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छह दशक में कैसे बदली है बंगाल में दुर्गा पूजा, इस साल क्या नया नजर आया

दुर्गा पूजा पश्चिम बंगाल की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी हुई है. पत्रकार जयंत घोषाल बता रहे हैं कि उन्होंने पिछले छह दशक में बंगाल की दुर्गा पूजा में क्या क्या बदलाव देखेैं. और कैसे रही इस साल की दुर्गा पूजा.

छह दशक में कैसे बदली है बंगाल में दुर्गा पूजा, इस साल क्या नया नजर आया
कोलकाता:

मैं पिछले छह दशक से कोलकाता की दुर्गा पूजा को देखता आ रहा हूं. हर सांस्कृतिक परंपरा की तरह दुर्गा पूजा भी एक जैसी नहीं रही है. समय के साथ इसमें बदलाव आते रहे हैं. यह लगातार बदलती रहने वाली परंपरा है. लेकिन 2026 की दुर्गा पूजा पहले के सालों से काफी अलग रही. इसे एक नए सांस्कृतिक बदलाव के रूप में देखा जा सकता है.

इस साल एक बड़ा बदलाव यह देखने को मिला कि दुर्गा पूजा का उद्घाटन करने में फिल्म इंडस्ट्री, खासकर टॉलीवुड और टेलीविजन के कलाकारों की भूमिका पहले की तुलना में अलग रही. पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व में बीजेपी की सरकार बनने के बाद त्योहार का राजनीतिक और सांस्कृतिक स्वरूप भी बदला हुआ नजर आया.

पहले दुर्गा पूजा से ठीक पहले फिल्मी सितारों, खासकर एक्टर-एक्ट्रेस की मौजूदगी बड़ा आकर्षण होती थी. उनके आने पर लोग उत्साह में नाचते थे. दुर्गा प्रतिमा के विसर्जन के समय डीजे पर तेज आवाज में संगीत और शोर-शराबे वाले गाने बजाना भी लगभग परंपरा बन गया था. लेकिन इस साल का उत्सव पहले की तुलना में फिल्मी संस्कृति के प्रभाव से कुछ कम घिरा हुआ दिखाई दिया.

अगर सुवेंदु अधिकारी और बीजेपी के दूसरे नेता सनातनी दुर्गा पूजा को अपनी सांस्कृतिक सोच के हिसाब से बदलने की कोशिश कर रहे हैं, तो उन्हें यह याद रखना चाहिए कि दुर्गा पूजा बंगाली समाज की जड़ों से जुड़ी हुई है. बंगाल के मध्यवर्ग के लिए यह हमेशा से उसकी सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा रही है. इसकी जड़ें 19वीं सदी तक जाती हैं, जब कोलकाता ब्रिटिश भारत की राजधानी हुआ करता था.

वामपंथी सरकार के दौर में दुर्गा पूजा कैसी होती थी

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) या सीपीएम, की 34 साल से ज्यादा समय तक पश्चिम बंगाल में सरकार रही. इस दौरान दुर्गा पूजा पर कभी प्रतिबंध नहीं लगाया गया और न ही इसे जानबूझकर रोकने की कोशिश की गई. हालांकि, विचारधारा के स्तर पर एक प्रतिबद्ध कम्युनिस्ट से नास्तिक होने की उम्मीद की जाती थी. वह मानवतावादी हो सकता था, लेकिन उससे धार्मिक कर्मकांडों में विश्वास रखने वाले हिंदू की तरह व्यवहार करने की अपेक्षा नहीं थी. इस वजह से दुर्गा पूजा को अक्सर शरद ऋतु के त्योहार के रूप में पेश किया जाता था. इसमें धार्मिक कर्मकांडों के मुकाबले सामाजिक मेलजोल और आपसी भाईचारे पर ज्यादा जोर दिया जाता था.

यह उत्तर भारत और हिंदी भाषी क्षेत्रों में मनाए जाने वाले नवरात्र से अलग था. वहां नवरात्र का धार्मिक स्वरूप ज्यादा प्रमुख रहा है. बंगाल में दुर्गा पूजा धीरे-धीरे एक व्यापक सामाजिक और सांस्कृतिक उत्सव बन गई.

ममता बनर्जी के 15 साल के शासन में दुर्गा पूजा का सामाजिक पक्ष और ज्यादा मजबूत हुआ. यूनेस्को ने भी कोलकाता की दुर्गा पूजा को अपनी अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सूची में शामिल किया. इसके पीछे त्योहार के दौरान लोगों के बीच मेलजोल और भाईचारे की भावना भी एक अहम वजह थी. हालांकि, ममता बनर्जी के शासनकाल में दुर्गा पूजा का स्वरूप एक बड़े कार्निवल जैसा भी हो गया. खासकर रेड रोड पर आयोजित होने वाले दुर्गा पूजा कार्निवल में फिल्मी सितारे, अभिनेत्रियां और दूसरे मशहूर लोग प्रमुखता से हिस्सा लेने लगे. इनमें से कुछ कलाकार मंच पर रवींद्र संगीत पर नाचते थे, जबकि कुछ हिंदी गानों पर प्रस्तुति देते थे. धीरे-धीरे इस तरह के कार्यक्रम दुर्गा पूजा का जाना-पहचाना हिस्सा बन गए.

