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This Article is From Apr 03, 2018

आखिर CM नीतीश कुमार ने इस महीने BJP नेताओं के साथ एक भी बैठक क्यों नहीं की?

बिहार में महीने भर का लंबा विधानसभा सत्र खत्म होने को है, लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस दौरान अपने गठबंधन साथी भाजपा के लॉमेकरों के साथ एक भी संयुक्त बैठक नहीं बुलाई.

आखिर CM नीतीश कुमार ने इस महीने BJP नेताओं के साथ एक भी बैठक क्यों नहीं की?
बिहार के सीएम नीतीश कुुमार (फाइल फोटो)
  • नीतीश कुमार ने बीजेपी नेताओं के साथ इस महीने संयुक्त बैठक नहीं की
  • 'कानून व्यवस्था के लिए नीतीश को चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है'
  • जेडीयू के दलित विधायकों ने एक मार्च का नेतृत्व किया
पटना: बिहार में महीने भर का लंबा विधानसभा सत्र खत्म होने को है, लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस दौरान अपने गठबंधन साथी भाजपा के लॉमेकरों के साथ एक भी संयुक्त बैठक नहीं बुलाई. यह स्पष्ट संकेत तो नहीं है कि उत्तर प्रदेश के अलावा  बिहार एक और राज्य है, जहां भाजपा से उसके सहयोगी खुश नहीं हैं. उत्तर प्रदेश में, बीजेपी के सहयोगी और राज्य मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने राज्यसभा चुनाव से पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से बात करने से इनकार कर दिया था. उस समय भाजपा को उनके समर्थन की सबसे ज्यादा जरूरत थी, लेकिन बीच में पार्टी अध्यक्ष अमित शाह को आगे आना पड़ा.
लगता है कि बिहार में भी भाजपा इन समस्याओं का हिस्सा बनती जा रही है.

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मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के करीबी सूत्रों का कहना है कि उन्हें इस समय राज्य में कानून व्यवस्था को स्थापित करने के लिए काफी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. नीतीश कुमार के जनता दल यूनाइटेड (जेडी-यू) के दलित विधायकों ने आज राज्यपाल के घर तक एक मार्च का नेतृत्व किया. यह मार्च  भाजपा के उलझनों के लिए काफी है, जो इस समय केंद्र में है. जेडीयू नेता श्याम रजाक ने कहा, "हम दलित हैं और हम एकजुट हैं." बीते दिनों भागलपुर में सांप्रदायिक हिंसा फैलाने को दोषी केंद्रीय मंत्री अश्विनी चौबे के बेटे और भाजपा नेता अर्जित शाश्वत को लेकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और भाजपा एकमत नहीं है.

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अर्जित शाश्वत को बीते शनिवार को बिहार की राजधानी पटना से पुलिस ने गिरफ्तार किया था. अर्जित शाश्वत की गिरफ्तारी नहीं होने पर विपक्षी नीतीश कुमार पर हमलावर थे. साथ ही विपक्ष ने आरोप लगया था कि नीतीश कुनार इस मामले पर काफी नरमी दिखा रहे हैं. इस संबंध में तेजस्वी यादव ने नीतीश कुमार के उस बयान पर हमला किया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि हम राज्य में शांति बहाल करने के लिए किसी भी कीमत का भुगतान करने को तैयार हैं.

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हालांकि, भाजपा के वरिष्ठ नेता और उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने सांप्रदायिक तनाव शांत करने में सक्रिय भूमिका निभाई, लेकिन नीतीश कुमार इन दिनों रामविलास पासवान जैसे अन्य सहयोगियों के करीब बढ़ते दिखे हैं. महागठबंधन से अलग होने के बाद नीतीश कुमार ने अपनी नई सरकार में राम विलास पासवान के छोटे भाई पसुपति कुमार पारस को शामिल किया, जो उस समय बिहार विधानसभा के सदस्य भी नहीं थे. केंद्र में नरेन्द्र मोदी सरकार में केंद्रीय मंत्री राम विलास पासवान नीतीश कुमार की तुलना में बिहार में भाजपा की आलोचना ज्यादा करते दिखे हैं.

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अररिया सीट पर हुए उपचुनाव में आरजेडी की जीत के बाद बिहार के भाजपा अध्यक्ष नित्यानंद राय ने कहा था कि इस जीत के बाद यह आईएसआई हब बन जाएगा, लेकिन  नीतीश कुमार ने निजी तौर पर इस संबंध में कोई टिप्पणी नहीं की थी.लेकिन पासवान ने स्पष्ट रूप से बयान की निंदा की. उन्होंने उपचुनाव के परिणाम के बाद ऐसा किया, जिसे राजद के लिए एक जीत के रूप में देखा गया था, जब उसके प्रमुख लालू यादव जेल में थे. पासवान ने कहा कि भाजपा नेताओं को ऐसी टिप्पणी नहीं करना चाहिए, जो मुसलमानों के बीच आतंक की भावना पैदा करे. उन्होंने यह भी कहा कि भाजपा नेताओं को उनकी भाषा पर लगाम लगाना चाहिए. 

VIDEO: दंगों की आग में सुलगता बिहार
आगामी 14 अप्रैल को अम्बेडकर जयंती के मौके पर  नीतीश कुमार दलित सेना की एक बैठक में शामिल होंगे, जिसे पासवान ने बुलाया है. सूत्रों का कहना है कि पासवान और नीतीश कुमार चाहते हैं कि भाजपा अपने सहयोगियों का सम्मान करे. कई नेताओं का सुझाव है कि भाजपा की अगुवाई वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को पुनर्जीवित किया जाना चाहिए और अमित शाह द्वारा एक संयोजक को शीघ्र ही नियुक्त किया जाना चाहिए, जो पार्टी के उन नेताओं से निपट सके जो बिना सोचे समझे निराधार बयान देते हैं.
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