- जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क में वन्यजीवों के साथ सैलानियों और वनकर्मियों की सुरक्षा चुनौतीपूर्ण बनी हुई है.
- 20 जुलाई को वन रक्षक पीतांबर को बाघ ने हमला किया, लेकिन साथी रामनाथ की बहादुरी से उसकी जान बच पाई.
- जिम कॉर्बेट में करीब 700 वन रक्षक चार-चार के समूह में गश्त करते हैं, जिनमें से अधिकांश दिहाड़ी मजदूर हैं.
उत्तराखंड के रामनगर में स्थित जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क दिल्ली-NCR के लोगों का पंसदीदा टूरिस्ट स्पॉट है. यहां सालों भर दूसरे राज्यों से भी सैलानियों का तांता लगा रहता है. यहां बाघ, तेंदुआ, हाथी सहित कई अन्य जीव रहते हैं. सैलानी दूर-दूर तक फैले जंगल में इन्हीं जानवरों का दीदार करने जाते हैं. लेकिन यहां जाना घूमना बेहद खतरनाक भी है. हाल ही में जिम कॉर्बेट पार्क में एक ऐसी घटना घटी, जिसे सुनकर वहां लोगों में खौफ आ जाता है. ये कहानी है जिम कॉर्बेट वन्यजीव अभयारण्य के गार्ड पीतांबर की. 28 साल का पीताबंर अभी भी उस घटना से उबर नहीं पाया है, जो 20 जुलाई को उसके साथ हुई.
चार साथियों के साथ था पीतांबर, अचानक बाघ ने दबोचा
उस घटना को याद करते हुए पीतांबर बताता है कि उस दिन वो नियमित गश्त पर निकले चार सदस्यीय दल में शामिल था. दल के दो सदस्य कुछ आगे चल रहे थे, जबकि रामनाथ उनके बीच में था, अचानक रामनाथ को एहसास हुआ कि पीतांबर उनके साथ नहीं है. पीछे मुड़कर देखने पर रामनाथ ने बाघ को पीतांबर के ऊपर बैठा पाया.
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साथी को बचाने में रामनाथ ने लगा दी जान
दोस्त को बाघ की चंगुल में देख रामनाथ के होश उड़ गए. उसके पास अपने दोस्त को बचाने के लिए कुछ करने का समय बहुत कम समय था. लेकिन तभी रामनाथ ने वह किया जिसकी हिम्मत बहुत कम लोग जुटा पाते हैं. उन्होंने हाथ में पकड़ी लाठी से बाघ पर ताबड़तोड़ वार किए. बाघ को ऐसे हमले की अपेक्षा नहीं थी, लिहाजा उसने पीतांबर को छोड़ दिया और झाड़ियों में चला गया.
गहरा घाव नहीं था, समय पर मदद से बची जान
इसके बाद रामनाथ ने पीतांबर से कहा, ‘‘मेरा हाथ पकड़ो'' तथा उन्होंने उसे उठने और अन्यत्र ले जाने में मदद की. उस समय पीतांबर अपने साथी रामनाथ से बस इतना ही कह सका कि बाघ ने उसे गलत जगह, यानी गर्दन पर काट लिया है. गनीमत यह रही कि बाघ के काटने से पीतांबर को गहरा घाव नहीं हुआ और समय पर मदद मिलने से उसकी जान बच गई.
वनकर्मियों ने उसे प्राथमिक उपचार दिया और फिर इलाज के लिए उसे पहले रामनगर और उसके बाद काशीपुर ले जाया गया. हालांकि, सभी वन रक्षकों की किस्मत पीतांबर जैसी नहीं होती.
फॉरेस्टर नेगी बोले- हर रोज मौत का रहता है खौफ
पिछले 37 वर्ष से वन विभाग में काम कर रहे फॉरेस्टर धर्मपाल नेगी ने को बताया कि जब वे गश्त पर निकलते हैं, तो हर कोई मन ही मन यही सोचता है कि चार लोग जंगल में जा रहे हैं, लेकिन हो सकता है कि लौटकर केवल तीन ही आएं. मारे गए कई वनकर्मियों को जल्द ही भुला दिया जाता है और कुछ मामलों में तो उनके शव भी बरामद नहीं हो पाते.
- जब देश के सबसे पुराने राष्ट्रीय उद्यान ने वन्यजीवों के हमलों में जान गंवाने वाले वनकर्मियों की याद में स्मारक बनाने का फैसला किया, तो 33 लोगों की सूची तैयार करने में ही 18 महीने लग गए.
- अब स्मारक की पट्टिका पर किसी और नाम के लिए जगह नहीं बची है. जंगल के ढांगढ़ी द्वार पर स्थित संग्रहालय के कर्मचारियों की इच्छा है कि भविष्य में दूसरी या इससे बड़ी पट्टिका लगाने की जरूरत कभी न पड़े.
1300 किमी में फैला है जिम कॉर्बेंट पार्क, 700 गार्ड करते गश्ती
करीब 1,300 वर्ग किलोमीटर में फैले इस उद्यान में लगभग 700 वन रक्षक गश्त करते हैं. इनमें से अधिकतर दिहाड़ी मजदूर हैं. उद्यान के कुल क्षेत्र में 500 वर्ग किलोमीटर से अधिक का मुख्य क्षेत्र भी शामिल है.
वन रक्षक चार-चार लोगों के समूह में और अलग-अलग पालियों में गश्त करते हैं. जंगल में विभिन्न स्थानों पर बनी चौकियों से वे पैदल निकलते हैं. दल में केवल एक व्यक्ति के पास बंदूक होती है, जबकि बाकी के पास सिर्फ लाठियां होती हैं.
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