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This Article is From Apr 04, 2018

प्राइम टाइम इंट्रो : बाबाओं को राज्यमंत्री बनाना ठीक है?

Ravish Kumar
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    अप्रैल 04, 2018 23:32 pm IST
    • Published On अप्रैल 04, 2018 23:32 pm IST
    • Last Updated On अप्रैल 04, 2018 23:32 pm IST
कभी फुर्सत हो तो सोचिएगा कि चुनाव आते ही नेता मठों और बाबाओं के यहां दौरे क्यों करते हैं, क्या चुनाव के बाद ये बाबा लोग आपकी नौकरी से लेकर शिक्षा की समस्या को लेकर संसद से लेकर सड़क पर आवाज़ उठाते हैं. मेल मुलाकात के लिए आना जाना तो ठीक है लेकिन क्या यह फार्मूला बन गया है कि आपका संबंध जिन बाबाओं से हैं, उनके इशारे पर ही आप किसी को वोट देंगे. अगर ऐसा है तो समस्या आपके साथ है. आप जनता होने के अपने अधिकार को गंवा रहे हैं.

चुनाव के वक्त में आपको फैसला करना है, न कि आपके बदले किसी बाबा को करना है. ठीक से सोचेंगे तो देख पाएंगे कि आप वोट को ठेके पर देते जा रहे हैं. जब जनता नहीं रहेंगे तो क्या होगा, इसका नज़ारा आपने अलग-अलग मौके पर देखा होगा कि आप अपनी मांग को लेकर चीख रहे हैं, चिल्ला रहे हैं, सड़क पर पुलिस की लाठी खा रहे हैं मगर कोई बाबा आपके लिए नहीं आता है. हर इलाके में दो चार मठ होते हैं, इन मठों के ज़रिए लोगों तक राजनीतिक पहुंच बनाने का मतलब है कि नेता अब इतने मौकों पर आपसे झूठ बोल चुके हैं कि अब इन बाबाओं के सहारे आपके बीच आ रहे हैं. राजनीति को राजनीति के रास्ते आना चाहिए, वो भी सामने से न कि कभी बाबा के बहाने, तो कभी तिरंगा के बहाने, तो कभी सैनिकों के बहाने. आप सोचेंगे तो बात समझ आएगी, नहीं सोचेंगे तो भी कोई बात नहीं. अगर आप अपनी निजी मान्यता और राजनीतिक फैसले में अंतर नहीं कर सकते हैं तो फिर क्या किया जा सकता है. थोड़ा सोचिए इस पर. नहीं सोच पा रहे हैं तो बाबा के आश्रम में ही जाकर रहने लग जाइए. वहीं प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता बाबा के चरणों में बैठे हुए मिल जाएंगे, अपनी मांगों की पर्ची पकड़ा दीजिएगा.

बात बहस की नहीं है, बात है कि आप जनता हैं तो आपका प्रतिनिधि कौन है? ये चुनाव आप खुद करेंगे या कोई बाबा आपके बदले कर देगा?

मध्यप्रदेश सरकार ने पांच बाबाओं को राज्यमंत्री बना दिया है. आप अफसोस कर सकते हैं कि इन्हें कैबिनेट क्यों नहीं बनाया गया. राज्यमंत्री बनकर ये जनता का काम करेंगे या सुख सुविधा भोगेंगे पता नहीं है. भय्यू महाराज, योगेंद महंत, नर्मदानंद महाराज, हरिहरनंद महाराज और कंप्यूटर बाबा. किसी बाबा ने कंप्यूटर का आविष्कार नहीं किया मगर कंप्यूटर के नाम से बाबा ज़रूर हुए हैं. अच्छी बात है. मध्यप्रदेश सरकार ने बाबाओं को राज्यमंत्री का दर्जा दिया है. अब इस बहस को सुनेंगे तो पता चलेगा कि क्यों दिया गया है. राज्यमंत्री के तौर पर इन बाबाओं को 7500 रुपये सैलरी मिलेगी, घर के लिए 15000 किराया मिलेगा, गाड़ी मिलेगी, 1000 किमी का डीज़ल मिलेगा. सत्कार भत्ता 3000 मिलेगा. बाबा लोग स्टाफ और पीए रख सकेंगे. हैरानी हुई कि किसी भी बाबा ने सत्ता का त्याग नहीं किया.

