खाड़ी क्षेत्र में होने वाला हर युद्ध का भारत पर दो तरह से प्रभाव पड़ता है. इसके पहले प्रभाव से कच्चे तेल की कीमतें बढ़ जाती हैं, पेट्रोल महंगा हो जाता है और टीवी स्टूडियो में बहसों की भरमार हो जाती है. हालांकि इसका दूसरा प्रभाव थोड़ा धीमा और शांत लेकिन अधिक दर्दनाक होता है. यह तब दिखाई देता है जब लखनऊ के किसी घर में हर महीने आने वाला पैसा आना बंद हो जाता है या शारजाह में काम कर रहे किसी मजदूर के ठेके का नवीनीकरण नहीं होता है. अमेरिका-इजरायल की ओर से 28 फरवरी 2026 को ईरान के खिलाफ शुरू किया गया युद्ध (ऑपरेशन एपिक फ्यूरी) इन प्रभावों को एक साथ ला रहा है. लेकिन इनमें से कोई भी प्रभाव अकेले पूरी कहानी नहीं बताता. असली सवाल यह है, यह युद्ध कितने समय तक चलेगा?
यही सवाल सबसे महत्वपूर्ण है. अगर युद्ध कुछ हफ्तों में खत्म हो जाता है, तो भारत को बस हल्की चोट लगेगी. लेकिन अगर यह महीनों तक चलता है तो इससे होने वाला नुकसान कहीं ज्यादा गंभीर होगा. इसका सबसे अधिक असर उन लोगों पर पड़ेगा जो इसे सहन करने की स्थिति में नहीं हैं.
भारतीय परिवारों की लाइफलाइन
भारत दुनिया में सबसे ज्यादा विदेशों से पैसा (रेमिटेंस) पाने वाला देश है. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2024–25 में विदेशों में रहने वाले भारतीयों ने रिकॉर्ड 135.4 अरब डॉलर घर भेजे थे. यह कोई छोटा आंकड़ा नहीं है, यह आमतौर पर भारत को मिलने वाले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) से भी बड़ा है. इसमें से करीब 38 फीसदी यानी करीब 51 अरब डॉलर सिर्फ छह देशों- यूएई, सऊदी अरब, कतर, कुवैत, ओमान और बहरीन से आता है. आरबीआई के मार्च 2025 बुलेटिन से भी इस हिस्सेदारी की पुष्टि होती है. यह कोई छोटी रकम नहीं है, इसे आप ऐसे समझ सकते हैं कि 2025 में अमेरिका के साथ भारत का ट्रेड सरप्लस करीब 58 अरब डॉलर का था. खाड़ी के देशों से आने वाला रेमिटेंस भी करीब इतना ही है.
इस 51 अरब डॉलर के पीछे इंसानों का एक विशाल नेटवर्क काम करता है. विदेश मंत्रालय के मुताबिक करीब 88.8 लाख भारतीय इन छह खाड़ी देशों में रहते और काम करते हैं. यूएई में 34 लाख से अधिक और 25 लाख से अधिक भारतीय सऊदी अरब में रहते हैं. बाकी के भारतीय कुवैत, कतर, ओमान और बहरीन में रहते हैं. इनमें से करीब 70 फीसदी अर्ध-कुशल या अकुशल मजदूर है. ये वो लोग हैं, जो दुबई में सड़कें बनाते हैं, रियाद में निर्माण कार्य करते हैं, दोहा में टैक्सी चलाते हैं और मस्कट में अस्पताल साफ करते हैं.
इनके परिवारों के लिए यह पैसा (रेमिटेंस) अतिरिक्त आय नहीं है, यही उनकी पूरी आय है. यही पैसा केरल में स्कूल फीस भरता है, तमिलनाडु में कर्ज चुकाता है, उत्तर प्रदेश में घर बनवाता है और सैकड़ों गांवों में रोजमर्रा की जिंदगी चलाता है. हर एक मजदूर अपने पीछे चार-पांच लोगों का भरण-पोषण करता है. इसका मतलब है कि साढ़े तीन से साढ़े चार करोड़ भारतीय सीधे तौर पर खाड़ी में काम कर रहे अपने परिवार के सदस्य पर निर्भर हैं.जब हम रेमिटेंस में आने वाले किसी व्यवधान की बात करते हैं, तो हम इन्हीं परिवारों की बात कर रहे होते हैं.

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अभी खाड़ी के देशों से अधिक पैसा क्यों आ रहा है
अभी के समय में स्थिति थोड़ी विरोधाभासी है. सीएनबीसी के इनसाइड इंडिया न्यूजलेटर के मुताबिक युद्ध शुरू होने के बाद खाड़ी देशों से भारत आने वाले पैसों में 20–30 फीसदी की वृद्धि देखी गई है. यह समृद्धि का संकेत नहीं है, बल्कि डर का संकेत है. खाड़ी के देशों से भारतीय एहतियात के तौर पर ज्यादा पैसा भेज रहे हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि उनकी नौकरी कभी भी जा सकती है, उनके मालिक काम बंद कर देंगे या वो जिस शहर में रह रहे हैं, वह रहने लायक नहीं रह जाएगा. सिटी की शोध टीम ने इसे जोखिम से बचने की प्रवृत्ति के कारण पैदा हुआ 'विपरीत सकारात्मक प्रभाव'बताया है. यह प्रभाव लंबे समय तक नहीं टिकेगा.
