पंजाब में सिख समुदाय एक बड़ा मतदाता समूह है. राज्य के ज्यादातर चुनावों में उनकी भूमिका निर्णायक रहती है. एक तरफ पंजाब से बड़ी संख्या में युवा पढ़ाई या नौकरी के लिए विदेश जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर दूसरे राज्यों से आने वाले मजदूरों की संख्या बढ़ रही है. इस ट्रेंड ने परंपरावादी समाज की चिंताएं बढ़ा दी हैं. उन्हें लग रहा है कि ग्रामीण इलाकों की आबादी का स्वरूप बदल रहा है और स्थानीय स्तर पर सिखों की मौजूदगी घट रही है.
किस रफ्तार से बढ़ रही है सिख आबादी
अकाल तख्त के प्रमुखों ने सिखों से और ज्यादा बच्चे पैदा करने और कम उम्र में शादी करने की अपील की है. इसकी एक बड़ी वजह सिखों की घटती आबादी भी है. नवंबर 2021 में जारी नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS-5) के मुताबिक, पंजाब में कुल प्रजनन दर (TFR) घटकर 1.6 रह गई थी. यह सर्वे पांच जनवरी से 21 मार्च और फिर छह दिसंबर 2020 से 31 मार्च 2021 के बीच किया गया था. वहीं 2011 की जनगणना के मुताबिक, 2001 से 2011 के बीच सिख आबादी केवल 8.4 फीसद बढ़ी, जबकि इसी अवधि में भारत की कुल आबादी 17.7 फीसद बढ़ी थी.
अकाल तख्त के कार्यवाहक जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गर्गज ने 17 अगस्त 2026 को सिखों से 30 साल की उम्र तक में शादी करने और कम से कम तीन बच्चे पैदा करने की सलाह दी. उन्होंने ऐसी ही सलाह पिछले साल दो दिसंबर को भी दी थी.
गर्गज ने सोमवार को कहा,''मैं हर जगह कहता हूं कि जिनकी उम्र 30 साल से ज्यादा हो गई है, उन्हें शादी कर लेनी चाहिए. रिश्ते आने पर मना नहीं करना चाहिए. मैंने मालवा क्षेत्र के लोगों से भी यही कहा है. दूसरी बात यह है कि बच्चे पैदा करने से पीछे नहीं हटना चाहिए. यह पूरे पंथ का मामला है. गुरु की कृपा से कम से कम तीन बच्चे होने चाहिए. इसमें शर्म की कोई बात नहीं है. भाई मनी सिंह के 12 भाई थे. उनमें से एक बचपन में शहीद हो गया और बाकी 11 भी शहीद हुए. हम उन्हीं शहीदों के वारिस हैं. हमें अपने बच्चों को गुरु, धर्म और गुरबाणी से दूर नहीं करना चाहिए. हमें एकजुट रहना चाहिए और चढ़दी कला में रहना चाहिए.''

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क्या अधिक बच्चे पैदा करने से होगी तरक्की
इस तरह का बयान देने वाले गर्गज अकाल तख्त के पहले जत्थेदार नहीं हैं. उनसे पहले वरिष्ठ जत्थेदार ज्ञानी गुरबचन सिंह ने भी मई 2015 में इसी तरह की बात कही थी. ज्ञानी गुरबचन सिंह ने अपने बयान का बचाव करते हुए कहा था,''मैं पहले भी सिख दंपतियों से चार बच्चे पैदा करने की अपील कर चुका हूं. मैं किसान परिवार से हूं और जानता हूं कि खेतों में अलग-अलग कामों के लिए कई लोगों की जरूरत होती है. कारोबारियों के लिए भी यही बात लागू होती है. इसलिए चार बच्चे परिवार की तरक्की का रास्ता खोल सकते हैं.'' उन्होंने इसे राजनीति और आबादी के नजरिए से समझाते हुए कहा था कि एक तरफ दो सदस्यों वाला परिवार है और दूसरी तरफ 10 सदस्यों वाला परिवार. ऐसे में यह समझना मुश्किल नहीं है कि किस परिवार के पास ज्यादा वोट होंगे और कौन चुनाव जीत सकता है. उन्होंने कहा था कि सिखों से ज्यादा बच्चे पैदा करने की अपील करने की यह भी एक वजह है.
यह संदेश केवल आबादी में संतुलन बनाने की कोशिश नहीं है. इसके पीछे राजनीतिक और जनसांख्यिकीय समीकरण को संतुलित करने की कोशिश भी है, ताकि पंजाब देश का एकमात्र सिख बहुल राज्य बना रहे. साल 2011 में पंजाब की आबादी में सिखों की हिस्सेदारी 57.69 फीसद थी.
सिर्फ बीजेपी ने अकाल तख्त जत्थेदार का समर्थन क्यों किया?
