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This Article is From Jan 07, 2015

प्राइम टाइम : क्या सस्ता पेट्रोल खुशखबरी है?

Ravish Kumar, Rajeev Mishra
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  • Updated:
    जनवरी 07, 2015 21:30 pm IST
    • Published On जनवरी 07, 2015 21:23 pm IST
    • Last Updated On जनवरी 07, 2015 21:30 pm IST

नमस्कार मैं रवीश कुमार। काश दुनिया की अर्थव्यवस्था हिन्दू बनाम मुसलमान टाइप के बयानों जितनी सरल होती तो हम अपनी कमज़ोर भावुकता को खुजला खुजला कर नतीजे पर पहुंच जाते। देश में बेतुके धार्मिक बयानों का आईपीएल मैच चल रहा है। यह जानलेवा भी होता जा रहा है। वहीं, पूरी दुनिया में लोग यह समझने में दिमाग लगा रहे हैं कि कच्चे तेल के दाम कब तक गिरेंगे और गिरते ही रहे तो हम कब तक संभले रहेंगे।

2009 के बाद पहली बार दुनिया के बाज़ार में कच्चे तेल की कीमत 50 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ गई है, छह महीना पहले जून 2014 में इसकी कीमत 115 डॉलर प्रति बैरल थी। तेल की खपत के मामले में दुनिया में अमरीका और चीन अव्वल हैं। चीन की अर्थव्यवस्था की रफ्तार स्लो हो गई है। अमरीका सऊदी अरब जैसे ओपेक मुल्कों से लाखों बैरल तेल कम ले रहा है। उसने अपने यहां तेल का उत्पादन बढ़ा दिया है। पत्थरों के बीच से तेल का उत्पादन बढ़ा दिया है जिसे आप शेल आयल कहते हैं। इसके बाद भी तेल उत्पादक देशों ने तेल का उत्पादन कम नहीं किया है।

अब इससे सऊदी अरब में संकट नहीं है क्योंकि उसके पास पर्याप्त पैसा है लेकिन दूसरे देश जो सिर्फ तेल के निर्यात पर निर्भर हैं चरमरा गए हैं। रूस, वेनेजुएला, नाइजीरिया, लीबिया, ईरान, इराक जैसे मुल्कों में संकट आ गया है। यूरोप में पहले ही मंदी जैसी हालत है। तो तेल की मांग वहां से भी नहीं हैं। तेल से इतनी कमाई होती है कि यही पैसा पेट्रो डॉलर के नाम से अलग-अलग बिजनेस में लगता है। विदेशी निवेश की शक्ल में।

ज़ाहिर है जब तेल से पैसा नहीं आएगा तो दुनिया के अलग-अलग देशों या कारोबार में निवेश के लिए पैसे भी कम होंगे। जब विदेशी निवेश नहीं आएगा तब विकास बाबू का क्या होगा। पर छह महीने पहले तक कच्चे तेल के दाम आसमान क्यों छू रहे थे। दाम क्यों चढ़ रहे थे। इसके लिए आपको वायदा कारोबार यानी सट्टेबाज़ी के खेल को समझना होगा। मांग तो तब भी इतनी ही रही होगी लेकिन भविष्य में बढ़ने के नाम पर लोग पैसा लगाते गए जैसे निवेशक प्रापर्टी में लगा देते हैं और एक दिन पाते हैं कि जो फ्लैट खरीदा है उसका दाम ही नहीं बढ़ रहा तो फ्लैट बेच कर दूसरे सेक्टर की तरफ चल देते हैं या नया निवेश नहीं करते हैं।

फाइनांस कैपिटल यानी वित्तीय पूंजी के इस खेल को समझना सबके बस की बात नहीं है। इन सटोरियों को जब लगा कि मांग तो है नहीं तो क्यों न पैसा निकाल कर वापस अमरीका ले जाया जाए। वे अमरीका में बांड खरीदने लगे। इससे डॉलर का दाम फिर बढ़ने लगा और उसके मुकाबले बाकी मुद्राएं कमज़ोर होने लगीं। यूरो तो पिछले नौ साल में इतना कमज़ोर नहीं हुआ था। जून में डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत 60 रुपये थी, लेकिन छह महीने बाद 63 रुपये 24 पैसे हो गई है। अभी भी 1947 के दर से हम काफी दूर हैं। जब प्रधानमंत्री मोदी कहा करते थे कि 1947 में एक रुपया एक डॉलर के बराबर हुआ करता था।