कोलकाता के एक दुर्गा पूजा पांडाल में पहुंचे पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदू अधिकारी और फिल्म अभिनेता रणवीर कपूर.

कोलकाता के एक दुर्गा पूजा पांडाल में पहुंचे पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदू अधिकारी और फिल्म अभिनेता रणवीर कपूर.
Photo Credit: PTI

बीजेपी की सरकार में दुर्गा पूजा 

सुवेंदु अधिकारी की सरकार ने इस साल दुर्गा पूजा को अलग तरीके से आयोजित करने की कोशिश की है. इस बदलाव के दो पहलू हैं और दोनों पर ध्यान देना जरूरी है. पहली बात यह है कि दुर्गा पूजा के सनातनी हिंदू स्वरूप पर जोर देने में मुझे कोई बुराई नहीं दिखती. मैं पिछले 40 सालों से दिल्ली में रह रहा हूं और यहां नवरात्र का उत्सव देखता आया हूं. ऐसे में अगर कुछ लोग चाहते हैं कि बंगाल की दुर्गा पूजा में भी नवरात्र जैसी गरिमा और धार्मिक महत्व दिखाई दे, तो इसे गलत नहीं कहा जा सकता. लेकिन बंगाल की पारंपरिक दुर्गा पूजा का स्वरूप दूसरे क्षेत्रों में होने वाली सनातनी पूजा से पूरी तरह मेल खाए, यह जरूरी नहीं है. यहां तक कि देवी दुर्गा की पारंपरिक प्रतिमा भी पूरी तरह उस स्वरूप जैसी नहीं है, जिसे सख्ती से वैदिक परंपरा का हिस्सा कहा जा सके.

आज जिस रूप में दुर्गा पूजा मनाई जाती है, वह धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं की कई परतों से मिलकर बनी है. ऋग्वेद में दुर्गा पूजा की वह परंपरा नहीं मिलती, जो आज दिखाई देती है. पहले देवी की पूजा के अलग-अलग रूप थे और उनका अपना ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संदर्भ भी था. आज की बहस में इन बातों को नहीं भूलना चाहिए.

इस साल ऐसा लगता है कि बंगाल की दुर्गा पूजा को पूरे भारत में मनाए जाने वाले नवरात्र और दशहरे के स्वरूप के करीब लाने की कोशिश हो रही है. खासकर हिंदी भाषी क्षेत्रों में नवरात्र और दशहरे का जो स्वरूप है, उस पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है. अलग-अलग क्षेत्रों में धार्मिक पंचांग के अनुसार विजयादशमी अलग-अलग दिन भी मनाई जा सकती है. बंगाल और हिंदी भाषी क्षेत्रों के त्योहारों की तारीखों में कभी-कभी यह अंतर दिखाई देता है. उदाहरण के लिए, नागपुर में लोग जिस दिन नवमी मना रहे होते हैं, उसी दिन किसी दूसरे क्षेत्र के पंचांग के अनुसार विजयादशमी हो सकती है.

बीजेपी, सीपीएम और कोलकाता के कालीघाट क्षेत्र में सक्रिय तृणमूल कांग्रेस की दुर्गा पूजा के स्वरूप को लेकर अपनी-अपनी राय हो सकती है. लेकिन चिंता की बात यह है कि सुवेंदु अधिकारी की सोच के पीछे चुनावी गणित भी हो सकता है. संभव है कि वह हिंदी भाषी मतदाताओं को आकर्षित करना चाहते हों. नवरात्र और उससे जुड़ी परंपराओं पर ज्यादा जोर देने की एक वजह यह भी हो सकती है.

पश्चिम बंगाल में इस साल की दुर्गा पूजा पिछले सालों की तुलना में काफी अलग रही.

पश्चिम बंगाल में इस साल की दुर्गा पूजा पिछले सालों की तुलना में काफी अलग रही.
Photo Credit: PTI

दुर्गा पूजा समितियों को संभालने में प्रशासन नाकाम?

