नमस्कार, मैं रवीश कुमार... राजनीति में नैतिकता पर अगर किसी अच्छे ललित निबंध की तलाश है, तो आप प्लीज़ बिहार चले जाइये। सत्तर से लेकर नब्बे के दशक की राजनैतिक भीतरघात और जोड़तोड़ की ख़बरों का दौर हर मिनट चैनलों पर लाइव हैं और नैतिकता की विषुवत रेखा के दोनों तरफ खड़े दलों के नेता राजनीतिक ईमानदारी और प्रतीकों की महानता के बारे में इतनी अच्छी बातें कह रहे हैं कि अगर आप अब बिहार में नहीं हैं, तो कभी और होने का सुख नहीं समझ सकते। सबको अपनी दलीलों पर इतना भरोसा है कि उन्हें लगता है कि जो भी बोल देंगे, वही सत्य की तरह जनमानस का हिस्सा हो जाएगा। पूरे घटनाक्रम को देखें तो लगेगा कि इन नेताओं ने बिहार को ही फेल कर दिया है।
फर्क यही आया है कि दोनों तरफ से जो खेल भीतर-भीतर चल रहा था, वो अब सामने आ गया है। शुक्रवार को मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी को विधानसभा में विश्वासमत हासिल करना है। दोनों खेमे में डिनर मेन्यू के साथ साथ व्हीप जारी हो चुके हैं। बीजेपी मांझी के लिए वोट करेगी, मगर उनकी सरकार में शामिल नहीं होगी। पर क्या यह बीजेपी समर्थित सरकार नहीं कहलाएगी।
एक समय सुशील मोदी ने मांझी को दस में ज़ीरो दिया था और कठपुतली सरकार कहा था, अब बीजेपी विकासवाद को छोड़ पहले एक महादलित का अपमान होने से बचाने के लिए इस लड़ाई में कूद पड़ी है। लेकिन क्या आप यह समझ पा रहे हैं कि जो जेडीयू विधायकों से साथ सरकार बनाने के लिए राज्यपाल से लेकर राष्ट्रपति भवन तक परेड कर रही थी, उसने सदन में नेता विपक्ष का पद लेने में जल्दबाज़ी क्यों दिखाई।
क्या यह विचित्र किन्तु सत्य टाइप पोलिटिकल स्टोरी नहीं है, जिस पार्टी ने अपने मुख्यमंत्री को बर्खास्त कर दिया है, वो नया मुख्यमंत्री बनाने के साथ-साथ नेता विपक्ष पद की भी दावेदार हो गई। इसकी खबर आते ही बीजेपी के विधायक विधानसभा में स्पीकर के कमरे के बाहर प्रदर्शन करने लगे। अदालत भी चले गए। उधर अदालत से खबर आई कि जेडीयू से बर्खास्त विधायक विश्वास मत के दौरान वोट नहीं कर सकते हैं। इसी बीच प्रेस कांफ्रेंस होने लगी कि पप्पू यादव जेडीयू के एक विधायक को मंत्री पद का लालच देकर पाला बदलने की बात कर रहे हैं। पप्पू यादव ने खंडन कर दिया, लेकिन जो दृश्य बनता चला गया, उसमें क्या आप बिहार का कोई सुनहरा भविष्य देख पा रहे हैं।
बिहार में नवंबर में चुनाव होने हैं, यानी आठ महीना होगा किसी के पास भी। जीतन राम मांझी ने अभी तक अपनी संख्या नहीं बताई है। 12 विधायकों के दम पर वो सरकार चला रहे हैं और फैसले ले रहे हैं, बल्कि अपनी चाल में उन्होंने जेडीयू को ही नहीं फंसाया, बल्कि बीजेपी को भी मजबूर कर दिया है कि वो जातिगत स्वाभिमान की लाइन लेकर मैदान में कूदे।
