देशभर के अलग-अलग राज्यों में सैकड़ों IAS अधिकारियों की तैनाती होती है, हर विभाग में इन अधिकारियों को बड़ी जिम्मेदारी दी जाती है और उनका एक फैसला काफी कुछ बदल सकता है. ऐसे में कई बार भ्रष्टाचार के मामले भी सामने आते हैं, जिसके बाद IAS अधिकारियों को सस्पेंड किया जाता है. हालांकि ये इतना आसान नहीं है, राज्य सरकार के हाथ में इसकी पूरी पावर नहीं होती है. ऐसे में आज जानते हैं कि आखिर किसी आईएएस अधिकारी को कैसे नौकरी से निलंबित किया जाता है और इसके क्या नियम होते हैं.
IAS अधिकारियों पर पद के दुरपयोग से लेकर भ्रष्टाचार के कई गंभीर आरोप लगते आए हैं, ऐसे मामलों में कार्रवाई भी होती है और पूरी प्रक्रिया के बाद ऐसे अधिकारियों को सस्पेंड या फिर बर्खास्त किया जाता है.
IAS अधिकारियों के सस्पेंशन के नियम
ऑल इंडिया सर्विसेस डिसिप्लिन एंड अपील नियम 1969 में IAS अधिकारियों के सस्पेंशन के नियम बताए गए हैं. इसमें बताया गया है कि सस्पेंड करने से पहले इसका कारण बताना जरूरी है. इसकी जानकारी काडर कंट्रोलिंग अथॉरिटी को देनी होती है. इसके अलावा सस्पेंड करने के 15 दिनों के भीतर सस्पेंशन की विस्तृत रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंपनी होती है.
IAS अधिकारियों को मिलता है प्रोटेक्शन
संविधान के आर्टिकल 311 के तहत IAS अधिकारियों को सीधे सस्पेंशन से प्रोटेक्शन दिया गया है. इसमें साफ कहा गया है कि किसी भी अधिकारी को सिर्फ वही अथॉरिटी हटा सकती है, जिसने उसे नियुक्त किया है. इसके अलावा आरोपों की जानकारी भी देनी होगी. सभी आरोप सही पाए जाने के बाद ऑल इंडिया सर्विसेस (डिसिप्लिन एंड अपील) रूल्स, 1969 के तहत अधिकारी पर कार्रवाई होती है.
क्या होता है सस्पेंशन का मतलब?
किसी भी अधिकारी को सस्पेंड करने का मतलब होता है कि वो जांच पूरी होने तक किसी भी तरह के फैसले नहीं ले सकता है. तमाम कामकाज से उसका हस्तक्षेप पूरी तरह से हटा दिया जाता है. इस दौरान अधिकारी को उसकी आधी सैलरी दी जाती है. हालांकि सस्पेंशन का मतलब नौकरी से बर्खास्त करना नहीं है, जांच पूरी होने के बाद अगर आरोप साबित नहीं होते तो अधिकारी को सेवा में बहाली भी मिल सकती है.
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