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This Article is From Feb 20, 2015

सुशांत सिन्हा की कलम से : बिहार में पिक्चर अभी बाकी है...

Sushant Sinha, Rajeev Mishra
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  • Updated:
    फ़रवरी 21, 2015 00:01 am IST
    • Published On फ़रवरी 20, 2015 23:56 pm IST
    • Last Updated On फ़रवरी 21, 2015 00:01 am IST

बिहार के सियासी ड्रामे पर नज़रें गड़ाए क्लाइमेक्स का इन्तज़ार करने वालों में अगर आपका नाम भी शुमार था तो ज़ाहिर है ऐन्टी क्लाइमेक्स देखकर निराश होने वालों की लंबी फ़ेहरिस्त में भी आपका नाम ज़रूर होगा। दरअसल, बीते दस दिन से जिस शक्ति परीक्षण के ज़रिए नीतीश कुमार को सियासी पटखनी देने का दंभ जीतन राम मांझी भर रहे थे उसकी नौबत तक नहीं आई। मांझी जानते थे कि वो 117 के जादुई आंकड़े से इतने दूर हैं कि उनके लिए बेहतर है कि वो उनके मुख्यमंत्री आवास के ही नज़दीक मौजूद गवर्नर हाउस जाकर इस्तीफ़ा दे आएं। और हुआ भी यही। मीडिया की नज़रें विधानसभा के बाहर नज़रें गड़ाए इन्तज़ार ही करती रह गईं कि विधानमंडल के अंदर न जाने आज क्या क्या होगा, लेकिन हाथ लगा तो चुपचाप जाकर दिया गया मांझी का इस्तीफ़ा।

लेकिन सवाल ये कि क्या इसी एंटी क्लाइमेक्स के साथ ही इस पटकथा का आख़िरी अध्याय भी ख़त्म हो जाता है? नहीं। दरअसल, ये लड़ाई कभी मांझी के कुर्सी पर बने रहने या कहें कि मांझी की कुर्सी बची रहने की थी ही नहीं। मांझी भी जानते थे कि उनके पास संख्या बल नहीं है। मांझी भी जानते थे कि उन्हें हर हाल में इस्तीफ़ा देना ही होगा। बीजेपी भी जानती थी कि उसके 87 विधायकों का समर्थन भी मांझी की नाव डूबने से नहीं बचा सकेगा। लेकिन सब के सब जानते हुए भी बीते 15 दिनों में जो कुछ भी हुआ वो उस बाकि बची फ़िल्म का हिस्सा है जो नवंबर में आनी है।

दरअसल, बिहार विधानसभा का मौजूदा कार्यकाल 29 नवंबर को ख़त्म हो रहा है। यानि अक्टूबर के अंत या नवंबर के शुरुआत में बिहार में चुनाव होंगे। और ये चुनाव बीते कई दशकों का सबसे अलग चुनाव होने जा रहा है। एक ऐसा चुनाव जिसमें पहली बार बीजेपी पूरे सूबे में चुनाव लड़ेगी, नीतीश लालू चुनावी अखाड़े में एक दूसरे का साथ देंगे और साथ ही आऱजेडी के लिए ये अस्तित्व बचाए रखने की लड़ाई होगी। यानि साफ़ है कि मुकाबला कड़ा ही नहीं बल्कि ज़बरदस्त होगा। ऐसे में बीते 15 दिनों में बिहार की राजनीति में जो कुछ भी हुआ उसे नवंबर के चुनावों से जोड़कर देखने की कोशिश करेंगे तो आपको समझ आ जाएगा कि क्यों बार बार पूरी लड़ाई 'महादलित' की लड़ाई बनकर रह गई या यूं कहें कि बनाकर रख दी गई।

