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क्या है 'फिट फॉर इंडियन मिलिट्री यूज' सर्टिफिकेट? भारतीय हथियारों को विदेश में बेचने का लाइसेंस ऐसे मिलता है

रक्षा निर्यात बढ़ाने के लिए तीन तरह के सर्टिफिकेट दिए जाते हैं. इसमें पहला है- 'फिट फॉर इंडियन मिलिट्री यूज' जो भारतीय कंपनियों को मिलता है.

क्या है 'फिट फॉर इंडियन मिलिट्री यूज' सर्टिफिकेट? भारतीय हथियारों को विदेश में बेचने का लाइसेंस ऐसे मिलता है
भारत का रक्षा निर्यात लगातार बढ़ रहा है. (सांकेतिक तस्वीर)
PTI
नई दिल्ली:

भारत में बने रक्षा उपकरण अब दुनिया के बाजार में जगह बना रहे हैं. 2025-26 में देश का रक्षा निर्यात रिकॉर्ड 38,424 करोड़ रुपये तक पहुंचा और सरकार ने 2029 तक इसे 50,000 करोड़ रुपये तक ले जाने का लक्ष्य रखा है. 

लेकिन किसी भी विदेशी खरीदार के मन में पहला सवाल यही होता है कि जिस देश में यह उपकरण बना है, क्या वहां की सेना ने इसे परखा है? इसी सवाल का सरकारी जवाब है 'फिट फॉर इंडियन मिलिट्री यूज़' सर्टिफिकेट. पिछले साल सितंबर में रक्षा मंत्रालय ने इससे जुड़े नियम बदले हैं.

DGQA क्या है?

डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ क्वालिटी एश्योरेंस यानी DGQA रक्षा मंत्रालय के रक्षा उत्पादन विभाग के तहत काम करने वाला एक अंतर-सेवा संगठन है. थलसेना, नौसेना और वायुसेना को जो हथियार, गोला-बारूद, उपकरण और सामान सप्लाई होता है, उसकी गुणवत्ता जांचने का काम यही करता है.

इसकी एक कम चर्चित लेकिन अहम भूमिका निर्यात से जुड़ी है. रक्षा निर्यात को बढ़ावा देने के लिए DGQA उन कंपनियों को भी प्रमाणन देता है, जिनके पास सेनाओं का कोई सप्लाई ऑर्डर नहीं है. यानी अगर कोई कंपनी सिर्फ विदेशी बाजार को ध्यान में रखकर उत्पाद बना रही है, तब भी वह जांच करवाकर सरकारी मुहर हासिल कर सकती है.

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2025 की SOP में क्या है?

रक्षा निर्यात प्रोत्साहन योजना 2018 में शुरू हुई थी. 12 सितंबर 2025 को रक्षा उत्पादन विभाग ने सर्टिफिकेट जारी करने की प्रक्रिया में बदलाव कर नई मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) जारी की. इसमें अब तीन तरह के सर्टिफिकेट हैं.

पहला है 'फिट फॉर इंडियन मिलिट्री यूज'. यह उन भारतीय कंपनियों को मिलता है, जिनका उत्पाद रक्षा खरीद या डिजाइन-डेवलपमेंट की प्रक्रिया के दौरान हुए तकनीकी ट्रायल में पास हो चुका है. इसमें iDEX, टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट फंड (TDF), 'मेक' श्रेणी और DRDO के साथ मिलकर हुए विकास जैसे रास्ते शामिल हैं. खास बात यह है कि इसके लिए अलग से आवेदन नहीं करना पड़ता. ट्रायल रिपोर्ट मिलने के 30 दिन के भीतर सर्टिफिकेट खुद जारी हो जाता है.

