- पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में एसआईआर के जरिए लगभग 89 लाख वोटरों के नाम हटाए गए हैं
- SIR से मुस्लिम बहुल इलाकों में नाराजगी दिख रही है लेकिन वहां बीजेपी को खोने के लिए ज्यादा कुछ नहीं है
- विश्लेषकों का मानना है कि एंटी इनकंबेंसी के कारण ममता बनर्जी को नुकसान हो सकता है जिससे सीटों पर असर पड़ेगा
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में इस बार एसआईआर का बड़ा प्रभाव पड़ना तय है. एसआईआर में बंगाल के 11.6 फीसदी यानी 89 लाख वोटरों के नाम कटे हैं. एनडीटीवी के नंबर गेम शो में सीईओ और एडिटर इन चीफ राहुल कंवल के साथ बातचीत में चुनावी विश्लेषकों का कहना था कि एसआईआर बहुत जरूरी था. वह इस बात से भी सहमत नजर आए कि ममता बनर्जी को एंटी इनकंबेंसी की वजह से जितने ज्यादा वोटों का झटका लगेगा, उतना ही उन्हें सीटों पर नुकसान होने की संभावना रहेगी.
एनडीटीवी की मैनेजिंग एडिटर पद्मजा जोशी ने कहा कि एसआईआर के प्रभाव को लेकर कहा कि सबसे ज्यादा वोट मुस्लिम बाहुल्य इलाकों में कटे हैं और इससे इन इलाकों के लोगों में बेहद नाराजगी है. इन इलाकों में बीजेपी की ज्यादा पकड़ नहीं है. बीजेपी ने मुर्शिदाबाद में 2 और उत्तरी 24 परगना में 3 सीटें जीती थीं. ऐसे में ये कहना ठीक नहीं होगा कि एसआईआर से इन इलाकों में बीजेपी को कोई बहुत बड़ा फायदा मिलने वाला है. उत्तरी 24 परगना में 30 पर्सेंट मतुआ समुदाय के वोट हैं और पहले इन्होंने बीजेपी को वोट किया है. देखना होगा इस बार क्या प्रभाव रहता है.
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वरिष्ठ पत्रकार सतीश के. सिंह ने कहा कि ये जादुई, असाधारण चुनाव है. आजकल के चुनावों में नतीजे चमत्कारिक आते हैं. लेकिन मेरा मानना है कि ममता बनर्जी को टक्कर मिलेगी, एंटी इनकंबेंसी भी है, लेकिन अभी भी वो आगे नजर आती हैं. वरिष्ठ पत्रकार कंचन गुप्ता ने कहा कि एसआईआर करना जरूरी था क्योंकि बहुत से मृत वोटरों और फर्जी मतदाताओं के नाम हटाने थे, बाहर से आए लोगों को भी बाहर करना था.
वोट वाइब के संस्थापक अमिताभ तिवारी ने कहा कि एसआईआर की वजह से बीजेपी चुनाव जीत जाए, ऐसा नहीं लगता है. 2021 के चुनावों से तुलना करें तो 52 लाख वोटर कटे हैं. औसत देखें तो हर सीट पर साढ़े 17 हजार वोट कम हुए हैं. पिछले चुनाव में हर जीती सीट पर टीएमसी का एवरेज विक्ट्री मार्जिन 33 हजार था. ऐसे में कटे वोटों को हटा भी दिया जाए तो टीएमसी आगे नजर आती है. ऐसे में बीजेपी को बढ़त लेनी है तो उसे टीएमसी के वोट बैंक में सेंध लगानी ही होगी. सिर्फ एसआईआर किसी पार्टी को जीत नहीं दिला सकता.
एनडीवीटी के सीईओ राहुल कंवल ने तीसरा समीकरण दिखाते हुए कहा कि अगर मान लीजिए एसआईआर में टीएमसी के 70 पर्सेंट और बीजेपी के 30 पर्सेंट वोट कटे और एंटी इनकंबेंसी से ममता को डेढ़ फीसदी वोटों का घाटा हुआ, तब क्या तस्वीर बन सकती है. ऐसे में प्रभावित सीटों की संख्या 42 रहेगी, जिनमें से 2021 में बीजेपी 39 सीटों पर दूसरे नंबर पर रही थी. अगर बीजेपी की पिछले चुनाव की 77 सीटों और इन 39 सीटों को जोड़ें तो संभावित जीत का आंकड़ा 116 बनता है, जो बहुमत के 147 से काफी पीछे है.
अगर इसी समीकरण पर 3 पर्सेंट एंटी इनकंबेंसी वोटों का नुकसान फिट किया जाए तो प्रभावित सीटों की संख्या 92 हो जाती है, जिसमें से 77 सीटों पर बीजेपी रनर अप रही थी. उसकी जीती सीटों और इन 77 सीटों को मिलाएं तो आंकड़ा बनता है 154 का, जो बहुमत के 147 से ऊपर निकल जाता है. ऐसे में साफ है कि अगर बीजेपी को टीएमसी पर बढ़त लेनी है तो उसे उम्मीद करनी होगी कि एंटी इनकंबेंसी के ज्यादा से ज्यादा वोट ममता बनर्जी से छिटक जाएं, तभी तस्वीर उसके पक्ष में बन सकती है.
सीएसडीएस के संजय कुमार ने कहा कि एसआईआर के प्रभाव की तुलना होगी तो लोकसभा चुनाव से नहीं बल्कि 2021 के विधानसभा चुनाव से ही होगी. अगर मान लिया जाए कि एसआईआर में टीएमसी के 80 नहीं बल्कि 75 फीसदी वोट कटे हैं, तब भी टीएमसी की लीड बनी रह सकती है, ऐसा मेरा अनुमान है.
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