लेकिन अगर युद्ध लंबा चलता है, तो हालात बदल जाएंगे. निर्माण कार्य धीमा पड़ जाएगा, होटल खाली होंगे, कंपनियां कर्मचारियों को नौकरी से निकालेंगी और तेल व्यापार में व्यवधान झेल रही सरकारें विदेशी मजदूरों पर सख्ती करेंगी. अभी मार्च तक जो पैसा ज्यादा आ रहा था, वह जुलाई-अगस्त तक पूरी तरह बंद हो सकता है, क्योंकि बेरोजगार मजदूर अपने गांव लौट चुके होंगे. मार्च के अंत तक दो लाख 20 हजार से अधिक भारतीय नागरिक खाड़ी के देशों से स्वदेश लौट चुके हैं. अगर यह युद्ध और लंबा चला तो भारत वापस आने वाले लोगों की संख्या और बढ़ेगी.
भारत की अर्थव्यवस्था के लिए कितना जरूरी है रेमिटेंस
रेमिटेंस सिर्फ परिवारों के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं हैं, बल्कि यह भारत की अर्थव्यवस्था के लिए भी बेहद जरूरी है. खाड़ी देशों से आने वाला पैसा भारत के चालू खाते में अदृश्य आय के सबसे बड़े घटकों में से एक है. यह भारत के व्यापार घाटे को लगभग आधा हिस्सा संतुलित करने में मदद करता है. जब तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो भारत का आयात खर्च बढ़ जाता है. लेकिन खाड़ी से आने वाला पैसा इस झटके को कम कर देता है. खाड़ी के देश क्रूड ऑयल के लिए पैसा लेते हैं, इसका कुछ हिस्सा हमारे कामगारों के जरिए वो हमें वापस कर देते हैं.
लंबे समय तक चलने वाला युद्ध इस प्रवाह के दोनों हिस्सों को प्रभावित करता है. पहले से महंगा तेल और महंगा हो जाता है, युद्ध शुरू होने से पहले क्रूड ऑयल करीब 72 डॉलर प्रति बैरल था, जो अब बढ़कर 100 डॉलर प्रति बैरल से अधिक हो गया है. आयात बिल में भारी बढ़ोतरी होती है. साथ ही साथ अगर खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्थाएं संकुचित होती हैं और रेमिटेंस का आना कम हो जाता है. और दूसरी तरफ से चालू खाता घाटा भी बढ़ जाता है. ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स की प्रमुख अर्थशास्त्री एलेक्जेंड्रा हरमन ने भी इस जोखिम की ओर इशारा किया है. उनके मुताबिक इससे रेमिटेंस के आने में भारी गिरावट आएगी, खासकर तेल की बढ़ती कीमतों के साथ. यह भारत की बाहरी स्थिति को खराब करेगी और रुपये पर दबाव डालेगी, जो पहले से ही रिकॉर्ड निचले स्तर के करीब है.
अगर ईरान युद्ध लंबे समय तक चला तो क्या होगा
दोहरा दबाव कोई काल्पनिक बात नहीं है. अगर युद्ध लंबा खिंचता है, तो यह पूर्वानुमान लगाने वाले कई विश्वसनीय लोगों के लिए केस स्टडी होगा. S&P में एशिया-प्रशांत के देशों में जोखिम का आकलन करने वाली टीम की प्रमुख दीपा कुमार ने 'सीएनबीसी' को बताया कि यदि युद्ध छह महीने से अधिक समय तक चलता है, तो भारतीय अर्थव्यवस्था पर इसका महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ेगा.वहीं कैपिटल इकोनॉमिक्स ने अपने नौ मार्च के आकलन में निष्कर्ष निकाला था कि सबसे कम हानिकारक मामले में, यदि युद्ध छोटा और सीमित रहता है, तो खाड़ी से बाहर के देशों की GDP, मुद्रास्फीति और मौद्रिक नीति पर इसका प्रभाव सीमित होगा, लेकिन अगर युद्ध लंबा चलता है तो ऊर्जा की उच्च कीमतों के साथ-साथ खाड़ी से आपूर्ति बाधित होने से वैश्विक अर्थव्यवस्था मंदी की ओर जा सकती है. ऐसे में भारत, खाड़ी के साथ गहरे श्रम संबंधों वाले एक प्रमुख तेल आयातक देश के रूप में,सबसे अधिक प्रभावित होने वाले देशों में से एक होगा.
