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फर्जी 'ED डायरेक्टर' बन डीएम को फोन, बना रहा था दबाव... 12 साल से जालसाजी कर रहा बिहार का 'नटवरलाल' गिरफ्तार

बिहार में भोजपुर के जिलाधिकारी को प्रवर्तन निदेशालय का निदेशक बताकर जालसाज अभिषेक ने दबाव बनाने की कोशिश की, लेकिन अब वो सलाखों के पीछे पहुंच गया है. पटना के अभिषेक भोपल्का का लंबा आपराधिक इतिहास है, जो वर्षों से फर्जी पहचान बनाकर धोखाधड़ी करता रहा है.

फर्जी 'ED डायरेक्टर' बन डीएम को फोन, बना रहा था दबाव... 12 साल से जालसाजी कर रहा बिहार का 'नटवरलाल' गिरफ्तार
आरा:

वो कभी खुद को न्‍यायाधीश, कभी बड़ा पुलिस अधिकारी, तो कभी किसी मंत्री का निजी सहायक बताता था. इसके जरिए वह कभी किसी अधिकारी के पक्ष में दबाव बनाने की कोशिश, तो कभी किसी शख्‍स का काम निकलवाने के लिए बड़े अधिकारी पर प्रेशर बनाता. इस बार जालसाज ने खुद को प्रवर्तन निदेशालय (ED) का निदेशक बताकर जिला पदाधिकारी बिहार के भोजपुर जिले के जिलाधिकारी तनक  तनय सुल्तानिया को फोन किया और दबाव बनाने की कोशिश की. लेकिन इस बार ये जालसाज गलत सरकारी अधिकारी के हत्‍थे चढ़ गया. जांच के दौरान यह खुलासा हुआ कि आरोपी का आपराधिक इतिहास काफी लंबा है. वह कोई नया अपराधी नहीं है, बल्कि वर्षों से इसी तरह की धोखाधड़ी और ठगी की घटनाओं को अंजाम देता रहा है. आरोपी केवल फोन कॉल तक ही सीमित नहीं था, बल्कि वह सोशल मीडिया का भी भरपूर इस्तेमाल करता था. वह बड़े अधिकारियों और नेताओं के साथ खिंचवाई गई तस्वीरों को अपने प्रोफाइल पर साझा करता था, ताकि उसकी पहचान विश्वसनीय लगे. ये जालसाज बीते 12 सालों से ये खेल खेलता आ रहा है. 

भोजपुर जिला से एक सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसने प्रशासनिक तंत्र, साइबर सुरक्षा और अपराधियों के बदलते तौर-तरीकों को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. एक शातिर जालसाज ने खुद को प्रवर्तन निदेशालय (ED) का निदेशक बताकर जिला पदाधिकारी तनय सुल्तानिया को फोन किया और दबाव बनाने की कोशिश की. हालांकि, जिलाधिकारी की सतर्कता और पुलिस की त्वरित कार्रवाई ने इस बड़ी साजिश को विफल कर दिया. इस बारे में भोजपुर जिलाधिकारी तनय सुल्तानिया ने बताया कि मामले की जांच भोजपुर एसपी राज कर रहे हैं और उन्होंने इनके पुराने आपराधिक रिकॉर्ड भी खंगाले जा रहे हैं. इससे पहले भी आरोपी अभिषेक  कई ऐसे मामलों में शामिल पाया गया है. गिरफ्तार आरोपी की पहचान पटना के बुद्धा कॉलोनी निवासी अभिषेक भोपल्का उर्फ अभिषेक अग्रवाल के रूप में हुई है. पुलिस ने उसके पास से करीब 2 लाख 61 हजार रुपये नकद और एक मोबाइल फोन बरामद किया है. पूछताछ के दौरान आरोपी ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया है, जिसके बाद उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

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एक व्हाट्सएप कॉल से शुरू हुआ खेल

घटना 27 अप्रैल 2026 की बताई जा रही है. उस दिन जिला पदाधिकारी के सरकारी मोबाइल नंबर पर एक अज्ञात नंबर से व्हाट्सएप कॉल आया. कॉल करने वाले ने खुद को दिल्ली से प्रवर्तन निदेशालय का निदेशक बताया और कुछ विभागीय मामलों को लेकर दबाव बनाने का प्रयास किया. शुरुआत में कॉल को गंभीरता से लिया गया, क्योंकि कॉल करने वाले ने आत्मविश्वास और अधिकारपूर्ण भाषा का इस्तेमाल किया. लेकिन बातचीत के दौरान कुछ ऐसी बातें सामने आईं, जिससे जिलाधिकारी को संदेह हुआ कि कॉल फर्जी है. उन्होंने बिना समय गंवाए तुरंत इसकी सूचना संबंधित पुलिस अधिकारियों को दी. यह सतर्कता इस पूरे मामले में निर्णायक साबित हुई, क्योंकि अगर थोड़ी भी देर होती, तो आरोपी अपने मकसद में आंशिक रूप से सफल हो सकता था.

FIR से गिरफ्तारी तक, ऐसे हुई कार्रवाई

अगले ही दिन, 28 अप्रैल को नवादा थाना में इस मामले को लेकर एफआईआर दर्ज की गई. मामला दर्ज होते ही पुलिस और विशेष जांच टीम सक्रिय हो गई. तकनीकी जांच के आधार पर आरोपी की लोकेशन ट्रैक की गई. पुलिस के सामने चुनौती यह थी कि आरोपी लगातार अपना ठिकाना बदल रहा था, जिससे उसे पकड़ना आसान नहीं था. लेकिन आधुनिक तकनीक और सूचनाओं के तालमेल के जरिए पुलिस ने आखिरकार उसे पटना के कोतवाली क्षेत्र में घेराबंदी कर गिरफ्तार कर लिया. गिरफ्तारी के दौरान आरोपी के पास से 2.61 लाख रुपये नकद और एक मोबाइल फोन बरामद हुआ, जिसे जांच के लिए जब्त कर लिया गया है.

