विजेंदर सिंह ने WBO एशिया पैसिफिक खिताबी भिड़ंत में केरी होप को हराया...
- ओलिंपिक में कांस्य जीतकर देश के युवाओं के लिए बने थे रोल मॉडल
- जब बॉलीवुड जाने का फैसला किया तो लगा रास्ता भटक रहे हैं विजेंदर
- पेशेवर बॉक्सिंग की ओर रुख करने के फैसले पर भी उठी थी उंगली
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नई दिल्ली:
अगर दिल में कुछ कर गुजरने की लगन और संघर्ष का जज्बा हो तो विपरीत परिस्थितियां आपकी राह में रुकावट नहीं बन सकतीं...। हरियाणा के एक छोटे से गांव से निकलकर बॉक्सिंग जैसे खेल में ओलिंपिक में पदक जीतने और फिर डब्ल्यूबीओ एशिया पैसेफिक सुपर मिडिलवेट चैंपियन बनने तक का विजेंदर सिंह का सफर इसी बात को स्थापित करता है। एक तरह से यह छोटे शहरों या कह लें कस्बों/गांवों में रहकर बड़ा सपना देख रहे लोगों के लिए बड़ी सीख है। इस बड़ी खिताबी जीत के साथ युवाओं के लिए विजेंदर का संदेश बेहद साफ है 'अपनी हसरत को कभी दबाओ मत और एक बार कोई सपना देखने के बाद इसका आगा-पीछा सोचे बगैर इसे हासिल करने में जी जान से जुट जाओ'। विजेंदर से पहले झारखंड के रांची शहर से निकले महेंद्र सिंह धोनी भी इसकी मिसाल पेश कर चुके ।
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WBO: विजेंदर ने खिताबी भिड़ंत में केरी को हराया, प्रो बॉक्सिंग में लगातार सातवीं जीत
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भिवानी जिले के गांव कलवास के विजेंदर के ओलिंपिक पदक विजेता और फिर प्रोफेशनल बॉक्सिंग चैंपियन बनने की कहानी किसी सपने जैसी है। हरियाणा रोडवेज के एक बस ड्राइवर के बेटे विजेंदर के सपने बचपन से ही बड़े थे। उनकी चाहत दुनिया का नामी बॉक्सर बनने की थी। छोटा सा गांव कालूवास और बॉक्सिंग में करियर... सुनकर ही अजीब सा लगता है लेकिन ऐसे में 35 वर्षीय विजेंदर को देश की बॉक्सिंग नर्सरी में तब्दील हो चुके भिवानी ने सहारा दिया। इस छोटे से शहर ने देश के लिए युवा और क्षमतावान बॉक्सरों की पूरी फौज खड़ी करने में अहम योगदान दिया है। भिवानी बॉक्सिंग क्लब से ही विजेंदर के सपनों को पर लगने शुरू हुए और जल्द ही वे देश के नामी बॉक्सरों में शुमार हो गए। सब जूनियर और जूनियर स्तर पर चमक दिखाने के बाद 2008 के बीजिंग ओलिंपिक में उन्होंने ऐसा कारनामा किया जो भारतीय बॉक्सिंग इतिहास के लिहाज से मील का पत्थर ही कहा जाएगा। बीजिंग में उन्होंने कांस्य पदक जीता और युवाओं को बताया कि ऊंचे सपने देखकर उन्हें साकार कैसे किया जाता है।
स्वाभाविक है कि इस बड़ी कामयाबी के बाद विजेंदर को हाथों हाथ लिया गया, लेकिन बीजिंग ओलिंपिक के बाद वे अपने पहले प्यार बॉक्सिंग से कुछ भटकते हुए दिखे थे। अच्छे नाक-नक्श वाले बांके जवान विजेंदर ने जब बॉलीवुड में हाथ आजमाने का फैसला किया तो बॉक्सिंग के उनके इस 'पीक' समय में कम ही लोग थे जो इस फैसले से खुश थे। लोगों को विनोद कांबली की याद ताजा हो गई जो इंटरनेशनल क्रिकेट में शुरुआती कामयाबी के बाद ग्लैमर की चकाचौंध में इस कदर खोए कि क्रिकेट परिदृश्य से ओझल ही हो गए। लोगों को लगा कि कहीं विजेंदर 'दूसरे विनोद कांबली' बनने तो नहीं जा रहे। इस बीच उनके प्रदर्शन में कुछ गिरावट भी आई।
लंदन ओलिंपिक में अच्छे प्रदर्शन के बावजूद जब विजेंदर देश के लिए पदक नहीं जीत सके तो फिर उंगलियां उठनी शुरू हुईं। कहा गया कि विजेंदर ग्लैमर की दुनिया की चकाचौंध की भेंट चढ़ते जा रहे हैं। इसके बाद जब उन्होंने पेशेवर बॉक्सर बनने का फैसला किया तो मानो भूचाल ही आ गया। लोगों ने कहा कि यह प्रतिभावान बॉक्सर अपने करियर पर कुल्हाड़ी मार रहा है, पेशेवर बॉक्सिंग में विजेंदर बिल्कुल टिक नहीं सकेंगे और विजेंदर ने पेशेवर बॉक्सिंग को इसलिए चुना क्योंकि उन्हें देश के बजाय पेशेवर खिलाड़ी के रूप में मिलने वाले मोटी धनराशि की परवाह है। बहरहाल, विजेंदर ने पेशेवर बॉक्सर के तौर पर अपने सातों मुकाबले जीतकर, इनमें से छह मुकाबले तो उन्होंने विपक्षी को नॉकआउट करके जीते, इतिहास रच दिया। इसी इच्छाशक्ति के बूते वे अमेच्योर बाक्सिंग में अपनी वेट कैटेगरी में नंबर वन मुक्केबाज बने थे। मुझे और मेरे जैसे तमाम खेलप्रेमियों को गलत साबित करने के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया विजेंदर....!
