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पहाड़ी हीर रांझा, गुजु मलारी का दुनिया से परिचय कराती 'चल मेरी ढोलक ठुमक ठुम'

Himanshu Joshi
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    मार्च 30, 2025 00:27 am IST
    • Published On मार्च 30, 2025 00:25 am IST
    • Last Updated On मार्च 30, 2025 00:27 am IST
पहाड़ी हीर रांझा, गुजु मलारी का दुनिया से परिचय कराती 'चल मेरी ढोलक ठुमक ठुम'

उत्तराखंड साहित्य गौरव सम्मान एवं हाल ही में उमेश डोभाल स्मृति सम्मान पुरस्कार से सम्मानित लेखक महावीर रवांल्टा की किताब 'चल मेरी ढोलक ठुमक ठुम' समय साक्ष्य प्रकाशन से प्रकाशित होकर आई है, किताब में लेखक ने रवाईं क्षेत्र की 46 लोक कथाओं को शामिल किया है. इन कथाओं को पढ़ते मनुष्य और जानवरों के सदियों पुराने आत्मीय संबंधों का पता चलता है, इन रवाईं लोक कथाओं का महावीर ने हिंदी अनुवाद न किया होता तो शायद हिंदी साहित्य के पाठकों को कभी पहाड़ी हीर रांझा, गुजु मलारी के बारे में पता ही न चलता. 

शुरुआत से ही मनुष्य और जानवरों के आत्मीय संबंधों पर प्रकाश डालती लोककथाएं

किताब की पहली कहानी 'सात रानियां और राजकुमार' पढ़ते हम समझ सकते हैं कि मनुष्य और जानवरों के बीच आत्मीय संबन्ध सदियों से चले आ रहे हैं, इसी तरह 'सौतेली मां' की पंक्ति 'रूपा खाडू के पास जाकर अपना दुखड़ा रोती. एक दिन खाडू बहन रूपा को ढाँढस देता हुआ बोला, तू रोया मत कर, जब तू मुसीबत में हो,मेरे सींगों पर डंडे से मारा कर तब जो तू चाहेगी वह सब काम हो जाएगा' भी साबित करती है कि जानवर, इंसान के हमेशा से करीब रहा है. हम कई लोककथाओं में जानवरों को इंसान के साथ रिश्तों में भी बंधा हुआ पढ़ते हैं, जैसे 'आदमी की बुद्धिमत्ता' में सियार और इंसान के बीच मामा, भांजे का रिश्ता है.

इंसान को उसके आचरण की सीख देती किताब

कई लोककथाओं में इंसान के आचरण पर भी लिखा गया है. 'अकड़' लोककथा मात्र बारह पंक्तियों की है और उसे पढ़ते ऐसा लगता है कि दुनिया के हर पति पत्नी का रिश्ता एक जैसा ही होता है. 'आचरण' लोककथा में रिश्ते नातों पर प्रकाश डालते, घर परिवार में एक दूसरे के प्रति अच्छा व्यवहार करने की सीख दी गई है जैसे 'कुत्ते के आचरण वाले अपने बेटे बहुओं के साथ उसका हिरण का आचरण कैसे मेल खा सकता था?' पंक्ति से हमारी समझ बनती है कि हमें घर के बड़े बूढ़ों के साथ अच्छा व्यवहार करना चाहिए.

लोक कथाओं से देवताओं पर गहरा होता रहा है विश्वास

'श्रीपुरी ढोल' में बागा जैसा वीर जब राजा से कहता है कि 'महाराज! दाहिने हाथ से मैं सिर्फ अपने ईष्ट देवता महासू को ही प्रणाम करता हूं किसी और को नही'. लोक कथाओं में हमेशा से यह प्रचलित रहा है कि बागा बहुत वीर था और ऐसा वीर भी हमेशा महासू देवता के प्रति श्रद्धा भाव रखता है तो उससे यह प्रमाण मिलते हैं कि इन लोक कथाओं ने लोगों के मन में अपने देवताओं के प्रति विश्वास को और भी गहरा करने का काम किया है.

पहाड़ी हीर रांझा, गुजु मलारी का दुनिया से परिचय कराती  'चल मेरी ढोलक ठुमक ठुम'

'गुजु मलारी' पहाड़ी बैकग्राउंड की एक लोक कथा है, जिसमें लड़का भेड़ बकरी चराता है और उसे बचपन में ही ब्याह दी गई मलारी से प्रेम हो जाता है. पिता की प्रेमी से न मिलने देने की जिद और प्रेमी के वियोग में दम तोड़ देने वाली प्रेमिका की यह कहानी हीर रांझा की मशहूर कहानी से कम नही है. इस लोक कथा को पढ़ते हुए यह साबित हो जाता है कि पहाड़ में ऐसी कई कहानियां रही होंगी जो दुनिया के सामने आती तो खूब लोकप्रिय होती, महावीर ने इस कहानी का हिंदी अनुवाद कर एक शुरुआत तो की ही है.

पहाड़ के नामों की कहानी इन लोक कथाओं से

पहाड़ों में बहुत से स्थान ऐसे हैं जिनके नामों के पीछे कोई न कोई लोक कथा अवश्य होती है. इस किताब के जरिए हमें ऐसे ही कुछ स्थानों की कहानी के बारे जानकारी प्राप्त होती है. पृष्ठ संख्या 52 में 'दंड' लोक कथा में लिखा है, कालसी के समीप निर्जन जंगल का स्थान कौवे की काँव काँव के कारण 'क्वा बासणी' कौवा बोलना के नाम से प्रसिद्ध हुआ. 'विनाश' में भी लिखा है 'उनके अट्ठारह कुंवरों के साथ उनकी पूजा कौंल महाराज के साथ की जाती है. बंग्वाणों के नाम पर ही इस क्षेत्र का नाम बंगाण हुआ'.

'चालाक घुघतू' जैसी लोककथा पाठकों को बोर नहीं होने देती है. किताब में मात्राओं की गलती भी दिखाई दी है, जिसने कहीं कहीं पर इसे पढ़ने का मजा किरकिरा किया है. पृष्ठ 97 में बलि को बति लिख दिया गया है तो 100 में नाक को नाग.

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