बिहार में इन दिनों भारतीय जनता पार्टी अपने सहयोगियों से परेशान है। उसकी परेशानी का कारण है पिछले साल लोकसभा चुनाव में सहयोगियों के साथ चुनाव प्रचार को लेकर सीटों का तालमेल जितना आसान और आक्रामक था, विधानसभा चुनाव के दिन जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, वही सहयोगी उसके लिए हर दिन अपने नए बयान से मुश्किलें खड़ी कर रहे हैं। बीजेपी के लिए सबसे ज्यादा परेशानी का कारण है उपेन्द्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी।
इसने न केवल उपेन्द्र कुशवाहा को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने की बीजेपी से अपील की है बल्कि सीटों के तालमेल पर भी अपना फार्मूला दे डाला, जो बीजेपी क्या किसी भी राजनतिक दाल को कभी मंजूर नहीं हो सकता।
दरअसल, उपेन्द्र कुशवाहा को जानने वाले मानते हैं कि बीजेपी के लिए कुशवाहा की तरफ से मुश्किलों पर किसी को आश्चर्य नहीं करना चाहिए, क्योंकि कुशवाहा न केवल अति महत्वकांक्षी नेता हैं बल्कि केंद्र में कैबिनेट मंत्री का दर्जा न मिलने से वो खुश भी नहीं हैं।
और जैसे-जैसे चुनाव के मद्देनजर बीजेपी ने एनडीए में और दलों जैसे पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी की पार्टी को शामिल कराया है, उससे साफ़ है कि बीजेपी को इस बात का भरोसा है कि लालू-नीतीश-कांग्रेस के सामने वो बिना सहयोगी दलों के एक कदम नहीं चल सकती और इसी कमजोरी को भांपते हुए कुशवाहा एक के बाद एक हर दिन नई चाल चल रहे हैं, जिससे उनके विरोधियों से ज्यादा बीजेपी को सफाई देनी पड़ रही है।
सोमवार को राष्ट्रीय जनता दल अध्यक्ष लालू यादव, जो हर दिन बीजेपी को मुख्यमंत्री का अपना उमीदवार घोषित करने के लिए चुनौती देते हैं, उन्होंने भी चुटकी ली कि कुशवाहा में खराबी क्या है।
बीजेपी के लिए परेशानी की जड़ में एक और नेता हैं रामविलास पासवान। पासवान सार्वजनिक तौर पर मानें या नहीं, लेकिन न केवल अपने मंत्रालय बल्कि उनके पूर्व के कार्यकाल को देखने वाले मानते हैं कि इस बार के पासवान में पहले जैसी कोई बात नहीं और न ही उनके मंत्रालय में नरेंद्र मोदी के प्रभाव के कारण चल पाती है।
दूसरा पासवान, जीतन राम मांझी के आने से बिलकुल नाखुश हैं और यही कारण है कि उन्होंने सार्वजनिक रूप से कह दिया कि मांझी के उन पांच विधयाकों को अगर विधानसभा चुनाव में टिकट दिया गया, जिन्होंने उनकी पार्टी छोड़कर जनता दल यूनाइटेड का दामन थामा लिया था, तब वह उनके खिलाफ अपने प्रत्याशी उतारेंगे।
पासवान ने अल्टीमेटम मांझी को नहीं दिया है, बल्कि उन्होंने भारतीय जनता पार्टी को साफ़ कर दिया है कि टिकट के बंटवारे में वो अपनी मनमानी नहीं कर सकती।
वहीं मांझी इस पूरे घटनाक्रम से निश्चित रूप से दुखी हैं कि एनडीए में स्वागत की जगह शर्तों की भरमार की जा रही है। आने वाले दिनों में अगर वह रूठने का राजनीतिक नाटक करें तो बीजेपी के नेता भी मानते हैं कि इसमें किसी को आश्चर्य नहीं करना चाहिए।
बिहार बीजेपी की बाकी बची खुची कसर उनके वह नेता पूरी कर रहे हैं, जो किसी न किसी कारण से सुशील मोदी से नाराज हैं या उन्हें नेता स्वीकार करने में दिक्कत है। इसमें डॉ. सी.पी. ठाकुर ने तो सोमवार को स्पष्ट कर दिया कि वो भी मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार हैं। आने वाले दिनों में मोदी से नाराज और नेता ऐसे ही खुद को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करेंगे।
लेकिन बिहार बीजेपी के नेताओं को उम्मीद है कि आखिरकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी न केवल प्रचार की कमान संभालेंगे बल्कि सहयोगियों को समझाने की औपचारिकता भी पूरी करेंगे और फ़िलहाल नीतीश कुमार से मुकाबले में बीजेपी हो या उनके सहयोगी, सबकी अब आखिरी उम्मीद हैं नरेंद्र मोदी।
This Article is From Jun 22, 2015
मनीष कुमार की कलम से : बीजेपी के सहयोगी क्यों हैं रूठे रूठे
Manish Kumar
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Updated:जून 22, 2015 23:32 pm IST
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Published On जून 22, 2015 23:01 pm IST
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Last Updated On जून 22, 2015 23:32 pm IST
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