Success Story : मंजिल बड़ी हो तो रास्ते की मुश्किलें भी छोटी पड़ जाती हैं. जौनपुर के मछलीशहर तहसील क्षेत्र के देवकीपुर गांव के रहने वाले प्रभात कुमार यादव ने अपनी मेहनत और हौसले से इसे सच साबित कर दिखाया है. बेहद सामान्य आर्थिक परिस्थितियों से निकलकर प्रभात ने देश के प्रतिष्ठित किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU), लखनऊ के एमबीबीएस पाठ्यक्रम में दाखिला हासिल किया है. नीट यूजी-2026 में 627 अंक और ऑल इंडिया रैंक 3864 हासिल कर प्रभात ने न केवल अपने परिवार का सपना पूरा किया, बल्कि गांव और पूरे जिले का नाम भी रोशन किया.
प्रभात की सफलता की कहानी इसलिए भी खास है, क्योंकि इसके पीछे चमक-दमक नहीं बल्कि करीब 25 सालों का संघर्ष छिपा है. उनके पिता महेंद्र कुमार यादव पिछले लगभग ढाई दशक से मुंबई में ऑटो रिक्शा चलाकर परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं. परिवार से दूर मुंबई की महज 10×10 की छोटी सी चॉल में रहकर वे दिन-रात मेहनत करते हैं. ऑटो चलाकर जो कुछ कमाते हैं, उसमें से अधिकांश रकम गांव में अपने परिवार को भेज देते हैं, ताकि बच्चों की पढ़ाई और घर का खर्च चल सके.
प्रभात की सफलता की खबर जब मुंबई में उनके पिता महेंद्र कुमार यादव को मिली तो उनकी आंखें खुशी से नम हो गईं. जिस बेटे की पढ़ाई के लिए उन्होंने सालों तक अपने सुख-सुविधाओं को पीछे रखा, उसी बेटे ने अब केजीएमयू (KGMU) जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में एमबीबीएस (MBBBS) की सीट हासिल कर उनके संघर्ष को सार्थक कर दिया है.
गांव में प्रभात के दादा इन्द्र बहादुर यादव, मां बंशराजी और भाई-बहन समेत पूरा परिवार रहता है. पोते की उपलब्धि से दादा इन्द्र बहादुर यादव इतने खुश हुए कि उन्होंने नाचकर अपनी खुशी का इजहार किया. उनके जश्न का वीडियो भी सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है. परिवार और गांव के लोग इसे प्रभात की सफलता के साथ-साथ वर्षों की मेहनत की जीत बता रहे हैं.
चाचा ने संभाली पढ़ाई की जिम्मेदारी
प्रभात के चाचा जितेन्द्र कुमार यादव पेशे से शिक्षक हैं. पिता के मुंबई में रहने के कारण गांव में बच्चों की पढ़ाई-लिखाई और उनकी शिक्षा से जुड़ी जिम्मेदारियों को चाचा ने संभाला. परिवार के सदस्यों के सहयोग और मार्गदर्शन ने प्रभात को लगातार आगे बढ़ने का हौसला दिया.
चाचा जितेन्द्र कुमार यादव के मुताबिक प्रभात ने कक्षा एक से आठ तक की पढ़ाई सेंट जोसेफ स्कूल, मुंगराबादशाहपुर से की. इसके बाद उसने सिटी स्कूल, मुंगराबादशाहपुर से हाईस्कूल की पढ़ाई पूरी की. हाईस्कूल में उसने 89.44 प्रतिशत अंक हासिल किए. इसके बाद मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी के लिए वह कोटा चला गया. वहां तैयारी के कारण उसे इंटरमीडिएट की पढ़ाई प्राइवेट माध्यम से पूरी करनी पड़ी, जिसमें उसने 83.44 प्रतिशत अंक हासिल किए.
पहली कोशिश में नहीं मिली सरकारी मेडिकल कॉलेज की सीट
प्रभात के लिए KGMU तक पहुंचने का सफर पहली कोशिश में पूरा नहीं हुआ. नीट के अपने पहले प्रयास में उसने 504 अंक हासिल किए थे, लेकिन इन अंकों के आधार पर उसे सरकारी मेडिकल कॉलेज में दाखिला नहीं मिल सका.
यह परिणाम उसके लिए निराशा का कारण बन सकता था, लेकिन प्रभात ने हार मानने के बजाय अपनी कमियों को पहचाना और तैयारी को और मजबूत करने में जुट गया. उसने दोबारा पूरी मेहनत और लगन के साथ नीट की तैयारी की.
504 से 627 अंक तक का सफर
दूसरे प्रयास में प्रभात ने अपनी मेहनत का शानदार परिणाम दिया. नीट यूजी-2026 में उसने 627 अंक हासिल किए और ऑल इंडिया रैंक 3864 प्राप्त की. इसी प्रदर्शन के दम पर उसका चयन किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU), लखनऊ के एमबीबीएस कोर्स में हुआ.
KGMU में दाखिला मिलना प्रभात के लिए केवल एक मेडिकल सीट हासिल करना नहीं, बल्कि उसके परिवार के सालों के संघर्ष का सबसे बड़ा परिणाम है. भारत सरकार की एनआईआरएफ मेडिकल कॉलेज रैंकिंग में KGMU देश के प्रमुख मेडिकल संस्थानों में आठवें स्थान पर रहा है.
फीस जुटाना भी था बड़ी चुनौती
कोटा में नीट की तैयारी के दौरान पढ़ाई का खर्च जुटाना भी परिवार के लिए आसान नहीं था. ऐलन कोचिंग संस्थान की ओर से फीस में कुछ रियायत मिली, लेकिन इसके बावजूद बाकी खर्च जुटाना परिवार के लिए चुनौती बना रहा. ऐसे कठिन समय में प्रभात के मामा दयाराम यादव ने आर्थिक मदद कर उसका साथ दिया.
परिवार की आर्थिक सीमाओं के बावजूद प्रभात ने पढ़ाई को अपनी सबसे बड़ी प्राथमिकता बनाए रखा. पिता मुंबई में ऑटो चलाते रहे, चाचा गांव में शिक्षा की जिम्मेदारी संभालते रहे और परिवार के अन्य सदस्यों ने भी उसका हौसला बढ़ाया. इन सबके बीच प्रभात ने अपनी मेहनत को हथियार बनाया.
संघर्ष से निकली सफलता की मिसाल
आज देवकीपुर गांव के इस सामान्य परिवार का बेटा KGMU में डॉक्टर बनने की राह पर है. कभी सरकारी मेडिकल कॉलेज की सीट से चूकने वाला प्रभात अब देश के प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थान में एमबीबीएस की पढ़ाई करेगा.
प्रभात की कहानी यह बताती है कि संसाधनों की कमी प्रतिभा के रास्ते की अंतिम दीवार नहीं होती. मुंबई की छोटी सी चॉल में रहकर ऑटो चलाने वाले पिता की मेहनत, गांव में परिवार का साथ, चाचा का मार्गदर्शन, मामा की आर्थिक मदद और प्रभात की अडिग मेहनत ने मिलकर उस सपने को हकीकत में बदल दिया, जिसे परिवार ने वर्षों पहले देखा था.
देवकीपुर के इस बेटे की सफलता में सिर्फ 627 अंक और 3864वीं रैंक नहीं है, बल्कि 25 साल तक पसीना बहाने वाले पिता का संघर्ष, परिवार का त्याग और हार न मानने वाले एक युवा का जज्बा भी शामिल है.
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