पश्चिम बंगाल में इस साल दुर्गा पूजा के दौरान भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) (सीपीआई-एम) के बुक स्टॉल को लेकर विवाद दिखा. पूजा पंडालों के पास हर साल लगने वाले इन स्टॉल को रोकने राज्य सरकार के फैसले की राजनीतिक दलों और आम लोगों ने आलोचना की. कुछ जगहों पर दक्षिणपंथी कार्यकर्ताओं की ओर से इन स्टॉलों पर हमले किए जाने की भी खबरें हैं. वहीं कुछ जगहों पर पुलिस ने उन्हें हटाने की कोशिश की. लेकिन तमाम तरह के अवरोधों के बाद भी किताबों की बिक्री में बड़ी बढ़ोतरी दर्ज की गई है.
इस साल पूजा के दौरान कोलकाता के जादवपुर, हॉल्टू और कस्बा समेत कई इलाकों में सीपीआई-एम के बुक स्टॉल में तोड़फोड़ और उन्हें हटाने की कोशिशों की खबरें आईं. इन घटनाओं के बीच किताबों की बिक्री के उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि बंगाल में राजनीतिक विचारधारा से जुड़ी किताबें पढ़ने में लोगों की दिलचस्पी बनी हुई है.
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जादवपुर में सीपीएम के स्टॉल पर बिकीं 16 लाख की किताबें
जादवपुर का पुस्तक स्टॉल इस विवाद का प्रमुख केंद्र था.हर साल की तरह इस साल भी जादवपुर के 8बी इलाके में सीपीआई-एम का पुस्तक स्टॉल लगा. पुलिस ने उसे बुलडोजर से हटाने की कोशिश की. लेकिन सीपीएम कार्यकर्ताओं और समर्थकों के विरोध की वजह से उसे अपने कदम पीछे खींचने पड़े. इस घटना की राजनीतिक हलकों में काफी चर्चा हुई. बताया गया कि तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के शासनकाल में इस तरह की घटना सामने नहीं आई थीं.
जादवपुर में सीपीआई-एम के किताबों के स्टॉल पर पाठकों की भीड़ जुटी. जानकारी के मुताबिक इस स्टॉल से 16 लाख रुपये से अधिक की किताबें बिकीं. यह आंकड़ा इसलिए भी अहम है, क्योंकि स्टॉल को लेकर विवाद के बावजूद लोगों ने वहां पहुंचकर किताबें खरीदीं. यह स्टॉल केवल किताबें बेचने की ही जगह नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और वैचारिक चर्चा का केंद्र भी बन गया.
कई जगह हुई बुक स्टॉलों को हटाने की कोशिश
कोलकाता के हॉल्टू इलाके में भी जादवपुर जैसी स्थिति रही. वार्ड नंबर 106 में लगे सीपीएम के पुस्तक स्टॉल को हटाने की कोशिश के आरोप हैं. लेकिन तमाम बाधाओं के बावजूद वहां किताबों की बिक्री हुई.आयोजकों के मुताबिक, हॉल्टू में करीब 50 हजार रुपये की किताबें बिकीं. जादवपुर की तुलना में यह रकम कम थी, लेकिन वामपंथी कार्यकर्ताओं और समर्थकों का कहना है कि पुस्तक स्टॉल की अहमियत को केवल बिक्री से नहीं आंका जा सकता. उनके मुताबिक, ऐसे स्टॉल लोगों से जुड़ने, राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर बातचीत करने और पढ़ने की आदत को बढ़ावा देने का माध्यम भी हैं.
सीपीआई-एम नेता सुजन चक्रवर्ती के मुताबिक उनकी पार्टी 1952 से दुर्गा पूजा के दौरान पुस्तक स्टॉल लगाती आ रही है. उनका दावा है कि इस साल वामपंथी पुस्तक स्टॉल को बड़े पैमाने पर निशाना बनाया गया. चक्रवर्ती के मुताबिक, इस साल 227 वामपंथी पुस्तक स्टॉलों पर हमले किए गए या उन्हें निशाना बनाया गया. इनमें से 13 स्टॉल बंद हो गए. उन्होंने बताया कि पिछले साल 12 जिलों में किताबों की कुल बिक्री 48 लाख रुपये से अधिक थी. इस साल यह बढ़कर 98 लाख रुपये हो गई. यानी बिक्री में करीब 104 फीसद की बढ़ोतरी हुई. उनके अनुसार, इन आंकड़ों से पता चलता है कि मुश्किलों के बावजूद लोगों की किताबों में दिलचस्पी कम नहीं हुई है.
कस्बा में गैरेज बनवाया बुक स्टॉल
कोलकाता के कस्बा इलाके में स्थिति कुछ अलग रही. वहां पुस्तक स्टॉल को हटाने और सीपीआई-एम कार्यकर्ताओं पर हमले का आरोप है. हालांकि इसके बाद भी किताबों की बिक्री बंद नहीं हुई. मिलन बनर्जी नाम के एक व्यक्ति ने अपने गैरेज में नया पुस्तक स्टॉल लगाने की जगह दी. इस अस्थायी व्यवस्था के बावजूद वहां करीब 50 हजार रुपये की किताबें बिकीं.यह घटना दिखाती है कि अगर सड़क किनारे स्टॉल लगाने की जगह नहीं मिलती, तो पढ़ने के शौकीन लोगों के लिए गैरेज जैसी जगह भी किताबों और विचारों पर चर्चा का केंद्र बन सकती है.
जादवपुर में 16 लाख रुपये से अधिक, हॉल्टू में करीब 50 हजार रुपये और कस्बा में गैरेज के भीतर लगाए गए स्टॉल पर करीब 50 हजार रुपये की किताबों की बिक्री हुई. ये आंकड़े बताते हैं कि बाधाओं के बावजूद पाठकों की दिलचस्पी बनी रही.इस साल दुर्गा पूजा के दौरान चर्चा केवल भव्य पंडालों और रोशनी तक सीमित नहीं रही. पुस्तक स्टॉल को लेकर हुए विवाद और किताबों की बिक्री में बढ़ोतरी ने भी लोगों का ध्यान खींचा.
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