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गुजरात का अनोखा गांव, 1000 साल से रह रहे अफ्रीकी मूल के लोग, बोलते हैं फर्राटेदार गुजराती

गुजरात के गिर सोमनाथ में बसा जाम्बुर गांव पहली नजर में हर किसी को चौंका देता है क्योंकि यहां रहने वाले लोग दिखने में बिल्कुल अफ्रीकी हैं लेकिन बेहद साफ गुजराती बोलते हैं. सदियों पहले अफ्रीका से आकर भारत को अपना आशियाना बनाने वाले इस 'सिद्दी' समुदाय का इतिहास करीब 1000 साल पुराना है.

गुजरात का अनोखा गांव, 1000 साल से रह रहे अफ्रीकी मूल के लोग, बोलते हैं फर्राटेदार गुजराती
जानिए गुजरात के जाम्बुर गांव में बसे सिद्दियों की कहानी.
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VIRAL VIDEO: गुजरात के गिर सोमनाथ जिले में बसा जाम्बुर गांव पहली नजर में आश्चर्य से भर देगा. यहां रहने वाले लोग दिखने में बिल्कुल अफ्रीकी मूल के हैं, लेकिन ठेठ गुजराती या साफ हिंदी में बात करते हैं. इनके नस-नस में अफ्रीका बहता है, लेकिन दिल पूरी तरह हिंदुस्तानी है. हम बात कर रहे हैं 'सिद्दी' समुदाय की. सदियों पहले अफ्रीका से आकर भारत को अपना आशियाना बनाने वाला यह अल्पसंख्यक समुदाय आज हमारी विविधता का एक खूबसूरत हिस्सा है. उन्होंने अपनी अफ्रीकी 'बांटू' जड़ों को समेटे हुए भारतीय संस्कृति को ऐसे गले लगाया है जैसे दूध में चीनी मिल जाती है.

1000 साल पुराना इतिहास 

स्थानीय लोग बताते कि लगभग 1000 साल पहले जूनागढ़ के नवाब उनके पूर्वजों को अफ्रीका (युगांडा) से जहाज में काम करने के लिए यहां लाए थे. जब महल का काम पूरा हो गया, तो नवाब ने उन्हें यहीं जमीन देकर बसा दिया. शुरुआत में वे अपनी अफ्रीकी भाषा बोलते थे, लेकिन धीरे-धीरे वक्त के साथ वे गुजराती रंग में ऐसे रंगे कि अब उन्हें अपने अफ्रीकी अतीत या वहां की संस्कृति के बारे में कुछ खास याद नहीं है.  

पुर्तगालियों से भी जुड़ा है इतिहास

इतिहासकारों का मानना है कि सिद्दी मुख्य रूप से अफ्रीका के बांटू समुदाय के वंशज हैं. वे पुर्तगालियों के जरिए गुलाम या बंधुआ मजदूर के रूप में हिंद महासागर के रास्ते भारत पहुंचे थे. गुजरात जनजातीय अनुसंधान और प्रशिक्षण संस्थान के मुताबिक, पुर्तगाली उन्हें 17वीं सदी के अंत में भारत लाए थे. वहीं कुछ शोधकर्ता मानते हैं कि वे 15वीं सदी के मध्य में ही भारत आ गए थे. उनके सफर की यह दास्तान आज भी लोकगीतों और इतिहास के पन्नों में जिंदा है. 

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गुजरात से कर्नाटक तक का सफर

आज सिद्दी समुदाय मुख्य रूप से गुजरात, महाराष्ट्र और कर्नाटक में बसा है. गुजरात के सिद्दी ज्यादातर मुस्लिम हैं, जबकि कर्नाटक में रहने वाले सिद्दी हिंदू धर्म का पालन करते हैं. गुजरात के जूनागढ़ में इनकी सबसे घनी आबादी है. यहां के सिद्दी गुजराती और हिंदी सहजता से बोलते हैं. पहनावे से लेकर कांच और चांदी की चूड़ियों के श्रृंगार तक, सब कुछ स्थानीय रंग में रंगा है. लेकिन उत्सव के मौकों पर इनका पारंपरिक 'धमाल' संगीत और नृत्य इनकी अफ्रीकी विरासत की गूंज आज भी सुना देता है. 

यहां के लोग पूरी तरह गुजराती खाना जैसे बाजरे की रोटी और बैंगन-आलू की सब्जी खाते हैं. रोजी-रोटी के लिए ये लोग आज भी अपना पारंपरिक अफ्रीकी लोक नृत्य करते हैं, जिसे स्थानीय भाषा में 'धमाल' कहा जाता है.

साल 2003 सिद्दी समुदाय के लिए एक मील का पत्थर साबित हुआ, जब गुजरात में इन्हें 'अनुसूचित जनजाति' (ST) का दर्जा मिला. इसके बाद शिक्षा, सरकारी नौकरियों और आर्थिक मदद के रास्ते खुले. विकास की असल तस्वीर जमीन पर दिखती है. जाम्बुर गांव के एक स्थानीय निवासी बताते हैं, "हमारे गांव में बिजली, पानी और राशन की अब कोई किल्लत नहीं है. 

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