पंजाब की प्रमुख राजनीतिक पार्टियां सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी (AAP), कांग्रेस और शिरोमणि अकाली दल ने गर्गज के बयान पर चुप हैं. पंजाब के नेता आमतौर पर अकाल तख्त के धार्मिक अधिकारियों के बयानों पर टिप्पणी करने से बचते हैं. आप ने पहले अप्रत्यक्ष रूप से गर्गज को निशाना बनाया था, लेकिन हाल में अकाल तख्त की ओर से मुख्यमंत्री भगवंत मान को सिख विरोधी और धर्म विरोधी बताए जाने वाले आदेश के बाद पार्टी ने भी चुप्पी साध ली है.
दिलचस्प बात यह है कि बीजेपी ही ऐसी एकमात्र राजनीतिक पार्टी रही जिसने जत्थेदार के बयान का समर्थन किया.
पंजाब बीजेपी के प्रवक्ता सरचंद सिंह ने कहा,''ज्ञानी कुलदीप सिंह गर्गज ने हर सिख परिवार से तीन बच्चे पैदा करने की जो अपील की है, वह धार्मिक, पंथक और सामाजिक नजरिए से स्वागत योग्य है.''
सोशल मीडिया पर भी इस बयान को लेकर बहस चल रही है. कई लोगों ने सवाल उठाया कि अगर परिवार इस सलाह को मानते हैं तो बच्चों की संख्या बढ़ने से परिवार पर आर्थिक बोझ भी बढ़ेगा. लोगों का कहना है कि अगर कोई इस सलाह को मानना चाहता है तो धार्मिक और सरकारी संस्थाओं को बच्चों की पढ़ाई और दूसरे खर्चों में परिवार की आर्थिक मदद करनी चाहिए.
चंडीगढ़ के चुनाव विश्लेषक प्रोफेसर गुरमीत सिंह कहते हैं,''यह एक सामाजिक मुद्दा है. समय के साथ समाज बदलता रहता है. धार्मिक नेताओं की चिंता महत्वपूर्ण है, लेकिन बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि पंजाब की जेन जेड इस सलाह को कैसे लेती है और उस पर कितना अमल करती है. मुझे नहीं लगता कि इससे वास्तव में कोई फायदा होगा. पहले संयुक्त परिवार होते थे, फिर समाज छोटे यानी न्यूक्लियर परिवारों में बदल गया. ज्यादा बच्चे पैदा करने का मतलब उनके लिए ज्यादा संसाधन जुटाना भी है. पंजाब जैसे राज्य में यह व्यावहारिक नहीं लगता, जहां बड़ी संख्या में युवा बाहर जा रहे हैं और राज्य पर भारी कर्ज भी है.''
क्या पंजाब में कम हो रही है सिखों की आबादी
सिख आज भी पंजाब का सबसे बड़ा मतदाता समूह हैं, लेकिन उनकी संख्या अब पहले की तरह नहीं बढ़ रही है. जनगणना और चुनावी आंकड़ों को साथ देखने पर यह बदलाव साफ दिखाई देता है. साल 1991 में पंजाब की कुल आबादी में सिखों की हिस्सेदारी 62.95 फीसद थी. यह 2001 में घटकर 59.9 फीसद और 2011 में 57.69 फीसद रह गई. यानी दो दशकों में सिखों की आबादी का हिस्सा 5.26 फीसद कम हुआ. 1991 का आंकड़ा 1966 में पंजाब के पुनर्गठन के बाद सिख आबादी की हिस्सेदारी का सबसे ऊंचा स्तर था. इसके बाद हर दशक में इसमें गिरावट आई. 1991 से 2001 के बीच करीब 3 फीसद और 2001 से 2011 के बीच 2.22 फीसद की गिरावट हुई. हालांकि सिखों की कुल आबादी में बढ़ोतरी हुई. लेकिन कुल आबादी में उनका हिस्सा इसलिए घट गया क्योंकि दूसरे समुदायों की आबादी तेजी से बढ़ी, सिखों में बच्चों की संख्या कम रही और बड़ी संख्या में सिख युवा पंजाब से बाहर चले गए.
अगर 2011 के बाद भी यही रफ्तार जारी रही हो, तो 2022 के विधानसभा चुनाव तक पंजाब की कुल आबादी और मतदाताओं में सिखों की हिस्सेदारी 50 के मध्य यानी करीब 55 फीसद के आसपास पहुंच गई होगी. इसी वजह से 62.95 → 59.9 → 57.69 फीसद का आंकड़ा आज सिख आबादी को लेकर जताई जा रही चिंता का आधार माना जाता है. यह कोई अचानक आई गिरावट नहीं है, बल्कि लंबे समय से धीरे-धीरे सिखों के जनसांख्यिकीय और चुनावी प्रभाव में आ रही कमी है.
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