- नेहा बोरा AISA की अध्यक्ष हैं और चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के विरोध प्रदर्शनों की प्रमुख चेहरा बनी हैं
- नेहा बोरा से पहले अदिति मिश्रा AISA की अध्यक्ष थीं, जो वर्तमान में JNUSU की अध्यक्ष भी हैं
- पूर्व अध्यक्ष नीतीश कुमार को यूनिवर्सिटी से दो सेमेस्टरों के लिए निलंबित किया गया था
नेहा बोरा इन दिनों चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ चल रहे विरोध प्रदर्शनों का एक चेहरा बन गई हैं. इससे पहले नीट पेपर लीक को लेकर चले आंदोलन के दौरान भी वह भूख हड़ताल पर बैठी थीं. बीते कुछ दिनों में वह लगातार सुर्खियों में रही हैं. यहां तक कि विपक्ष की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान राहुल गांधी भी उन्हें तवज्जो देते दिखे थे. प्रियंका गांधी ने भी उनसे करीबी दिखाने की कोशिश की. इस तरह JNU कैंपस से बाहर भी नेहा बोरा ने अपनी एक पहचान स्थापित की है. लेफ्ट के छात्र संगठन AISA की अध्यक्ष नेहा बोरा की मुखरता कुछ लोगों को पसंद आती है तो वहीं एक बड़ा वर्ग उनका आलोचक भी है. लेकिन यह सच है कि वह बीते कुछ दिनों में ही बड़ा चेहरा बन गई हैं. आइए जानते हैं, उनसे पहले कौन रहे हैं AISA के अध्यक्ष और अब कहां हैं...
अदिति मिश्रा फिलहाल JNUSU चीफ हैं
वामपंथी छात्र संगठन AISA की नेहा बोरा से ठीक पहले अदिति मिश्रा अध्यक्ष थीं. वह 2025-26 के लिए अध्यक्ष चुनी गई थीं. उनके बाद ही नेहा बोरा को अप्रैल में जिम्मेदारी मिली है. इसके अलावा चंद्रशेखर प्रसाद, संदीप सिंह, सुचिता डे, गीता कुमारी, एन. साई बालाजी जैसे कई चेहरे भी AISA के अध्यक्ष रह चुके हैं. नेहा बोरा से ठीक पहले चीफ रहीं अदिति मिश्रा फिलहाल जेनएयू छात्र संगठन की अध्यक्ष भी हैं. जाति व्यवस्था, महिला सशक्तीकरण समेत कई मसलों पर उनकी मुखर टिप्पणियां चर्चित रही हैं.
कौन हैं नीतीश कुमार, जिन पर JNU ने लिया एक्शन
अदिति से पहले नीतीश कुमार 2024-25 में AISA के चीफ थे. वह जेएनयू में पीएचडी के स्कॉलर हैं. हालांकि फरवरी 2026 में उन्हें दो सेमेस्टरों के लिए यूनिवर्सिटी से बाहर कर दिया गया था. वह न्यायपालिका और जाति से जुड़े विषय पर शोध कर रहे हैं. उनके खिलाफ यूनिवर्सिटी प्रशासन के एक्शन की लेफ्ट संगठन के अलावा कई और छात्र समूहों ने आलोचना की थी.
धनंजय चुनाव में उतरे और हार ही गए
जेएनयू छात्र संगठन के अध्यक्ष रहे धनंजय को 2023-24 में AISA की कमान मिली थी. धनंजय के नेतृत्व में ही AISA की लंबे समय बाद जेएनयू की राजनीति में वापसी हुई थी और अध्यक्ष मिला था. छात्र राजनीति से निकलने के बाद धनंजय सीपीआई-माले का हिस्सा बन गए थे. बीते साल बिहार विधानसभा चुनाव भी वह लड़े थे, लेकिन हार का सामना करना पड़ा था.
