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This Article is From Feb 24, 2014

चुनाव डायरी : छोटे-छोटे गठबंधनों की तलाश में बीजेपी - क्यों...?

Akhilesh Sharma
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  • Updated:
    नवंबर 20, 2014 13:18 pm IST
    • Published On फ़रवरी 24, 2014 12:44 pm IST
    • Last Updated On नवंबर 20, 2014 13:18 pm IST

''बीजेपी मजबूत होगी तो सहयोगी पार्टियां खुद-ब-खुद चली आएंगी...'' यह कहना था, भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के शीर्ष रणनीतिकारों का, लेकिन लोकसभा चुनाव नजदीक आते ही पार्टी ने कई राज्यों में छोटे-छोटे गठबंधन करना शुरू कर दिया है। इन चुनाव-पूर्व गठबंधनों की खास बात यह है कि बीजेपी मिलकर चुनाव लड़ना चाहती है, और इन सहयोगी पार्टियों के साथ सीटों का बंटवारा करने में उसे दिक्कत नहीं है।

बिहार में बीजेपी ने रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी के साथ सीटों के तालमेल की बात शुरू की है। वैसे, रामविलास पासवान की लालू प्रसाद की राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) और कांग्रेस के साथ भी बात चल रही थी, लेकिन सीटों की संख्या और पसंद को लेकर बात अभी तक नहीं बन पाई। इस बीच पासवान ने बीजेपी के साथ भी चर्चा शुरू कर दी, और बीजेपी ने पासवान को लेकर उत्साह दिखाया है। पासवान के साथ आने से नरेंद्र मोदी को व्यक्तिगत तौर पर भी फायदा होगा, क्योंकि गुजरात दंगों के बाद वाजपेयी मंत्रिमंडल से इस्तीफा देने वाले पासवान सबसे पहले मंत्री थे, और उल्लेखनीय है कि बिहार में उनके करीब सात-आठ फीसदी वोट हैं।

उधर, असम में बीजेपी एक बार फिर असम गण परिषद (एजीपी) के साथ चुनावी गठबंधन करना चाह रही है। पिछले लोकसभा चुनाव में इसी गठबंधन के चलते बीजेपी ने राज्य में चार सीटें जीती थीं, लेकिन एजीपी को सिर्फ एक सीट मिली थी। एजीपी को लगता है कि उसके वोट तो बीजेपी को ट्रांसफर हो जाते हैं, मगर बीजेपी के वोट उसे नहीं मिल पाते, इसलिए वे तालमेल के इच्छुक नहीं हैं। लेकिन इसके बावजूद बीजेपी का कहना है कि हाल में असम और अन्य पूर्वोत्तर राज्यों में नरेंद्र मोदी की रैलियों में जुटी भारी भीड़ बताती है कि वहां के लोग मोदी को प्रधानमंत्री देखना चाहते हैं, इसलिए एजीपी और बीजेपी साथ आ सकते हैं।

इस बीच, उत्तर प्रदेश में भी बीजेपी कुछ छोटी-छोटी पार्टियों से तालमेल कर सकती है, और महाराष्ट्र में शिवसेना, आरपीआई (अठवले) और स्वाभिमानी शेतकारी संगठन के साथ महागठबंधन बन ही चुका है।

दरअसल, कोशिश है कांग्रेस-विरोधी वोटों का बंटवारा रोकने की, और पूरे देश में यह संदेश देने की भी कि नरेंद्र मोदी को नेता घोषित करने के बावजूद बीजेपी खुद को सेक्यूलर कहने वाली कई पार्टियों के लिए अछूत नहीं है।

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