लंबा आपराधिक इतिहास

जांच के दौरान यह खुलासा हुआ कि आरोपी का आपराधिक इतिहास काफी लंबा है. वह कोई नया अपराधी नहीं है, बल्कि वर्षों से इसी तरह की धोखाधड़ी और ठगी की घटनाओं को अंजाम देता रहा है. पुलिस के अनुसार, वर्ष 2022 में आरोपी ने खुद को पटना उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के रूप में प्रस्तुत कर तत्कालीन पुलिस महानिदेशक को फोन किया था और एक अधिकारी के पक्ष में दबाव बनाने की कोशिश की थी. यह घटना बताती है कि आरोपी केवल आम लोगों को ही नहीं, बल्कि उच्च स्तर के प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों को भी निशाना बनाता रहा है.

फर्जी पहचान का खेल: कभी अधिकारी, कभी न्यायाधीश, कभी ‘पीए'

पुलिस जांच में सामने आया है कि आरोपी फर्जी सिम कार्ड और मोबाइल नंबरों का इस्तेमाल करता था. वह परिस्थिति के अनुसार अपनी पहचान बदल लेता था. कभी खुद को प्रवर्तन निदेशालय का अधिकारी बताता, कभी न्यायाधीश, तो कभी किसी मंत्री का निजी सहायक. इस तरह की पहचान बदलकर वह सामने वाले व्यक्ति पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाता था और अपने उद्देश्य को पूरा करने की कोशिश करता था. यह एक संगठित और योजनाबद्ध तरीका था, जो दर्शाता है कि आरोपी इस काम में काफी अनुभवी था.

सोशल मीडिया का भी गलत इस्‍तेमाल 

आरोपी केवल फोन कॉल तक ही सीमित नहीं था, बल्कि वह सोशल मीडिया का भी भरपूर इस्तेमाल करता था. वह बड़े अधिकारियों और नेताओं के साथ खिंचवाई गई तस्वीरों को अपने प्रोफाइल पर साझा करता था, ताकि उसकी पहचान विश्वसनीय लगे. इस मामले में भी उसने अपने व्हाट्सएप प्रोफाइल में एक वरिष्ठ न्यायिक अधिकारी के साथ तस्वीर लगा रखी थी, जिससे किसी को उस पर संदेह न हो. यह दर्शाता है कि अपराधी अब केवल तकनीक ही नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक रणनीतियों का भी उपयोग कर रहे हैं.

गंभीर धाराओं में मामला दर्ज

इस मामले में नवादा थाना में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं के साथ-साथ सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया है. इनमें जबरन वसूली, धोखाधड़ी और फर्जीवाड़ा जैसी गंभीर धाराएं शामिल हैं. इन धाराओं में दोषी पाए जाने पर आरोपी को कड़ी सजा का प्रावधान है, जो इस प्रकार के अपराधों के खिलाफ एक सख्त संदेश भी देगा. पुलिस के अनुसार आरोपी वर्ष 2014 से इस प्रकार की आपराधिक गतिविधियों में संलिप्त रहा है. वह कई बार गिरफ्तार हो चुका है और जेल भी जा चुका है. वर्ष 2018 में उसे तिहाड़ जेल भेजा गया था. इसके बावजूद उसका आपराधिक गतिविधियों में संलिप्त रहना यह दर्शाता है कि ऐसे अपराधियों के खिलाफ केवल गिरफ्तारी पर्याप्त नहीं है, बल्कि एक व्यापक और दीर्घकालिक रणनीति की आवश्यकता है.

प्रशासन और समाज के लिए चेतावनी

यह घटना केवल एक आपराधिक मामला नहीं है, बल्कि यह प्रशासन और समाज दोनों के लिए एक चेतावनी है. जिस तरह से एक व्यक्ति फर्जी पहचान के जरिए उच्च अधिकारियों तक पहुंचने और उन्हें प्रभावित करने की कोशिश कर रहा था, वह गंभीर चिंता का विषय है. यह आवश्यक है कि प्रशासनिक अधिकारी ऐसे कॉल्स और संदेशों को लेकर सतर्क रहें और किसी भी संदिग्ध गतिविधि की तुरंत जांच कराएं. साथ ही, आम लोगों को भी इस तरह के साइबर अपराधों के प्रति जागरूक होने की आवश्यकता है. फिलहाल पुलिस आरोपी से पूछताछ कर रही है और उसके पूरे नेटवर्क की जांच की जा रही है. यह भी पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि इस मामले में और कौन-कौन लोग शामिल हो सकते हैं. अधिकारियों का कहना है कि जांच के दौरान और भी बड़े खुलासे हो सकते हैं, जिससे इस तरह के अपराधों के नेटवर्क को समझने में मदद मिलेगी.

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भोजपुर जिला में सामने आया यह मामला आधुनिक अपराध की बदलती प्रकृति का एक स्पष्ट उदाहरण है. तकनीक, फर्जी पहचान और मनोवैज्ञानिक दबाव का इस्तेमाल कर अपराधी अब नए-नए तरीके अपना रहे हैं. हालांकि, इस मामले में जिला पदाधिकारी की सतर्कता और पुलिस की त्वरित कार्रवाई ने एक बड़ी घटना को होने से रोक दिया. लेकिन यह भी स्पष्ट है कि भविष्य में इस तरह की घटनाओं से निपटने के लिए और अधिक सतर्कता, तकनीकी दक्षता और समन्वय की आवश्यकता होगी.

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