बहुत से कार्यकर्ता ईमानदारी से किसी पार्टी में अपना जीवन झोंक देते हैं. हर चुनाव में तरस कर रह जाते हैं कि टिकट मिलेगा और वे भी प्रतिनिधित्व का मौका पा सकेंगे, उन्हें भी सत्ता सुख मिलेगा, ऐसे कार्यकर्ताओं को कैसा लगता होगा. बीस-बीस साल किसी पार्टी में लगाने से तो अच्छा था कि वे बाबा बन जाते और किसी भी पार्टी से संसद से लेकर राज्यमंत्री के पद तक पहुंच जाते. अगर आप राजनीति में कार्यकर्ताओं के महत्व को समझते हैं तो इस तरह से भी देख सकते हैं कि पांच निष्ठावान कार्यकर्ताओं की महत्वकांझाओं को ठोकर मारकर पांच बाबाओं को राज्यमंत्री का दर्जा दिया गया है. अब कार्यकर्ता भी सवाल नहीं करते हैं, विरोध नहीं करते हैं तो उनके साथ जो हो रहा है वो ठीक ही हो रहा है. क्या पता उन्हें इसमें कुछ ग़लत ही न लगता हो.

कारण भी अजीब है. नर्मदा किनारे के क्षेत्रों में वृक्षारोपण, जल संरक्षण और स्वच्छता के विषय पर जन जागरूकता अभियान चलाने के लिए एक कमेटी बनी है. इन सभी को उसी में शामिल किया गया है. उसके बाद राज्यमंत्री का दर्जा दे दिया गया. इनमें से एक हैं कंप्यूटर बाबा जिन्होंने ऐलान किया था कि वे नर्मदा बचाओ के काम में भ्रष्टाचार को सामने लाने के लिए नर्मदा घोटाला रथ यात्रा निकालने वाले हैं. अब वे राज्यमंत्री बन गए हैं. पहले राजनीतिक बयानों को जल्दी से निपटा देते हैं फिर आते हैं असली बात पर.

प्रभात झा ने कहा कि संत को ही मंत्री बनाया है, डाकू को नहीं. आम तौर पर एक तर्क का एक ढांचा होता है. इस तरह से बातों को  पेश किया जाता है जिससे आपको लगे कि बाबा के राज्यमंत्री बनाने का विरोध करना, धर्म का विरोध करना है. फिर तुरंत उदाहरण दिया जाएगा कि फलां की सरकार में किसी मौलवी को भी राज्यमंत्री का दर्जा दिया गया था. जैसे यूपी में तौकीर रज़ा ख़ान को राज्यमंत्री का दर्जा दिया गया था. उस वक्त भी आलोचना हुई ही होगी, कहा गया होगा कि तुष्टिकरण है.

बाबा को राज्यमंत्री का दर्जा दिया जाना क्या है. पहले के गलत के सहारे आज के गलत को सही बताया जा रहा है. एक खबर बिजनेस स्टैंडर्ड में छपी थी. 29 मई 2013 की यह ख़बर बताती है कियूपी में तौकीर रज़ा को हाथकरघा वस्त्र उद्योग विभाग के सलाहकार के रूप में नियुक्त किया गया. उन्हें राज्यमंत्री का दर्जा दिया गया. तब भारतीय जनता पार्टी ने इसका विरोध किया था. ख़बर के अनुसार श्रीपति सिंह और केपी सिंह को भी राज्यमंत्री का दर्जा दिया गया था मगर भाजपा ने इत्तेहाद ए मिल्लत काउंसिल के अध्यक्ष तौकीर रज़ा ख़ां को राज्यमंत्री का दर्जा दिए जाने का विरोध किया था. तब के राज्यपाल बीएल जोशी से मुलाकात की थी. सपा सरकार से निर्णय बदलवाने का आग्रह किया था. भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी प्रतिनिधि मंडल लेकर राज्यपाल से मिले थे. कहा था कि यह अल्पसंख्यक तुष्टिकरण है. राजनीति से प्रेरित है. अगर तौकीर रज़ा  को राज्यमंत्री का दर्जा दिया जाना अल्पसंख्यक तुष्टिकरण है तो पांच बाबाओं को राज्यमंत्री का दर्जा दिया जाना कौन सा तुष्टिकरण है. इस बिन्दु पर आप सोच सकते हैं.