अमेरिका और दुबई से आने वाले रेमिटेंस में अंतर क्या है
हाल के सालों में एक सकारात्मक बदलाव यह हुआ है कि अब भारत को अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया जैसे विकसित देशों से भी बड़ी मात्रा में रेमिटेंस मिलने लगा है. इससे कुछ स्थिरता आती है. लेकिन यह पूरी सच्चाई नहीं है. खाड़ी में काम करने वाले और पश्चिमी देशों में काम करने वाले लोग अलग हैं. अमेरिका में काम करने वाला आईटी प्रोफेशनल हैदराबाद या चेन्नई के एक संपन्न परिवार की मदद करता है,जिसके पास आय के दूसरे साधन भी हैं, जबकि दुबई में काम करने वाला मजदूर आजमगढ़ के एक ऐसे परिवार को सहारा देता है, जिसके पास आय का कोई दूसरा विकल्प नहीं है. इसलिए कुल आंकड़े ठीक दिख सकते हैं, लेकिन गरीब परिवार बुरी तरह प्रभावित होंगे.

इजरायल के सबसे बड़े शहर तेल अबीब में ईरान के साथ जारी युद्ध को रोकने के लिए प्रदर्शन करते लोग.
युद्ध और अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा कारक क्या है
समय ही सबसे बड़ा फैक्टर है. इस युद्ध पर जितने भी गंभीर विश्लेषण हुए हैं, वे एक ही बात कहते हैं, अगर युद्ध छोटा होता है तो नुकसान संभाला जा सकता है, लेकिन युद्ध अगर लंबा चलता है तो हालात बिगड़ जाएंगे. यह सिर्फ कम या ज्यादा नुकसान का फर्क नहीं है, बल्कि पूरी तरह अलग स्थिति बन जाती है.
अगर युद्ध कुछ हफ्तों में खत्म हो जाए- तेल की कीमतें थोड़े समय के लिए बढ़ेंगी, डर की वजह से कुछ समय तक ज्यादा पैसा (रेमिटेंस) आएगा, उड़ानों और व्यापार में थोड़ी परेशानी होगी. फिर धीरे-धीरे सब सामान्य हो जाएगा.भारत की अर्थव्यवस्था इस झटके को संभाल लेगी. घरों का बजट थोड़ा दबाव में आएगा, लेकिन पूरी तरह नहीं टूटेगा. भारतीय रिजर्व बैंक रुपये को संभाल लेगा और आर्थिक स्थिति नियंत्रण में रहेगी. लेकिन अगर युद्ध चार-छह महीने या उससे ज्यादा चलता है, तो स्थिति पूरी तरह बदल जाती है- खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था कमजोर पड़ने लगती है, कतर और कुवैत जैसे देशों में उत्पादन 14 फीसदी तक गिर सकता है, यूएई और सऊदी अरब में भी करीब पांच फीसदी की गिरावट आ सकती है, निर्माण कार्य रुक सकते हैं, पर्यटन लगभग तबाह हो जाएगा. राजस्व में कमी होने पर सबसे पहले विदेशी मजदूरों की नौकरियों में कटौती होगी. इसका सीधा असर भारत पर पड़ेगा. करीब साढ़े चार करोड़ भारतीय परिवार जो खाड़ी से आने वाले पैसों पर निर्भर हैं, उनकी आय धीरे-धीरे बंद होने लगेगी.एक-एक करके कॉन्ट्रैक्ट खत्म होंगे और मजदूर वापस लौटने लगेंगे.
इसी समय एक दूसरी समस्या भी खड़ी होती है, यह है, लंबे समय तक महंगा तेल.इससे भारत का आयात खर्च बहुत बढ़ जाएगा और सरकारी तेल कंपनियों पर दबाव बढ़ेगा, जिन पर तेल की कीमतों को स्थिर रखने का राजनीतिक दबाव पहले से है. इसके अलावा फर्टिलाइजर (खाद) महंगी हो जाएगा. इसका असर खेती-किसानी पर पड़ेगा. भारतीय रिजर्व बैंक के सामने भी मुश्किल आएगी, उसे महंगाई भी संभालनी है और विकास भी. इसका असर यह होगा कि पहले जो राहत देने वाली नीतियां (जैसे ब्याज दर कम करना) सोची जा रही थीं,उन्हें लागू करना मुश्किल होगा.
सबसे अहम बात यह है कि खाड़ी में काम कर रहे करीब 90 लाख भारतीयों ने यह युद्ध नहीं चुना है. उन्होंने इसके लिए अमेरिका में वोट नहीं दिया है और न संयुक्त राष्ट्र में उनकी कोई ताकत है और न ही ईरान या इजरायल के फैसलों में उनकी कोई भूमिका है. इसके बाद भी वो इस युद्ध के बीच में फंस गए हैं. जो 51 अरब डॉलर वे हर साल भारत भेजते हैं, वह सिर्फ एक आंकड़ा भर नहीं है, वह बच्चों की फीस, घर का राशन, किराया और दवाइयों का खर्च है. यह सहारा बना रहेगा या टूट जाएगा, यह एक ही चीज पर निर्भर है, वह है समय. इसलिए भारत को अभी से इस बात के लिए तैयार रहना चाहिए कि अगर युद्ध लंबा चला, तो उसका असर बहुत गंभीर हो सकता है.
(डिस्क्लेमर: लेखक अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के पश्चिम एशिया और उत्तर अफ्रीका अध्ययन विभाग में पढ़ाते हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)
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