दरअसल, बीजेपी जानती है कि जब तक वो नीतीश कुमार की जेडीयू के साथ मिलकर चुनाव लड़ती रही उसके हिस्से की ज़िम्मेदारी निर्धारित थी। बीजेपी अपने पारंपरिक सवर्ण वोट बैंक को आकर्षित करती थी और उसकी साथी जेडीयू, नीतीश कुमार के नाम और चेहरे पर दलित वोट बैंक में सेंध लगाती थी। लेकिन आने वाले नवंबर के चुनाव में ऐसा नहीं हो पाएगा क्योंकि बीजेपी और जेडीयू इस दफ़ा अलग अलग चुनाव लड़ रहे होंगे। और बीजेपी को पता है कि उसे अगर बिहार चुनाव जीतना है तो उसे नीतीश कुमार के दलित वोट बैंक पर चोट पहुंचानी होगी। और इसीलिए, जीतन राम मांझी को पद से हटाए जाने की पूरी लड़ाई महादलित के अपमान से जोड़ दी गई। मांझी भी समझ रहे थे कि बीते कुछ दिनों में जिस तरह से उनकी ही पार्टी में उनके लिए विरोध था, उनका भविष्य जेडीयू में बहुत बेहतर नहीं था। और इसीलिए उन्होंने भी महादलित के अपमान का ट्रम्प कार्ड खेला।

इससे दो ही बातें हो सकती थीं, या तो नीतीश कुमार, दलित वोट बैंक में चोट के डर से अपने कदम पीछे खींच लेते या मांझी को मौका मिल जाता खुद को दलितों के पैरोकार के तौर पर स्थापित करने का। नीतीश पीछे हटे नहीं और मांझी आगे बढ़ते चले गए। और आगे भी कुछ यूं बढ़े कि उन्होंने 15 दिन के अंदर कई ऐसे फ़ैसले लिए जो सीधे सीधे बताते थे कि वो कैसे खुद को दलितों के सामने नीतीश के विकल्प के तौर पर रख देना चाहते थे। महादलित की लिस्ट बढ़ाने से लेकर, तमाम दलित अधिकारियों की बैठक में शामिल होने तक, या फिर सरकारी टेंडर में एससी, एसटी को वरीयता देने तक.. मांझी आलोचनाओं के बीच भी फ़ैसले लेते चले गए। उन्हें पता था कि इनमें से कई फ़ैसले भले पलट दिए जाएं लेकिन वो दलित वोटर के मन में नीतीश की छवि पलटने की स्थिति भी पैदा कर सकते हैं। और इसीलिए ये पूरी लड़ाई कुर्सी बचाने की नहीं बल्कि महादलित के सम्मान के लिए लड़ी जाने वाली लड़ाई बनकर रह गई।

हालांकि नीतीश के कमज़ोर होने में सिर्फ़ बीजेपी ही फ़ायदा नहीं देख रही होगी बल्कि आरजेडी के लालू यादव भी जानते हैं कि मज़बूत नीतीश कुमार का मतलब है कि चुनाव जीतने के बाद भी उन्हें और उनकी पार्टी को वो जगह नहीं मिल पाना जिसका सुख वो 15 साल सत्ता में रहते हुए भोग चुके हैं। मज़बूत नीतीश का मतलब है कि ख़ुद को किंग या किंग मेकर की भूमिका में देखने वाले लालू, बेहद कमज़ोर नज़र आएंगे। इसलिए कहीं न कहीं, महादलित के नाम पर लड़ी जा रही ये लड़ाई नीतीश कुमार को छोड़कर सबके लिए फ़ायदे का सौदा थी।

और इसीलिए ये साफ़ है कि मांझी के इस्तीफ़े के साथ ही पिक्चर ख़त्म नहीं होती। पिक्चर अभी बाकि है। आने वाले बिहार विधानसभा चुनाव में, मांझी के साथ जो कुछ भी हुआ वो एक बड़ा मुद्दा बनेगा और अगर जनता ने इस मुद्दे को विकास के ऊपर तरजीह दी तो बदलते बिहार की तस्वीर फिर बदलकर रह जाएगी।

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