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This Article is From Jan 16, 2017

उत्तर प्रदेश के दंगल में सुल्तान बनेगा लोकतंत्र...

Dr Vijay Agrawal
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    जनवरी 16, 2017 19:08 pm IST
    • Published On जनवरी 16, 2017 19:08 pm IST
    • Last Updated On जनवरी 16, 2017 19:08 pm IST
उत्तर प्रदेश के चुनाव, चाहे वे लोकसभा के हों या विधानसभा के, उस पर उस प्रदेश की ही नहीं बल्कि पूरे देश की नजर  हमेशा से ही रही है, सो इस बार भी है. गणना वाली राजनीतिक प्रणाली में सबसे बड़ी जनसंख्या वाले राज्य की हैसियत भी बड़ी हो जाती है, वह तो है ही, लेकिन इस बार के चुनाव परिणाम और चुनावी परिदृश्य, दोनों अपने अंदर इससे कई गुना अधिक अर्थों को समेटे हुए हैं. यह अर्थ इस मायने में इतना महत्वपूर्ण नहीं है कि यह देश के सभी चुनावों के लिए कोई मापदंड स्थापित करेगी, बल्कि यह है कि यह देश के वर्तमान राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक मिजाज का प्रमाण प्रस्तुत करते हुए भविष्य की राजनीति के स्वास्थ्य का निर्धारण करने की शुरुआत करेगी.

और इस बात की शुरुआत हो चुकी है. पारिवारिक स्तर के सामंतीय राजनीतिक दंगलों की अंतिम नियति से. इतिहास सत्ता संघर्ष के लिए भाई-भाई के झगड़े और युद्ध के तो उदाहरण पेश करता है, लेकिन बाप-बेटे के संघर्ष की गाथाएं पढ़ने को नहीं मिलतीं. फिलहाल लोगों का ध्यान इस बात पर कम है कि वहां सरकार किसकी बनने वाली है. वे तो अभी उत्तर प्रदेश की सरकार को सम्हालने वाली समाजवादी पार्टी के ”महाभारत प्रदेश” में अधिक रस ले रहे हैं. हो सकता है कि इस पारिवारिक महामंथन के बाद इस तरह के राजनीतिक दलों के बारे में कोई ऐसा अमृतत्व निकले, जो ‘धर्मरक्षार्थ‘ के काम आए. दलों में आंतरिक लोकतंत्र होना चाहिए, इस ओर बहुत स्पष्ट संकेत किए जाने लगे हैं.

अगली महत्वपूर्ण बात है कि उत्तर प्रदेश का चुनाव-अभियान कैसा रहता है, और उसके परिणाम कैसे रहते हैं. यह बात तो पक्की है कि विमुद्रीकरण के बाद हमारे राजनीतिक दलों और राजनेताओं तथा इनको भरे हुए थैले सौंपने वाले पूंजीपतियों की माली हालत खराब हुई है. काफी खराब हुई है. इसलिए राजनीतिक पर्यवेक्षकों को आगे चलकर उत्तर प्रदेश के इस ‘चुनावी-उत्सव‘ से यह प्रश्न तो करना ही पड़ेगा कि ‘भाई! यहां इतना सन्नाटा क्यों है?, बावजूद इस सन्नाटे के सरकार तो बनेगी ही. निश्चित तौर पर यह घटना राजनेताओं के लिए आंखें खोलने वाली होगी. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपनी कार्यकारिणी की बैठक में बहुत साफ-साफ कह भी चुके हैं कि चुनावी चंदों को हिसाब के दायरे में लाया जाना चाहिए. यह चुनाव इसी बात की जनघोषणा करने वाला सिद्ध होगा.

दरअसल, मुलायम और अखिलेश का यह राजनीतिक दंगल सत्ता का संघर्ष उतना नहीं है, जितना कि सत्ता तक पहुंचने की प्रणाली का संघर्ष है. एक खेमा अभी भी राजनीति में जातिवाद, धन और बल के पुराने प्रभुत्व को लेकर अखाड़े में उतरना चाह रहा है, तो दूसरा विकास एवं थोड़े-बहुत सुशासन की मांग के बदले हुए प्रतिमानों को लेकर. अभी तक के हालात तो यही कहते हुए नजर आ रहे हैं कि यदि इन दोनों के बीच के जीते हुए उम्मीदवारों की गणना की जाएगी, तो बेटा, पिता पर कई गुना भारी पड़ेगा. यानी कि यह सिद्ध हो जाएगा कि चुनाव जीतने के नुस्खे बदल चुके हैं. और इसके साथ ही यह भी सिद्ध हो जाएगा कि देश की राजनीति भी बदल चुकी है. जाहिर है कि हिंदुस्तान बदल रहा है.


डॉ. विजय अग्रवाल वरिष्ठ टिप्पणीकार हैं...

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