अब आते हैं कंप्यूटर बाबा पर. बाबा ने नाम पर. फेसबुक पर एक प्रोफाइल है, संकट मोचन संत श्री के नाम से है. इस पर कंप्यूटर बाबा से संबंधित कई वीडियो हैं. इसी में एक वीडियो 8 मार्च को पोस्ट किया गया है जिसमें बाबा नर्मदा के किनारे पेड़ लगाने के नाम पर हुए घोटाले का पर्दाफाश करने के लिए एक अप्रैल से यात्रा निकालना चाहते हैं. इस वीडियो की तरफ फोटो जर्नलिस्ट राज पाटीदार ने हमारा ध्यान दिलाया. राज पाटीदार 20 साल से फोटो पत्रकारिता कर रहे हैं. इस वक्त रायटर से जुड़े हैं. एक पोस्टर भी बना है जिसमें लिखा है कि 45 ज़िलों की पैंतालीस दिवसीय यात्रा निकलने जा रही है. इसमें संपूर्ण साधु संत समाज नर्मदा घोटाला रथ यात्रा निकालने जा रहे हैं. इसका नेतृत्व कंप्यूटर बाबा कर रहे थे और संयोजक थे पंडित योगे महंत.

पोस्टर में कहा गया है कि मुख्यमंत्री के अनुसार 6 करोड़ पौधों का रोपण हुआ जिसका कहीं कोई नामोनिशान नहीं है. इस बड़े वृक्षारोपण की जांच कर दोषियों को सज़ा दी जाए. नर्मदा नदी में हो रहे अवैध उत्खनन पर तुरंत रोक लगे. हर पंचायत में गौशाला का निर्माण किया जाए और उसका संरक्षण साधु-संतों को दिया जाए. प्रदेश के मठ मंदिरों की सभी समस्याओं का तुरंत निराकरण किया
जाए. कुल मिलाकर नौ बिंदु हैं इस पोस्टर में.

एक अप्रैल से लेकर 15 मई तक चलने वाली यात्रा क्या राज्यमंत्री के पद के लालच से बदल गई. जो बाबा लोग घोटाले का आरोप लगा रहे थे, कह रहे थे कि मुख्यमंत्री का 6 करोड़ पौधे लगाने का दावा झूठा है, वो उसी मुख्यमंत्री से राज्यमंत्री का पद ले लेते हैं, इससे राजनीति की साख गिरती है या धर्म का इस्तेमाल करने वाले इन बाबाओं की सीख गिरती है. प्रेस ने खूब पूछा कि आप तो नर्मदा घोटाले का आरोप लगा रहे थे, अब मंत्री बन गए.

आप तय कर सकते हैं कि बाबाओं का राज्यमंत्री बनाना कितना जायज़ है. क्या इनके विरोध को रोकने के लिए राज्यमंत्री बनाया गया. क्या नर्मदा के किनारे वृक्षारोपण के घोटाले को सामने आने से रोकने के लिए इन बाबाओं को मंत्री बनाया गया. अब तो टीवी में रिपोर्टिंग कम होती है वरना पांच रिपोर्ट पांच घंटे के भीतर शूट कर बता सकते थे कि 6 करोड़ पौधे जो लगाए थे उनकी क्या हालत है. फिलहाल आप टीवी पर इसी विषय पर डिबेट तो देखेंगे मगर सच्चाई कभी नहीं जान पाएंगे क्योंकि बहस अब हिन्दू बाबा के मंत्री बनाए जाने पर विरोध और मौलवी वो मंत्री बनाने पर चुप्पी जैसे उदाहरणों को लेकर होने लगेगी. आप यह कभी नहीं जान पाएंगे कि 6 करोड़ पेड़ कहां गए.

