- छत्तीसगढ़ के वेदांता प्लांट ब्लास्ट में 24 और तमिलनाडु के पटाखा फैक्ट्री धमाके में 25 मजदूर मारे गए
- 2023 में भारत की फैक्ट्रियों में औसतन रोजाना तीन मजदूरों की मौत हुई, कुल 1090 मजदूर दुर्घटनाओं का शिकार बने
- 2014 से 2023 तक फैक्ट्रियों में 11,108 मजदूरों की मौतें हुईं, जिनमें गिरना सबसे प्रमुख कारण रहा है
14 अप्रैल: छत्तीसगढ़ के सक्ती में वेदांता पावर प्लांट में एक ब्लास्ट हुआ और 24 मजदूरों की मौत हो गई. दर्जनों घायल भी हुए, जिनका इलाज चल रहा है. शुरुआती जांच में लापरवाही का आरोप लगाया गया है. वेदांता ग्रुप के चेयरमैन अनिल अग्रवाल पर FIR दर्ज की गई है.
19 अप्रैल: तमिलनाडु के विरुधनगर में वनाजा पटाखा फैक्ट्री में जोरदार धमाका हुआ. इस धमाके में 25 मजदूरों की जान चली गई. 13 लोग घायल हुए. सबसे बड़ा उल्लंघन तो यही हुआ कि रविवार को फैक्ट्री में काम नहीं हो सकता था, लेकिन काम करवाया गया.
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ये घटनाएं हाल-फिलहाल की हैं. लेकिन फैक्ट्रियों में कभी धमाका होना और कभी बॉयलर फटना आम है. इन घटनाओं में फैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूर बेमौत मारे जाते हैं. FIR होती है. फैक्ट्री मालिकों पर जुर्माना भी लगता है लेकिन सजा कुछ ही लोगों को होती है. सरकार के आंकड़े बताते हैं कि फैक्ट्रियों में हर दिन तीन मजदूर मारे जाते हैं. ये आंकड़ा और कहीं ज्यादा होगा, क्योंकि 90% मजदूर असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं.
मजदूरों की मौत पर क्या कहते हैं आंकड़े?
भारत में करोड़ों की संख्या में लोग ऐसी जगहों पर काम करते हैं, जिनका कोई रिकॉर्ड ही नहीं रखा जाता. जब रिकॉर्ड नहीं तो मजदूरों की मौत का भी कोई आंकड़ा नहीं.
हालांकि, श्रम मंत्रालय से जुड़े डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ फैक्ट्री एडवाइस सर्विस एंड लेबर इंस्टीट्यूट (FASLI) पर 2023 तक के आंकड़े मौजूद हैं. इसके मुताबिक, 2023 तक कुल 3.34 लाख फैक्ट्रियां रजिस्टर्ड थीं, जिनमें 1.91 करोड़ से ज्यादा मजदूर काम करते थे.
FASLI की रिपोर्ट बताती है कि 2023 में फैक्ट्रियों में हुई दुर्घटनाओं में 1,090 मजदूरों की मौत हो गई थी. इस हिसाब से हर दिन औसतन 3 मजदूरों की मौत हुई. इनके अलावा 2,949 मजदूर काम करते समय किसी न किसी दुर्घटना का शिकार हुए और घायल हो गए.
2014 से 2023 के बीच 11,108 फैक्ट्री मजदूरों की मौत हुई. ये आंकड़े बताते हैं कि हर साल औसतन 11 सौ मजदूरों की मौत हो रही है.

मौतों का कारण क्या है?
देश में आज भी ज्यादा फैक्ट्रियों में मजदूर वैसे ही काम कर रहे हैं, जैसे सालों पहले करते थे. न तो सुरक्षा की कोई व्यवस्था है और न ही मेडिकल के कोई इंतजाम.
FASLI की रिपोर्ट के मुताबिक, 2014 से 2023 के बीच जो 11,108 मजदूर मारे गए हैं, उनमें सबसे ज्यादा 2,101 मौतें गिरने या फिसलने की वजह से हुईं.
इसके अलावा 1,231 मजदूरों की मौतें मैकेनिकल पावर से चलने वाली मशीनों से हो गई, जो मशीन सेफ्टी और ट्रेनिंग की कमी को दिखाता है. आग लगने से 956, धमाकों से 924 और बिजली से 885 मजदूरों की मौत हो गई. यह बताता है कि फैक्ट्रियों में फायर सेफ्टी और इलेक्ट्रिकल सेफ्टी अभी भी बड़ा सवाल है.

यही रिपोर्ट ये भी बताती है कि ज्यादातर फैक्ट्रियों में मजदूर बुरी हालत में काम कर रहे हैं. 3.34 लाख रजिस्टर्ड फैक्ट्रियों में से सिर्फ 6,592 में सेफ्टी अफसर और 4,222 में मेडिकल अफसर हैं. 34,450 फैक्ट्रियां ही ऐसी हैं जहां कोई सेफ्टी पॉलिसी है. इतना ही नहीं, सिर्फ 2,272 फैक्ट्रियों में ही कोई ऑन साइट इमरजेंसी प्लान है. इसका मतलब है कि अगर फैक्ट्री में कुछ हादसा हो जाए तो मजदूरों का वहां से निकल पाना ही मुश्किल हो जाएगा.
ये आंकड़े पूरी तस्वीर बयां नहीं करते, क्योंकि रजिस्टर्ड फैक्ट्रियों की संख्या सिर्फ 3.34 लाख है. जबकि 90% से ज्यादा मजदूर अभी भी असंगठित क्षेत्रों से जुड़े हैं, जिनका कोई रजिस्ट्रेशन नहीं होता.
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