आप चैनल पर पेट्रोल सस्ता होने की खबर देखकर खुश हो जाते हैं लेकिन क्या सरकार भी इतनी ही खुश होती है। अगर चुनाव न हो तो वो इस खुशी का इज़हार भी न करें। फिर भी भारत सरकार ने तेल कंपनियों पर एक्साइज़ ड्यूटी क्यों बढ़ाया। अगर नहीं बढ़ाती तो कंपनियां आपके लिए पेट्रोल डीज़ल के दाम और भी कम कर सकतीं थीं।

जून 2014 में जब कच्चा तेल 115 डॉलर प्रति बैरल था तब दिल्ली में पेट्रोल 71 रुपये प्रति लीटर के करीब मिल रहा था। जून से जनवरी के बीच कच्चा तेल 65 डॉलर प्रति बैरल कम हो गया, लेकिन दिल्ली में पेट्रोल के दाम में सिर्फ नौ रुपये की कमी आई। तो क्या जितना सस्ता होना चाहिए था उतना हुआ। इनके दामों पर सरकार का नियंत्रण नहीं है तो बाज़ार के हिसाब से ये कम क्यों नहीं हैं।

तब सरकार की कमाई का क्या होता जिससे वो विकास के लिए पैसे जुटाती है। कच्चा तेल से सिर्फ पेट्रोल डीज़ल और मिट्टी तेल ही नहीं बनता है। टायर, रबर, कपड़ा, दवा, परफ्यूम, स्याही, हेयर कलर, मोमबत्ती, जूते प्लास्टिक टूथपेस्ट जैसे अनेक उत्पादों में कच्चे तेल का इस्तेमाल होता है। ज़ाहिर है सरकार की कमाई काफी कम हो सकती है। यही संकट मनमोहन सिंह के समय भी था और यही मोदी के सामने भी है। महंगाई बढ़ती है तो भी बजट घाटा बढ़ता है कम होती है तो भी बढ़ रहा है।

अर्थव्यवस्था का जो मॉडल हमारे सामने उपलब्ध है, अगर ठीक से आप याद करेंगे तो पाएंगे कि इसने संकट का काल ही ज्यादा है। स्वर्ण युग कभी कभार। वो भी किसी एक देश में स्वर्ण युग नहीं टिकता। कभी यहां तो कभी वहां। उन देशों में भी संकट आता है जहां डिजिटल क्रांति आ गई है।

लेकिन मौजूदा संकट को क्या सिर्फ तेल के गिरते दामों से ही समझा जा सकता है। खाद्य उत्पादों और कमोडिटी के भी दाम दुनियाभर में गिरे हैं। इसका मतलब तो यह हुआ कि लोगों के पास इन चीज़ों को खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं। अच्छे दिनों में भी ज़्यादातर लोग गरीब ही रह गए। दुनियाभर में खाद्य, धातु, कपास रबर के दाम गिरने से गुजरात के कपास और मूंगफली किसान सड़क पर आए दिन प्रदर्शन कर रहे हैं। पिछली और नई सरकार के समय से ही मनरेगा में कटौती हो रही है। इसके अलावा नई सरकार ने अनाज के न्यूनतम समर्थन मूल्य में भी कम वृद्धि की है।

कुछ अर्थशास्त्री तारीफ कर रहे हैं कि इससे किसानों के पास कम पैसा गया जिसके कारण महंगाई कम हुई है। इतने सारे उदाहरण इसलिए दे रहा हूं ताकि आप इस चक्र को समझ सकें।

अर्थशास्त्री बमबम हैं कि सीईओ और मैनजरों की सैलरी बढ़ने जा रही है, लेकिन वो इस बात से भी गदगद हैं कि गांवों में किसानों और खेतिहर मज़दूरों की मज़दूरी कम बढ़ रही है। ये कौन सा साइंस है आप बेहतर जानते होंगे। पर हिन्दू मुस्लिम टापिक से टफ तो है ही। बुधवार के इंडियन एक्सप्रेस में छपा है कि किसानों की आमदनी पिछले दस साल में सबसे कम बढ़ी है।

  • नवंबर 2014 में औसत दिहाड़ी 266.26 रुपये
  • नवंबर 2013 में औसत दिहाड़ी 256.52 रुपये
  • नवंबर में औसत सालाना बढ़ोतरी सिर्फ़ 3.8%
  • जून तक दिहाड़ी में सालाना बढ़ोतरी 10% से ऊपर थी (स्रोत: लेबर ब्यूरो आउट एंकर इन)

अर्थव्यवस्था का यह मॉडल अजीब है। जब गिरावट आती है तब लोग उम्मीद पाल लेते हैं और जब बढ़त होती है तो उम्मीदें उनको पाल लेती है। तो कच्चे तेल के दाम में गिरावट भारत के लिए बमलहरी है या शीतलहरी। प्राइम टाइम

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