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WBO: विजेंदर ने खिताबी भिड़ंत में केरी को हराया, प्रो बॉक्सिंग में लगातार सातवीं जीत
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भिवानी जिले के गांव कलवास के विजेंदर के ओलिंपिक पदक विजेता और फिर प्रोफेशनल बॉक्सिंग चैंपियन बनने की कहानी किसी सपने जैसी है। हरियाणा रोडवेज के एक बस ड्राइवर के बेटे विजेंदर के सपने बचपन से ही बड़े थे। उनकी चाहत दुनिया का नामी बॉक्सर बनने की थी। छोटा सा गांव कालूवास और बॉक्सिंग में करियर... सुनकर ही अजीब सा लगता है लेकिन ऐसे में 35 वर्षीय विजेंदर को देश की बॉक्सिंग नर्सरी में तब्दील हो चुके भिवानी ने सहारा दिया। इस छोटे से शहर ने देश के लिए युवा और क्षमतावान बॉक्सरों की पूरी फौज खड़ी करने में अहम योगदान दिया है। भिवानी बॉक्सिंग क्लब से ही विजेंदर के सपनों को पर लगने शुरू हुए और जल्द ही वे देश के नामी बॉक्सरों में शुमार हो गए। सब जूनियर और जूनियर स्तर पर चमक दिखाने के बाद 2008 के बीजिंग ओलिंपिक में उन्होंने ऐसा कारनामा किया जो भारतीय बॉक्सिंग इतिहास के लिहाज से मील का पत्थर ही कहा जाएगा। बीजिंग में उन्होंने कांस्य पदक जीता और युवाओं को बताया कि ऊंचे सपने देखकर उन्हें साकार कैसे किया जाता है।
स्वाभाविक है कि इस बड़ी कामयाबी के बाद विजेंदर को हाथों हाथ लिया गया, लेकिन बीजिंग ओलिंपिक के बाद वे अपने पहले प्यार बॉक्सिंग से कुछ भटकते हुए दिखे थे। अच्छे नाक-नक्श वाले बांके जवान विजेंदर ने जब बॉलीवुड में हाथ आजमाने का फैसला किया तो बॉक्सिंग के उनके इस 'पीक' समय में कम ही लोग थे जो इस फैसले से खुश थे। लोगों को विनोद कांबली की याद ताजा हो गई जो इंटरनेशनल क्रिकेट में शुरुआती कामयाबी के बाद ग्लैमर की चकाचौंध में इस कदर खोए कि क्रिकेट परिदृश्य से ओझल ही हो गए। लोगों को लगा कि कहीं विजेंदर 'दूसरे विनोद कांबली' बनने तो नहीं जा रहे। इस बीच उनके प्रदर्शन में कुछ गिरावट भी आई।
लंदन ओलिंपिक में अच्छे प्रदर्शन के बावजूद जब विजेंदर देश के लिए पदक नहीं जीत सके तो फिर उंगलियां उठनी शुरू हुईं। कहा गया कि विजेंदर ग्लैमर की दुनिया की चकाचौंध की भेंट चढ़ते जा रहे हैं। इसके बाद जब उन्होंने पेशेवर बॉक्सर बनने का फैसला किया तो मानो भूचाल ही आ गया। लोगों ने कहा कि यह प्रतिभावान बॉक्सर अपने करियर पर कुल्हाड़ी मार रहा है, पेशेवर बॉक्सिंग में विजेंदर बिल्कुल टिक नहीं सकेंगे और विजेंदर ने पेशेवर बॉक्सिंग को इसलिए चुना क्योंकि उन्हें देश के बजाय पेशेवर खिलाड़ी के रूप में मिलने वाले मोटी धनराशि की परवाह है। बहरहाल, विजेंदर ने पेशेवर बॉक्सर के तौर पर अपने सातों मुकाबले जीतकर, इनमें से छह मुकाबले तो उन्होंने विपक्षी को नॉकआउट करके जीते, इतिहास रच दिया। इसी इच्छाशक्ति के बूते वे अमेच्योर बाक्सिंग में अपनी वेट कैटेगरी में नंबर वन मुक्केबाज बने थे। मुझे और मेरे जैसे तमाम खेलप्रेमियों को गलत साबित करने के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया विजेंदर....!
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