जीतन राम मांझी ने विश्वासमत के एक दिन पहले महादलितों का सम्मेलन बुला लिया। भाषण देते हुए कहा कि मैंने किसी दल से समर्थन नहीं मांगा है, मैंने विधायकों से समर्थन मांगा है। मुख्यमंत्री मांझी ने विधायकों से अपील की है कि अगर मंत्री बनने के लिए आप जाना चाहते हैं, तो जीतनराम मांझी के पास भी मंत्री का बहुत सा पद है। आइये हम मंत्री बना देंगे। मांझी ने लोगों से कहा कि अपने विधायकों के यहां जाकर गांधीगीरी से अनुरोध कीजिए कि क्या कारण है कि आप इस तरह से जीतनराम मांझी का विरोध कर रहे हैं। नीतीश कुमार ने भी गरीबतम मुसहर जाति के मांझी को मुख्यमंत्री बनाया तो प्रतीक का सहारा लिया, अब उसे गलत फैसला बता रहे हैं। जातिगत प्रतीकों पर भावुक होने से पहले उन स्थितियों का भी ध्यान करना चाहिए कि नीतीश और मांझी के संबंध एक-दूसरे के कारण बिगड़े या बीजेपी के कारण बिगड़े।
दांव पर लग गया है वो बिहार, जहां जातिवाद की राजनीति खत्म तो नहीं हुई थी, मगर विकास और प्रशासन की ज़रूरत पहले नंबर पर आ गई थी। ऐसा क्या हो गया है कि इस वक्त विकास मुद्दा नहीं, जाति का स्वाभिमान मुद्दा है। क्या आपको भी लगने लगा है कि इस बिहार का भगवान ही मालिक है, जिसके बच्चे इक्कीसवीं सदी की उड़ान भरने के लिए दुनिया भर में चले गए हैं। कहीं मज़दूर बनकर तो कहीं इंजीनियर, डॉक्टर बनकर।
कौन है जो जाति की राजनीति नहीं कर रहा है। क्या नीतीश और लालू यादव का साथ आना जातिगत समीकरण की ज़रूरत नहीं है। क्या लोकसभा में बीजेपी ने उपेद्र कुशवाहा और रामविलास पासवान को साथ लेकर जातिगत समीकरण नहीं बनाया था। आखिर सुशासन की छवि में लालू यादव किस तरह से फिट बैठते हैं, तो लालू यादव के साथी रहे राम विलास पासवान कैसे बीजेपी के पाले में जाकर विकास के यात्री हो जाते हैं। सबको अपनी दलीलों को अकूत विश्वास है। कुछ दिनों तक मांझी से इस्तीफा मांगने वाली बीजेपी ने मांझी में एक महादलित क्यों नहीं देखा था। सुशील मोदी का बयान है कि अगर मांझी को हटाने की कोशिश होती है, तो उन्हें विधानसभा बर्खास्त कर चुनाव कराना चाहिए। अब वही मोदी मांझी के स्वाभिमान की लड़ाई लड़ने आ गए हैं।
सुशील मोदी ने ही मांझी को नीतीश का कठपुतली कहा था। क्या बीजेपी चुनाव में भी मांझी को अपना नेता बना लेगी। क्या बीजेपी चुनाव में किसी दलित को मुख्यमंत्री बनाने का एलान करने जा रही है। अगर नहीं तब क्या बीजेपी पर मांझी के इस्तमाल का आरोप नहीं लगेगा। तब मांझी बीजेपी से महादलित से अपमान का बदला लेंगे।
एक चर्चा यह है कि मांझी पप्पू यादव के साथ मिलकर कोई दल बना सकते हैं और बीजेपी उनसे समझौता कर लेगी। क्या बीजेपी को पप्पू यादव और साधु यादव की ज़रूरत पड़ गई। सबके सब जाति का समीकरण बना रहे हैं। फर्क यही है कि सबने अपने जातिगत समीकरण का नाम विकास रखा है।
दरअसल नैतिकता की बात कर तो रहे हैं, मगर आप भी समझ रहे हैं कि सारा खेल सत्ता का है। कोई किसी को क्यों छोड़ दे। जानकारों को अपने नोटबुक में जातपात का अलजेबरा करने दीजिए। पटना की सड़कों पर पोलिटिक्स के प्रोफेसर फिर से मंडराने लगे हैं। सबके पास शास्त्र और संविधानसम्मत एक नैतिकता है। बस आप तय नहीं कर पायेंगे कि इस लड़ाई में नायक बनकर कौन उभर रहा है और खलनायक का पार्ट कौन निभा रहा है। देखते-देखते आप मांझी को दाद देने लग सकते हैं। भले ही उन पर बीजेपी के इशारे पर चलने का आरोप लग रहा है, मगर उनके दांव में नीतीश ही नहीं बीजेपी भी फंस गई है। (प्राइम टाइम इंट्रो)