इस साल एक गंभीर प्रशासनिक चूक भी सामने आई है. कुछ पुरानी और स्थापित दुर्गा पूजा समितियों को जिस तरह संभाला गया, वह सुवेंदु अधिकारी सरकार की एक बड़ी कमी है. दुर्गा पूजा की कई पुरानी समितियों में ममता बनर्जी के करीबी लोग जुड़े हुए थे. नई सरकार ने इन पुरानी व्यवस्थाओं को तोड़ने और समितियों पर नियंत्रण करने या उनका पुनर्गठन करने की कोशिश की. लेकिन इन समितियों से जुड़े लोग कई सालों से दुर्गा पूजा का आयोजन कर रहे थे. उन्हें सुरक्षा, प्रशासन और बड़े सार्वजनिक आयोजनों की जिम्मेदारियों का अच्छा अनुभव था. जब इन लोगों को किनारे कर दिया गया, तो उनके अनुभव का सही इस्तेमाल नहीं किया गया. चोरबागान दुर्गा पूजा में भी ऐसा ही हुआ. इसका नतीजा सबके सामने है.

सुवेंदु अधिकारी के सलाहकारों को केवल पुलिस पर निर्भर रहने की बजाय पुराने आयोजकों के अनुभव का भी लाभ उठाना चाहिए था. सरकार बदलने का मतलब यह नहीं होना चाहिए कि पुराने लोगों और व्यवस्थाओं को बिना समझे अचानक हटा दिया जाए. ऐसा लगा कि इस पूरे मामले को जल्दबाजी में संभाला गया. मानो हर दुर्गा पूजा को यह देखकर बांटना जरूरी हो कि वह ममता बनर्जी की पूजा है या बीजेपी की. दुर्गा पूजा को इस बात की राजनीतिक लड़ाई नहीं बनना चाहिए कि उस पर किस पार्टी का अधिकार है. इस साल के अनुभव से साफ है कि बंगाल में दुर्गा पूजा के आयोजन और उसके सांस्कृतिक स्वरूप पर दोबारा विचार करने की जरूरत है.

थीम पूजा और पारंपरिक पूजा के बीच बहस

एक और अहम सवाल थीम बेस्ड दुर्गा पूजा और पारंपरिक पूजा के बीच संबंध का है. पिछले कुछ सालों में थीम पूजा का चलन तेजी से बढ़ा है. ऐसी पूजाओं को देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं और उन्हें दुनिया भर में पहचान भी मिलती है. इसी बीच बीजेपी नेता कौस्तव बागची ने सुझाव दिया कि सभी थीम आधारित दुर्गा पूजाओं को बंद कर देना चाहिए. लेकिन सवाल यह है कि क्या ऐसा करना सही होगा?

बहुत से लोगों को देवी दुर्गा की पारंपरिक एकचाला प्रतिमा पसंद आती है. इसमें देवी दुर्गा और उनके साथ मौजूद दूसरी प्रतिमाओं को एक ही ढांचे में सजाया जाता है. इस स्वरूप की अपनी खास पारंपरिक सुंदरता है. लेकिन इस रूप को सनातनी कहा जाए या शाबेकी यानी पारंपरिक, इन दोनों शब्दों का अर्थ जरूरी नहीं कि एक ही हो.

कोलकाता में पिछले कुछ सालों से थीम बेस्ड दुर्गा पूजा पांडालों का चलन काफी बढ़ा है. यहां आने वाले लोगों की संख्या भी अधिक होती है.

कोलकाता में पिछले कुछ सालों से थीम बेस्ड दुर्गा पूजा पांडालों का चलन काफी बढ़ा है. यहां आने वाले लोगों की संख्या भी अधिक होती है.

सनातनी शब्द का वास्तविक अर्थ भी उन लोगों में हमेशा साफ नहीं होता, जो इसका इस्तेमाल करते हैं. वहीं, किसी पूजा को शाबेकी कहना उसकी आलोचना करना नहीं है. इसका मतलब पुराने और पारंपरिक तरीके से पूजा करना है. पीढ़ियों से चली आ रही ऐसी परंपराओं को बचाए रखने में भी काफी सुंदरता है. यह सही है कि कभी-कभी थीम पूजा में प्रयोग की सीमा पार हो जाती है. कुछ जगहों पर देवी दुर्गा की प्रतिमा बनाने के लिए असामान्य चीजों और तरीकों का इस्तेमाल किया गया है.  उदाहरण के तौर पर एक जगह बैंगन की पकौड़ी यानी बेगुनी और फुलौरी जैसे तले हुए खाद्य पदार्थों से देवी की प्रतिमा तैयार की गई. कुछ लोगों को ऐसे प्रयोग जरूरत से ज्यादा या अनुचित लग सकते हैं.

इसके बावजूद, कई थीम आधारित पूजाएं समाज और संस्कृति से जुड़े महत्वपूर्ण संदेश देती हैं. वे लोगों को अलग-अलग मुद्दों पर सोचने के लिए प्रेरित करती हैं और आज की जिंदगी को रचनात्मक तरीके से सामने रखती हैं. इसलिए केवल कुछ थीम पूजाओं में जरूरत से ज्यादा प्रयोग होने के कारण सभी थीम पूजाओं को गलत नहीं ठहराया जा सकता. उन्हें पूरी तरह बंद करना सही कदम नहीं होगा.

