- एस जयशंकर ने म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में बताया कि नया वर्ल्ड ऑर्डर मल्टी-अलाइनमेंट की रणनीति पर आधारित होगा
- अमेरिका-चीन मुकाबले के बीच उभरती और मध्यम ताकतें अपने विकल्प बढ़ाने पर ध्यान दे रही हैं
- क्वाड, ब्रिक्स, इंटरनेशनल सोलर अलायंस जैसे प्लेटफॉर्म सहयोग और वैश्विक आवाज को मजबूत करने के उदाहरण हैं
नई दिल्ली में आयोजित म्यूनिख सिक्योरिटी में विदेश मंत्री एस जयशंकर ने नये वर्ल्ड ऑर्डर को बहुत शानदार ढंग से समझाया. जयशंकर ने कहा कि दुनिया तेजी से बदल रही है. उन्होंने अमेरिका-चीन मुकाबले पर कहा कि दुनिया 'गोल्डीलॉक्स सिनेरियो' में है. उभरती और मध्यम ताकतें अब अपने विकल्प बढ़ाने और जोखिम कम करने पर फोकस कर रही हैं और हितों में सीधा टकराव नहीं होने पर वे आपस में सहयोग को तैयार हैं, जिसका उदाहरण 'क्वाड' है.
कैसा है नया वर्ल्ड ऑर्डर
जयशंकर ने कहा, "अमेरिका और चीन के बीच मुकाबले के संदर्भ में देखें, तो मुझे लगता है कि हम उस स्थिति की ओर देख रहे हैं जिसे अक्सर 'गोल्डीलॉक्स सिनेरियो' कहा जाता है. यानी आप नहीं चाहते कि हालात बहुत ज्यादा गर्म हों, न ही बहुत ज्यादा ठंडे. आप चाहते हैं कि स्थिति इन दोनों के बीच सही संतुलन में रहे तो ऐसे में उभरती हुई और मध्यम ताकत वाले देशों के लिए क्या स्थिति बनती है? मेरा मानना है कि आज इनमें से ज्यादातर देश हर तरह से अपने विकल्प बढ़ाने और जोखिम कम करने पर ध्यान दे रहे हैं. यह सिर्फ उनकी अर्थव्यवस्था या सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि वे अपनी सप्लाई चेन को भी ज्यादा मजबूत और भरोसेमंद बनाने की कोशिश कर रहे हैं."
उन्होंने आगे कहा कि कई मायनों में ये देश नई व्यवस्थाएं तैयार कर रहे हैं और अलग-अलग मुद्दों के आधार पर सहयोग बढ़ा रहे हैं.मल्टी-अलाइनमेंट' (कई गुटों या देशों के साथ तालमेल) का विचार तेजी से चलन में आएगा. यह सोच कि देश ऐसे पक्षों के साथ संबंध रखेंगे, जिनके बीच तालमेल बिठाना हमेशा आसान नहीं होगा, लेकिन फिर भी वे एक सच्चाई है, देशों की एक मजबूरी है. यह जोखिम कम करते हुए आगे बढ़ने की एक रणनीति है. फिर यह देखना होगा कि इसका मल्टीलेटरलिज़्म (बहुपक्षवाद) पर क्या असर पड़ता है, जो पहले से ही साफ तौर पर दबाव में है क्योंकि मुख्य बहुपक्षीय संस्था, यूनाइटेड नेशन्स, साफ तौर पर गतिरोध का शिकार है. आखिरकार, इसका एक नतीजा छोटे समूहों का बनना होगा.
विदेश मंत्री ने कहा कि उभरती हुई और मध्यम ताकतों के लिए साथ काम करने का आधार एक हद तक विचारों और हितों में समानता होना चाहिए और शायद पहले से ऐसा हो भी रहा है. मुझे लगता है कि वे दिन अब पीछे छूट गए हैं, जब देशों के विचार बिल्कुल एक जैसे होना या उनके हितों में बहुत ज्यादा समानता होना जरूरी माना जाता था. आज के समय में यह उम्मीद कुछ ज्यादा ही है. अगर देशों के बीच सहयोग के लिए पर्याप्त साझा मुद्दे हैं, तो उनके लिए मिलकर काम करने के लिए इतना ही काफी है. जोखिम कम करने, विकल्प बढ़ाने और अलग-अलग रास्ते खुले रखने की इस प्रक्रिया में धीरे-धीरे एक नया ढांचा तैयार हो रहा है. अब सवाल यह है कि कौन किसके साथ सहयोग करेगा? उभरती हुई और मध्यम ताकतों के बीच अगर हितों का सीधा टकराव नहीं है, तो स्वाभाविक है कि वे आपस में सहयोग मजबूत करना चाहेंगी. साथ ही, यह भी स्वाभाविक है कि वे अमेरिका के साथ और निश्चित रूप से चीन के साथ भी सहयोग करेंगी.
इसमें कैसे करना होगा काम
जयशंकर ने कहा कि अगर आज हम समुद्री क्षेत्र और हिंद-प्रशांत को देखें, तो 'क्वाड' एक ऐसा उदाहरण है, जहां उभरती और मध्यम ताकतें एक स्थापित बड़ी ताकत के साथ मिलकर सहयोग कर रही हैं. ऐसे ही आईएमईसी पहल (इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप कनेक्टिविटी कॉरिडोर), इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर या पोलर रूट (नॉर्दर्न सी रूट), ये सभी सहयोग के विषय हो सकते हैं. अगर आप ग्लोबल ऑर्डर में अपनी आवाज को मजबूत करने के नजरिए से देखें, तो 'ब्रिक्स' एक अच्छा उदाहरण है. असल में 'ब्रिक्स' इस बात का उदाहरण है कि आज कई देश महसूस करते हैं कि उनकी सामूहिक आवाज उनकी अलग-अलग आवाजों की तुलना में कहीं ज्यादा मजबूत है.
