जेएनयू में बवाल ने हम सब के सामने कई संगीन सवाल खड़े कर दिये हैं। क्या इस विश्वविद्यालय में देश विरोधी नारों की आजादी होनी चाहिए? क्या देश की अखंडता के खिलाफ नारे लगाने वालों के पीछे कोई बाहरी ताकत है?
9 फरवरी को जवारलाल नेहरू विश्वविद्यालय में भारत विरोधी नारे लगे। यहां कुछ छात्रों ने अफजल गुरु और मकबूल भट्ट की फांसी को जूडिशियल मर्डर बताया। नारे लगे- भारत के टुकड़े होंगे हजार, साथ ही कई और भड़काऊ बयान भी दिए गए। हालांकि अनुमति ली गई थी एक सांस्कृतिक कार्यक्रम की लेकिन इसमें संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरु की फांसी पर चर्चा होने लगी। 14 साल बाद चुनाव जीतकर आई एबीवीपी के छात्रों ने इसका विरोध किया और जेएनयू प्रशासन से कार्यक्रम को दी गई अनुमति रद्द करने के लिए कहा। अनुमति वापस लेने के बावजूद कार्यक्रम जारी रहा। छात्रों के दो गुटो में मारपीट की नौबत आ गई और जेएनयू प्रशासन ने जांच बिठा दी।
इस बीच बीजेपी के सांसद महेश गिरी ने मामले पर रिपोर्ट दर्ज करवाई। उन्होंने देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह और मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी को चिठ्ठी लिखी कि ऐसे देश विरोधी कार्यक्रम बिना वाइस चांसलर की अनुमति के क्यों चलाये गये। लिखा कि राष्ट्रीय शिक्षण संस्थान में देश विरोधी गतिविधियां हो रही हैं। आप हस्तक्षेप करें और जेएनयू प्रशासन पर कार्यवाही करें कि अनुमति क्यों दी गई...
जांच का कोई नतीजा आता, इससे पहले ही शुक्रवार को जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार को देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया है। पुलिस 7-8 लोगों की तलाश में भी रही। साथ ही एसएआर गिलानी पर देशद्रोह का मामला दर्ज कर लिया गया। गिलानी ने 9 फरवरी को प्रेस क्लब में हॉल बुक कराया था जिसमें अफजल गुरु के समर्थन में नारे लगे। यह वही गिलानी है जिनको संसद पर हमले के मामले ने कोर्ट ने पुख्ता सबूत न होने के आधार पर छोड़ दिया था।
अब इस बवाल में जम्मू-कश्मीर के अलवाववादी नेता सईद शाह गिलानी ने कहा है कि अगर उन छात्रों पर कोई कार्यवाही हुई उस का घाटी में बड़ा असर होगा। गिलानी ने यह भी कहा कि एक शान्तिपूर्वक कार्यक्रम था जिसे बेवजह इतना तूल दिया जा रहा है। सीपीएम प्रमुख सीताराम येचुरी का कहना है कि जो जेएनयू में हो रहा है जैसे कि कैम्पस में पुलिस, छात्रों को हॉस्टल से उठाना, ऐसा इमरजेंसी के दौरान ही हुआ था। कांग्रेस नारों की निन्दा कर रही है और यह भी कह रही है कि छात्रों के साथ डायलॉग की प्रक्रिया चलती रहनी चाहिए।
जेएनयू छात्रों की राजनीतिक सोच के लिए जाना जाता रहा है। वैसे यहां याद दिला दें कि यह वही संस्थान है जहां 80 के दशक में तब की प्रधानमंत्री इदिरा गांधी को कैम्पस में एक आधिकारिक कार्यक्रम के लिए छात्रों ने आने नहीं दिया था और उनको मेन गेट से नहीं साइड गेट से एन्ट्री लेनी पड़ी थी।
(निधि कुलपति एनडीटीवी इंडिया में सीनियर एडिटर हैं)
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This Article is From Feb 12, 2016
निधि का नोट : जेएनयू में बवाल ने खड़े किए कई संगीन सवाल
Nidhi Kulpati
- ब्लॉग,
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Updated:फ़रवरी 15, 2016 15:34 pm IST
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Published On फ़रवरी 12, 2016 22:59 pm IST
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Last Updated On फ़रवरी 15, 2016 15:34 pm IST
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