बालाजी अब कहां हैं
वर्ष 2018-19 में AISA के अध्यक्ष साई बालाजी थे. वह फिलहाल पॉलिटिकल साइंस पढ़ा रहे हैं और अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर शोध भी कर रहे हैं. वह अब भी एक मेंटर के तौर पर AISA से जुड़े हुए हैं और अकसर उसके कार्यक्रमों में नजर आते हैं. इसके अलावा 2017-18 में गीता कुमारी अध्यक्ष रही थीं. वह फिलहाल अकादमिक जगत का हिस्सा हैं. रिसर्च के साथ ही अध्यापन से भी जुड़ी हुई हैं.
प्रियंका की टीम का हिस्सा हैं मोहित पांडेय
इससे पहले 2016-17 में मोहित कुमार पांडेय अध्यक्ष थे. वह लेफ्ट की राजनीति छोड़कर कांग्रेस का हिस्सा बन गए हैं. फिलहाल वह प्रियंका गांधी वाड्रा की टीम का हिस्सा हैं और उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के सोशल मीडिया विभाग को भी देख रहे हैं. पॉलिटिकल कॉम्युनिकेशन का एक लंबा अध्ययन करने के बाद वह राजनीति में हैं. उनसे पहले 2015-16 में AISA अध्यक्ष रहे आशुतोष कुमार अकादमिक जगत का हिस्सा हैं.
कैंपेन स्ट्रेटजी चलाने वाले अकबर चौधरी
अब बात अकबर चौधरी की करते हैं, जो 2013-14 में अध्यक्ष रहे थे. वह प्रशांत किशोर के साथ राजनीतिक रणनीतिकार के तौर पर सक्रिय थे. बिहार और बंगाल में कैंपेन चलाया था. फिलहाल वह अपनी कंपनी मैट्रिक्स इंटेलिजेंस चलाते हैं. जानकारी के मुताबिक उन्होंने ही हिमाचल में 2022 में कांग्रेस का कैंपेन चलाया था. इसके अलावा 2023 में छत्तीसगढ़ चुनाव में भी जिम्मेदारी ली थी.
सुचेता डे अब क्या करती हैं
सुचेता डे तब JNUSU की अध्यक्ष बनीं, जब कई सालों के अंतराल के बाद कैंपस में चुनाव फिर से शुरू हुए थे. उन्होंने AISA को छात्र राजनीति में फिर से सबसे आगे ला खड़ा किया. कई पूर्व अध्यक्षों के विपरीत कैंपस छोड़ने के बाद भी सुचेता डे वामपंथी आंदोलन से मजबूती से जुड़ी रहीं. वह अब CPI(ML) लिबरेशन की केंद्रीय समिति की सदस्य हैं और देश भर में संगठनात्मक कार्यों, नागरिक स्वतंत्रता अभियानों और लोकतांत्रिक अधिकारों के आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं.
संदीप सिंह और मोना अब कहां सक्रिय हैं
उनसे पूर्व 2007-08 में AISA के अध्यक्ष संदीप सिंह रहे थे. मूल रूप से उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के रहने वाले संदीप सिंह JNU आने से पहले इलाहाबाद विश्वविद्यालय में छात्र राजनीति में सक्रिय हुए थे. JNU छोड़ने के बाद सिंह धीरे-धीरे वामपंथ से दूर हो गए और कांग्रेस के दायरे में आ गए. उनसे पूर्व 2004-05 और 2005-06 में मोना दास अध्यक्ष रही थीं. मोना ने राजनीति की बजाय अकादमिक जगत को चुना और फिलहाल एक कॉलेज में पढ़ा रही हैं.
सीवान में मारे गए चंद्रशेखर उर्फ चंदू
अब बात करते हैं लगातार दो साल 1994 से 1996 तक अध्यक्ष रहे चंद्रशेखर प्रसाद की. वह जेएनयू के एक चर्चित नेता थे, जो यहां से निकालकर अपने गृह राज्य सीवान में सक्रिय हुए थे. सीवान में उनकी गोलियां मारकर हत्या कर दी थी. उनकी हत्या काफी चर्चित हुई थी और उस कांड में इलाके के गैंगस्टर और फिर प्रतिनिधि बने मोहम्मद शहाबुद्दीन का नाम भी जुड़ा था.
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