अगर मैं रिसोर्स या टेक्नोलॉजी के क्षेत्र की बात करें तो 'पैक्स सिलिका' एक नया उदाहरण है. अगर आप ग्लोबल भलाई के नजरिए से बड़े पैमाने पर सोचें, तो इंटरनेशनल सोलर अलायंस या कोएलिशन फॉर डिजास्टर रेजिलिएंट इंफ्रास्ट्रक्चर (सीडीआरआई) जैसे उदाहरण हैं. इन दोनों की शुरुआत भारत ने की थी और ये बहुत सफल रहे हैं; जैसे आज आईएसए के 100 से ज्यादा सदस्य हैं. आज स्थिति यह है कि कई देश जरूरी नहीं कि वे दुनिया के सबसे बड़े, दूसरे या तीसरे नंबर के देश हों, जहां उनके हित एक जैसे होते हैं, वहां वे साथ आते हैं. वे काम करने के तरीके ढूंढते हैं, एक एजेंडा बनाते हैं, कभी-कभी संगठन बनाते हैं और सहयोग की आदतें विकसित करते हैं. और यही आज का उभरता हुआ ग्लोबल ऑर्डर है.
यूरोप पर बड़ा बयान
डॉ. एस. जयशंकर ने बताया, "यूरोप के पास दुनिया को देने के लिए बहुत कुछ है. गहरी साझेदारी से बहुत फायदा हो सकता है. कभी-कभी मुझे लगता है कि शायद यूरोप को ही इस बात का पूरा अंदाडा नहीं है. पिछले कुछ सालों में यूरोप एक साथ मिलकर और मजबूत हुआ है, और इसलिए मल्टीपोलर (बहु-ध्रुवीय) व्यवस्था के एक ध्रुव के तौर पर दुनिया के मंच पर उसकी विश्वसनीयता बढ़ी है. आज यूरोप की स्थिति वाकई बहुत मजबूत है और सच कहूं तो भारत जैसे देश के लिए उससे संपर्क बढ़ाने और रिश्ते विकसित करने का एक बहुत बड़ा आकर्षण भी है..."
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रूस-भारत संबंध पर
विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने कहा, "भारत और रूस के संबंध ऐतिहासिक रूप से बहुत अच्छे रहे हैं, खासकर 1950 के दशक से. उस इतिहास को भुलाया नहीं जा सकता... हमारे लिए, और उससे पहले सोवियत संघ एक ऐसा देश था, जो कई तरह से हमारे साथ खड़ा रहा, खासकर तब जब हमारी सुरक्षा और हमारी क्षेत्रीय अखंडता खतरे में थी. ऐसे समय में जब दुनिया का एक बड़ा हिस्सा हमारे पड़ोसी देश में सैन्य शासन का समर्थन कर रहा था, रूस एक ऐसा देश था, जिसके साथ हमारे संबंध बहुत अच्छे थे और उस विरासत ने कई तरह से हमें आकार दिया है. आज, यह रिश्ता उससे कहीं आगे बढ़ चुका है. आज यह काफी हद तक एक आर्थिक रिश्ता भी है. इसमें सैन्य और परमाणु पहलू हैं, अंतरिक्ष से जुड़े मुद्दे हैं, लेकिन दोनों देशों के बीच बड़े पैमाने पर व्यापार और निवेश के साथ-साथ ऊर्जा और संसाधनों का भी आदान-प्रदान होता है. भारत का अनुभव काफी सकारात्मक और लगातार सकारात्मक रहा है. इसके बावजूद, आज हम एक दुर्भाग्यपूर्ण संघर्ष देख रहे हैं. इस संघर्ष पर हमारा रुख बहुत स्पष्ट रहा है कि हम इस संघर्ष का अंत चाहते हैं."
अगले 5-10 सालों में भारत कहां होगा?
डॉ. एस. जयशंकर कहते हैं, "...कुछ ताकतें 'मिडल' (मध्यम) स्तर की हैं, तो कुछ 'अपर-मिडल' (ऊपरी-मध्यम) स्तर की... कुछ ताकतों में बहुत तेजी से आगे बढ़ने की काफी और वास्तविक क्षमता है, चाहे वह निकट भविष्य हो या मध्यम अवधि. भारत के मामले में, हमारे सामने कई दशकों तक तेजी से विकास करने का मौका है, और हमारे पास ऐसी आबादी (डेमोग्राफी) है जो इस विकास को बनाए रखेगी. मैं तो यह भी कहूंगा कि दुनिया अब कहीं ज्यादा क्रिएटिव हो गई है और उसमें कई नई संभावनाएं हैं, इसलिए हमें जरूरी नहीं कि औद्योगीकरण के पुराने रास्ते पर ही चलना पड़े. भविष्य की चुनौतियों के लिए हमें पारंपरिक रास्ते से हटकर कुछ ज्यादा आधुनिक तरीका अपनाना होगा. मध्यम स्तर की ताकतों में से कुछ आगे निकल जाएंगी, कुछ वहीं बनी रहेंगी, और कुछ शायद थोड़ा पीछे छूट जाएंगी. यही सच्चाई है. यह ग्लोबल ऑर्डर (वैश्विक व्यवस्था) के विकास का ही एक हिस्सा होगा."
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