19 जुलाई 2017 को हमारे सहयोगी अनुराग द्वारी ने एक रिपोर्ट फाइल की थी. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने नर्मदा सेवा यात्रा शुरू की थी, उसके लिए भारत ही नहीं, विदेशी अखबारों में भी विज्ञापन दिए गए थे. इस विज्ञापन पर राज्य सरकार ने 33 करोड़ 7 लाख 40 हज़ार और 344 रुपये खर्च किए थे. विधानसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में सरकार ने ही यह जानकारी दी थी. इस यात्रा के कारण टीवी चैनलों को विज्ञापन के रूप में 13 करोड़ 23 लाख मिले थे और अखबारों को 10 करोड़ 77 लाख. आपको पता होगा कि मध्यप्रदेश में 11 दिसंबर 2016 से 15 मई 2017 के बीच नमामि देवी नर्मदे सेवा यात्रा निकाली गई थी. हर दिन यात्रा पर सिर्फ प्रचार प्रसार पर 15 लाख रुपये खर्च हुए थे. तब सरकार ने कहा था कि 33 करोड़ की रकम ज़्यादा नहीं है.

पिछले साल 2 जुलाई को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 6 करोड़ वृक्ष लगाने का लक्ष्य रखा था. विश्व रिकार्ड बनाने का लक्ष्य था. जिसके लिए बकायका प्रशिक्षण दिया गया, तैयारी की गई. इसके बाद भी हालत ये है कि इसका घोटाला उजागर करने का ऐलान कुछ बाबा करते हैं और उन्हें मंत्री बना दिया जाता है. मामला धर्म और आस्था का नहीं है, उस सवाल पर पर्दा डालने का है, जो 6 करोड़ पौधों की खोज कर रहे हैं.

कंप्यूटर बाबा अपने बारे में दावा करते हैं कि उनका दिमाग कंप्यूटर जैसा है. अपने साथ लैपटाप लेकर घूमते हैं. इंदौर के अहिल्यानगर में इनका भव्य आश्रम है. भारत में कंप्यूटर का आविष्कार नहीं हुआ, मगर इस नाम से बाबा हुए जो आगे चल कर राज्यमंत्री बने. इसकी भविष्यणावी नेस्त्रोदमस या स्टीव जॉब या बिल गेट्स ने नहीं की थी. इनका असली नाम है उदय देशमुख. ये अक्सर महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश के रसूखदार लोगों के साथ दिखते हैं. शान और शौकत इनकी पहचान है... हमेशा  गाड़ियों का काफिला साथ चलता है. भय्यूजी महाराज को राजनीतिक रूप से ताक़तवर संतों में गिना जाता है, इनके पिता महाराष्ट्र में कांग्रेस के नेता रहे हैं. अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दौरान इनका नाम चर्चा में आया था जब अन्ना हजारे को मनाने के लिए यूपीए सरकार ने इनसे संपर्क किया था.

नर्मदानंद महाराज हनुमान जयंती और राम नवमी के मौके पर यात्राओं के कारण चर्चा में रहते हैं. नर्मदा की सफाई और अविरलता के लिए भी सक्रिय रहते हैं. नर्मदा के किनारे पौधारोपण, जल संरक्षण तथा स्वच्छता के विषयों पर काम करने के लिए इन्हें सम्मानित किया गया है.  डिंडोरी से आते हैं. यहां उनका आश्रम भी है. मध्यप्रदेश के महाकौशल इलाके में उनके काफी समर्थक हैं.

इंदौर के योगेंद्र महंत कांग्रेस और बीजेपी के आला नेताओं के साथ दिखते थे. सरकार के खिलाफ नर्मदा घोटाला रथ यात्रा के संयोजक थे. विश्व ब्राह्मण समाज संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं. वे दावा करते हैं कि 35 साल से धार्मिक, सामाजिक और शैक्षणिक क्षेत्र में काम कर रहे हैं.

पौधे कहां गए. इसकी असली रिपोर्ट तो तभी मिलेगी जब संवाददाता नर्मदा किनारे पौधों का जायज़ा लेंगे जिस पर राज्य सरकार ने कई करोड़ रुपये खर्च किए हैं. पत्रिका अखबार ने मध्यप्रदेश के कटनी से रिपोर्ट छापी है. इस खबर की हेडलाइन देखिए - हाल ही में बने वर्ल्ड रिकार्ड का मिटा नामो निशान, अफसरों की अनदेखी से हो गया ये हाल. कटनी की खबर है ये. प्रत्येक पौधे की देखभाल के लिए प्रत्येक पंचायत और ग्रामनगर में पौध रक्षकों की नियुक्ति की गई. कुछ पौध रक्षकों को ट्रेनिंग भी दी गई. लेकिन उनकी नियुक्ति की जानकारी किसी को नहीं है. पौधों के नामोनिशान नहीं है. अभियान के साढ़े पांच महीने बीत जाने के बाद पत्रिका ने खबर की थी. पत्रिका की ही एक खबर है होशंगाबाद की. यह इसी 23 मार्च की खबर है. लिखा है कि पिछले साल 2 जुलाई को सोहागपुर ब्लाक में दस से अधिक नर्मदा घाटों पर पौधारोपण को लेकर अफसरों और संगठनों ने वाहवाही तो लूट ली मगर इन पौधों को कोई बचाने नहीं आ रहा है. कर्मचारी मानते हैं कि ब्लाक में लगाए गए ढाई लाख पौधों में से पचास फीसदी ही पनप पाए हैं. पौधारोपण की सफलता 50 फीसदी से घटकर 20 से 25 फीसदी तक ही रह जाएगी.