इस साल दुर्गा पूजा में क्या सकारात्मक बदलाव दिखा

इस बात में कोई शक नहीं है कि 2026 की दुर्गा पूजा पहले के सालों से अलग रही है. त्योहार के सांस्कृतिक माहौल को बदलने की कोशिश दिखाई दी है. इस साल मुझे कुछ सकारात्मक बदलाव भी नजर आए.इनमें से पहला था, विजयादशमी के दिन तेज आवाज में डीजे बजाने और शोर-शराबा करने की घटनाओं में काफी कमी आई है. मैं यह नहीं कहूंगा कि यह पूरी तरह बंद हो गया है, लेकिन पहले की तुलना में इसका असर काफी कम दिखाई दिया.दूसरा बदलाव यह था कि कोलकाता के बाहर जिलों में आयोजित होने वाली दुर्गा पूजाओं पर ज्यादा ध्यान दिया गया है.

पिछले सालों में आर्थिक सहायता बांटने के मामले में अक्सर ऐसा लगता था कि प्रभावशाली लोगों से जुड़ी पूजाओं को ज्यादा फायदा मिलता है. कोलकाता की प्रमुख दुर्गा पूजा समितियों का संबंध अक्सर राजनीतिक नेताओं से होता था. इनमें बॉबी हकीम और अरूप बिस्वास से जुड़ी पूजाएं भी शामिल थीं. इसके कारण ऐसी व्यवस्था बन गई थी, जिसमें पहले से प्रभावशाली और राजनीतिक पहुंच रखने वाली समितियों को ज्यादा महत्व और सहायता मिलती थी. इस साल ऐसा लगता है कि इस व्यवस्था में बदलाव हुआ है. कोलकाता के बाहर होने वाली दुर्गा पूजाओं पर ज्यादा ध्यान दिया गया है. यह एक अच्छा कदम है. लेकिन चिंता यह है कि कहीं भविष्य में ऐसा न हो कि पुरानी व्यवस्था की जगह बीजेपी नेताओं से जुड़ी कुछ नई दुर्गा पूजा समितियां प्रभावशाली हो जाएं.

वित्त मंत्री स्वपन दासगुप्ता ने बताया है कि कई लोगों ने उनसे दुर्गा पूजा समितियों का अध्यक्ष बनने के लिए कहा, लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया. उनका कहना था कि पूजा समितियों का अध्यक्ष बनना नेताओं का काम नहीं है. नेताओं को पूजा में जाना चाहिए न कि आयोजन करने वाली समितियों का नेतृत्व करना चाहिए. उनकी यह सोच उचित है. लेकिन सवाल यह है कि क्या बीजेपी के बाकी नेता भी स्वपन दासगुप्ता की इस सोच को अपनाएंगे?

आशंका इस बात की है कि कहीं बीजेपी भी तृणमूल कांग्रेस जैसी राजनीतिक संस्कृति न अपना ले. दूसरे शब्दों में कहें तो कहीं वह भी उसी तरह काम न करने लगे, जिस राजनीतिक तौर-तरीके की वह पहले तृणमूल कांग्रेस की आलोचना करती रही है.

इस साल एक और सकारात्मक बदलाव यह देखने को मिला कि दुर्गा पूजा समितियों के भीतर आपसी विवाद और गुटबाजी कम दिखाई दी. पिछले सालों में अलग-अलग गुटों के बीच मतभेद और झगड़े त्योहार के दौरान बड़ी समस्या बन जाते थे. इस बार ऐसे मामले पहले की तुलना में कम नजर आए.

कोलकाता के चोरबगान पूजा पांडाल में पूजा के दौरान मची भगदड़ ने इस साल के आयोजनों में भीड़ प्रबंधन को लेकर कई सवाल खड़े किए हैं.

कोलकाता के चोरबगान पूजा पांडाल में पूजा के दौरान मची भगदड़ ने इस साल के आयोजनों में भीड़ प्रबंधन को लेकर कई सवाल खड़े किए हैं.
Photo Credit: PTI

इस साल सबसे दुखद घटना क्या हुई 

इस साल की सबसे दुखद घटना चोरबागान दुर्गा पूजा से जुड़ी रही. उम्मीद है कि सुवेंदु अधिकारी की सरकार इस घटना से सबक लेगी और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए जरूरी कदम उठाएगी. दुर्गा पूजा बंगाल की सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा है. इसे राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई बनाने के बजाय इसकी परंपरा, सामाजिक एकता और सांस्कृतिक विविधता को बनाए रखने पर ध्यान दिया जाना चाहिए.

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