ट रिपोर्ट बाद में तैयार होती है. नेशनल रेल यूनिवर्सिटी के बारे में ताज़ा जानकारी मेरे पास नहीं है. कहा जा रहा है कि बुलेट ट्रेन को लेकर वड़ोदरा में तकनीकि प्रशिक्षण का काम शुरू हो चुका है. हमारे सहयोगी राजीव पाठक ने बुलेट ट्रेन के प्रोजेक्ट निदेशक से पूछा कि इस परियोजना पर काम कब शुरू होगा.
 

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