हरदा और नरसिंहपुर में वृक्षारोपण के बाद पौधे सूख गए हैं. हरदा का हांडिया गांव नर्मदा के किनारे है. यहां कहीं पौधे सूख गए हैं कहीं-कहीं बचे भी हुए हैं. नरसिंहपुर ज़िले के बरमान गांव में दस हज़ार पौधे लगाने का दावा किया गया मगर अब यहां पौधे नहीं बचे हैं. नाम मात्र के ही हैं.

शक होता है कि जो बाबा पौधारोपण के घपले को उजागर करने के लिए यात्रा निकालने वाले थे, उन्हें राज्यमंत्री क्या इसलिए बनाया गया कि वे चुप हो जाएं. धर्म चुप हो जाए. हमारी राजनीति अब ऐसी ही होती जा रही है. अपने गांव में एक मठ बनवा लीजिए, गांव में सांसद तो नहीं आएंगे, मठ में ज़रूर आएंगे फिर वहां घेरकर पूछिएगा.

कर्नाटक के लिंगायत मठ में राहुल गांधी भी जा रहे हैं, अमित शाह भी जा रहे हैं. राजनीति की इस कमज़ोरी की तरफ न जाने कितने लोग इशारा करते हैं फिर भी जब चुनाव आता है तो काम की बात कम, मठ, बाबा, मज़ार, मौलवी होने लगता है. कोई गंगा का अवतार हो जाता है तो कोई शिव का पुजारी. मेरी राय में जाना तो चाहिए हर जगह मगर वो अगर वोट के लिए जाया जा रहा है, जनता के सवालों से ध्यान हटाकर जनता को खत्म करने के लिए किया जाता है. ये जो आपने कहानी देखी, वो राजनीति की नहीं, आपके ख़त्म होने की कहानी है. नेता को यह बात पता है, बस आपको पता नहीं चल पाता है. ये भारत की राजनीति है. जनता कहां हैं यहां है...जनता हर दिन लाचार होकर मीडिया को खोज रही है, मीडिया ने जनता को खोजना बंद कर दिया है.

पश्चिम बंगाल में कुछ छात्र राज्य चयन आयोग के सामने बैनर लेकर खड़े हैं. इनके लिए न तो कोई बाबा आता है न कोई मौलवी न कोई आपका नेता? एक छात्रा ने लिखा है कि कोलकाता में WBPSC Office के सामने छात्र धरना दे रहे हैं. प्रेस को बुलाया गया मगर कोई नहीं आया. 2016 में जूनियर इंजीनियर की परीक्षा हुई, सिविल और मेकेनेकिल इंजीनियरों के लिए. सिविल की लिस्ट में 1356 छात्रों का नाम आया और इनमें से 1082 को पोस्टिंग दे दी गई. मगर 274 छात्र अभी भी ज्वाइनिंग का इंतज़ार कर रहे हैं. छात्रा ने बताया कि समस्या तो बहुतों की है मगर अपने ही हक के लिए 30-35 लोग ही आए हैं.

जनता जब जनता नहीं रह जाती, वह राजनीति में जनता के अलावा कुछ और होकर पनाह मांगती है तो उसकी ये हालत हो जाती है. मीडिया के लिए भी ये जनता नहीं है. आप स्वतंत्र हैं बाबाओं के मंत्री बनाए जाने पर खुश होने के लिए. आप अब मध्यप्रदेश में वृक्षारोपण के बारे में कुछ-कुछ जान गए हैं.

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