दूसरा है 'फिट ऐज पर वेंडर स्पेसिफिकेशन'. इसमें उत्पाद को कंपनी की अपनी बताई विशिष्टताओं पर परखा जाता है, जो किसी विदेशी ग्राहक की ज़रूरत के हिसाब से भी तय की जा सकती हैं. उत्पाद अगर विकास के बीच के चरण में है, तब भी यह सर्टिफिकेट लिया जा सकता है. इसके लिए कंपनी को आवेदन करना होता है और जांच का खर्च खुद उठाना पड़ता है. टेस्टिंग पूरी होने के 30 दिन के भीतर सर्टिफिकेट मिल जाता है.

तीसरा है 'सर्टिफिकेट ऑफ फील्ड ट्रायल आउटकम'. कई बार कंपनियां अपना उत्पाद सीधे सेना की किसी कमान या यूनिट के स्तर पर फील्ड ट्रायल के लिए पेश करती हैं, जहां कोई QA एजेंसी शामिल नहीं होती. ऐसे मामलों में ट्रायल के नतीजों के आधार पर संबंधित फॉर्मेशन मुख्यालय कोर कमांडर या समकक्ष अधिकारी की मंज़ूरी के बाद यह सर्टिफिकेट देता है.

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कौन देता है, कितने साल मान्य?

पूरी व्यवस्था की नोडल एजेंसी DGQA है. जमीनी प्रणालियों के लिए DGQA, हवाई प्रणालियों के लिए DGAQA और नौसैनिक प्रणालियों के लिए DGNAI जिम्मेदार हैं. सभी सर्टिफिकेट पांच साल तक मान्य रहते हैं और कंपनी चाहे तो इन्हें रिन्यू करवा सकती है. हर सर्टिफिकेट पर एक यूनिक नंबर और सुरक्षा फीचर होते हैं. आवेदन और उसका स्टेटस ट्रैक करने के लिए एक ऑनलाइन पोर्टल बनाने की बात भी SOP में है.

स्वदेशी कंपनियों के लिए क्यों अहम?

रक्षा का कारोबार भरोसे पर चलता है. भारत सरकार के नाम से जारी यह सर्टिफिकेट बताता है कि उत्पाद भरोसेमंद है, टिकाऊ है और सैन्य माहौल में काम करने लायक है. स्टार्टअप और MSME के लिए इसकी अहमियत और बढ़ जाती है, क्योंकि उनके पास बड़ी कंपनियों जैसा नाम या लंबा ट्रैक रिकॉर्ड नहीं होता. सरकारी सर्टिफिकेट यह कमी काफी हद तक पूरी कर देता है.

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FF Bot: हाल का उदाहरण

इसका ताजा उदाहरण रिमोट से चलने वाला आग बुझाने का रोबोट 'FF Bot' है. अहमदाबाद की स्वदेशी एम्प्रेसा प्राइवेट लिमिटेड ने इसे iDEX पहल के तहत पहले नौसेना के लिए विकसित किया था और 2023 में विमानवाहक पोत INS विक्रांत पर इसके यूजर ट्रायल हुए थे.इस साल जनवरी में थलसेना ने ऐसे 18 रोबोट के लिए 62 करोड़ रुपये का करार किया. 

इन्हें गोला-बारूद डिपो और ईंधन भंडार जैसी जगहों के लिए खरीदा गया है, जहां छोटी-सी आग भी बड़े धमाके में बदल सकती है. सैन्य ट्रायल पार करने के बाद अब इसे 'फिट फॉर इंडियन मिलिट्री यूज़' सर्टिफिकेट मिला है, जिससे विदेशी बाजार में इसकी दावेदारी मजबूत हुई है.

ऑर्डर की गारंटी नहीं, पर पहली सीढ़ी

हालांकि सर्टिफिकेट मिल जाना विदेशी ऑर्डर की गारंटी नहीं है. कीमत, सर्विस सपोर्ट और खरीदार देश के साथ रिश्ते भी उतने ही मायने रखते हैं. लेकिन विदेशी खरीदार से बातचीत की मेज तक पहुंचने के लिए यह एक मजबूत सीढ़ी जरूर है. जिस रफ्तार से निजी कंपनियां रक्षा उत्पादन में उतर रही हैं, आने वाले समय में ऐसे सर्टिफिकेट की मांग और बढ़ना तय है.

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