Brazil Presidential Election 2026: ब्राजील से एक बड़ी खबर है. ब्राजील के वामपंथी राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला डा सिल्वा ने रविवार को एक कमबैक किया और उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव में दक्षिणपंथी सीनेटर फ्लेवियो बोल्सोनारो को हराकर बाजी मार ली है. खास बात है कि पहले दौर में बोल्सोनारो लूला से आगे थे. एक दिन बाद यानी मंगलवार को 81 साल के होने जा रहे इस वामपंथी नेता ने सभी अनुमानों को गलत साबित करते हुए लैटिन अमेरिका के सबसे बड़े देश में चौथी बार सत्ता हासिल की है.
न्यूज एजेंसी एएफपी की रिपोर्ट के अनुसार आधिकारिक नतीजे बताते हैं कि लूला को 51.75 प्रतिशत वोट मिले, जबकि फ्लेवियो बोल्सोनारो को 48.25 प्रतिशत वोट मिले. फ्लेवियो बोल्सोनारो पूर्व दक्षिणपंथी राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो के बेटे हैं और चुनाव के दिन तक पोल में अपनी बढ़त को लेकर काफी आश्वस्त थे. लूला की जीत के साथ, ब्राजील ने उस दक्षिणपंथी लहर को रोक दिया है, जिसने अर्जेंटीना, चिली, कोलंबिया और पेरू जैसे कई देशों को दक्षिणपंथी विचारधारा की ओर धकेल दिया था. बोल्सोनारो की इस दंक्षिणपंथी लहर को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंपर का समर्थन हासिल था.
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घोटालों और एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने वाले चुनावी प्रचार के बाद, रविवार को मतदान के दौरान काफी अफरा-तफरी मच गई. सुप्रीम कोर्ट ने आखिरी समय में मतदान का समय दो घंटे बढ़ाने का फैसला सुनाया. यह फैसला लूला के अनुरोध पर लिया गया था, जिन्होंने बताया था कि कई शहरों में बसें बंद कर दी गई थीं, जिससे नागरिकों को वोट डालने में परेशानी हो रही थी.
लूला, जब सबने समझा खेल खत्म, एक बार फिर जीत ली बाजी
ब्राजील की राजनीति में चार दशकों से अहम भूमिका निभाने वाले लूला को बोल्सोनारो के खिलाफ पहले दौर की हार से बड़ा झटका लगा था. इसके बाद वामपंथी खेमा तुरंत हरकत में आ गया और 'अब और नहीं बोल्सोनारो' के नारे के साथ बड़ी रैलियां निकालीं. इन रैलियों में प्रदर्शनकारियों ने याद दिलाया कि कैसे पूर्व राष्ट्रपति ने कोविड महामारी को संभालने में भारी गड़बड़ी की, अमेजन के वर्षावनों को तबाह किया और सार्वजनिक कल्याणकारी योजनाओं में कटौती की.
लूला ने अपनी सोशल मीडिया रणनीति में भी बदलाव किया, वीडियो सेल्फी लीं और अपना पहला मोबाइल फोन खरीदा. वहीं, उनके समर्थकों ने अपने परिवार, दोस्तों और पड़ोसियों का मन बदलने के लिए जोर-शोर से अभियान चलाया, ताकि वे वोट देने के लिए आगे आएं, खासकर तब, जब बड़ी संख्या में लोगों ने वोट नहीं डाला था. उनका फिर से चुना जाना एक और शानदार वापसी है. वे उत्तर-पूर्व के एक ऐसे परिवार से आते हैं जो बेहद गरीब था और जहां के लोग अनपढ़ किसान थे.
अपने तीसरे कार्यकाल में, उन्होंने महंगाई और बेरोजगारी को कम करने में सफलता पाई है और लाखों लोगों को भुखमरी से बाहर निकाला है. लेकिन, मतदाता अभी भी बढ़ती जीवन-लागत और असुरक्षा की भावना को लेकर शिकायत करते हैं. चुनाव प्रचार के दौरान जब लूला ने कल्याणकारी योजनाओं का विस्तार किया, तो उनकी सामाजिक नीतियां तनाव का कारण बन गईं.
आगे चुनौतियां कम नहीं
लूला अपने चौथे कार्यकाल की शुरुआत कर रहे हैं, लेकिन देश बंटा हुआ है. लगभग आधी आबादी ने उनके खिलाफ वोट दिया है और वे बदलाव के लिए बेताब हैं. दुनिया के सबसे बुजुर्ग नेताओं में से एक, लूला 2030 में अपने नए कार्यकाल के अंत तक 85 वर्ष के हो जाएंगे. इस तरह, 2003 से 2010 तक राष्ट्रपति के रूप में अपने पहले कार्यकाल के बाद, वे कुल 16 साल सत्ता में बिता चुके होंगे.
लूला के सामने एक ऐसी संसद भी है जो उनके खिलाफ है और जिसमें दक्षिणपंथी विचारधारा का दबदबा है. आर्थिक हालात भी उनके विकल्पों को सीमित कर रहे हैं, क्योंकि विकास दर धीमी रहने की आशंका है. उन पर देश में फैली असुरक्षा से निपटने का भी भारी दबाव है. देश कई आपराधिक गुटों से जूझ रहा है, जो कामकाजी लोगों के इलाकों में दहशत फैलाते हैं.
राष्ट्रपति के चुनाव प्रचार में 'संप्रभुता' के मुद्दे पर बहुत जोर दिया गया, खासकर ट्रंप के अमेरिका की ओर से डाले जा रहे व्यापारिक और राजनयिक दबाव के संदर्भ में. उन्होंने कहा कि मतदाताओं को एक ऐसा देश चुनना चाहिए जहां राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान हो. लगातार प्रचार करने के कारण उनकी आवाज पहले से कहीं अधिक भारी और बैठी हुई लग रही थी. उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी पर आरोप लगाया कि वे "अमेरिकी झंडे के सहारे शासन करना" चाहते हैं.
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