विज्ञापन

फिल्मों में पैसा, सितारों से दोस्ती और नहीं माने तो गोली... बॉलीवुड और अपराध जगत के रिश्ते की ये है पूरी कहानी

टाइगर श्रॉफ पर फायरिंग ने हिंदी सिनेमा और अपराध जगत के पुराने रिश्ते की याद दिला दी है. इस खबर में जानिए कैसे फिल्मों में पैसा लगाने से लेकर सितारों को धमकाने तक फैला था अपराध सरगनाओं का नेटवर्क.

फिल्मों में पैसा, सितारों से दोस्ती और नहीं माने तो गोली... बॉलीवुड और अपराध जगत के रिश्ते की ये है पूरी कहानी
AI की सहायता से बनाई गई सांकेतिक तस्वीर

कभी फोन आया कि पैसे दो, नहीं दिए तो गोली चल गई. कभी अपराध के काले पैसे से फिल्म बनने के आरोप लगे तो कभी दुबई-शारजाह की महफिलों में हिंदी सिनेमा के सितारे अपराध जगत के बड़े चेहरों के मेहमान बने. रिश्ते इससे भी आगे गए और अभिनेत्रियों तथा अपराध सरगनाओं की कथित नजदीकियां सुर्खियां बनीं. यानी हिंदी सिनेमा और अपराध जगत का रिश्ता सिर्फ डर और वसूली का नहीं रहा, इसके कई चेहरे रहे हैं. 80 और 90 के दशक में दाऊद इब्राहिम, छोटा राजन, अबू सलेम और अरुण गवली जैसे नामों के दौर में यह रिश्ता अपने चरम पर दिखा. अब टाइगर श्रॉफ पर हुई फायरिंग ने उस पुराने दौर की याद फिर ताजा कर दी है. चेहरे और गिरोह भले बदल गए हों, लेकिन किसी बड़े सितारे को निशाना बनाकर खौफ पैदा करने का तरीका जाना-पहचाना लगता है. ऐसे में समझते हैं हिंदी सिनेमा और अपराध जगत के उस रिश्ते को, जिसमें कभी फिल्मवाले शिकार थे, कभी कारोबारी साझेदारी के आरोप लगे, कभी सितारे मेहमान बने और कभी बात कथित निजी रिश्तों तक पहुंची.

एक गोली, डर पूरी इंडस्ट्री में

90 के दशक में अपराध जगत और फिल्म इंडस्ट्री के रिश्ते का सबसे खौफनाक चेहरा वसूली और हिंसा के रूप में सामने आया. दाऊद इब्राहिम, छोटा राजन, अबू सलेम और अरुण गवली जैसे गिरोहों से जुड़े अपराधियों पर फिल्म निर्माताओं को धमकी देकर पैसे मांगने के आरोप लगे. तरीका खौफ पैदा करने वाला था. किसी एक बड़े फिल्म निर्माता या कारोबारी को निशाना बनाओ और बाकी इंडस्ट्री को संदेश पहुंचा दो. 1997 में गुलशन कुमार और निर्माता मुकेश दुग्गल की हत्या हुई. 2000 में राकेश रोशन पर गोलियां चलीं. अभिनेत्री मनीषा कोइराला के सचिव अजीत दीवानी की 2001 में हत्या और फिल्म निर्माता लॉरेंस डिसूजा पर 2002 में फायरिंग भी इसी दौर की घटनाओं में गिनी जाती है.

पर्दे के पीछे किसका पैसा?

रिश्ता सिर्फ वसूली और बंदूक का नहीं था. एक दौर में फिल्मों की फाइनेंसिंग में भी अपराध जगत का पैसा लगने के आरोप सामने आए.आज बड़ी कंपनियां और स्टूडियो फिल्मों में निवेश करते हैं, लेकिन कुछ दशक पहले फिल्म बनाने के लिए वैध और संस्थागत फाइनेंस के विकल्प सीमित थे. इसी कमी का फायदा अपराध जगत ने उठाया, ऐसा आरोप वर्षों से लगते रहे हैं. अवैध कारोबार से कमाए गए पैसे को फिल्मों में लगाने और फिर फिल्म की कमाई या विदेशी वितरण अधिकारों में हिस्सा लेने जैसे गंभीर आरोप कई बार सामने आए हैं.

एक फिल्म, जिसने खोली परत

2001 में फिल्म ‘चोरी चोरी चुपके चुपके' को लेकर दर्ज आपराधिक मामला हिंदी सिनेमा और अपराध जगत के रिश्ते की चर्चा का बड़ा उदाहरण बना. उस दौर में आरोप सिर्फ फिल्मों में पैसा लगाने तक सीमित नहीं थे. फिल्म में कौन कलाकार होगा और फिल्म के दृश्यों तक को प्रभावित करने जैसी बातें भी सामने आती थीं. 2002 में छोटा शकील और संजय दत्त के बीच बताई गई एक रिकॉर्डेड बातचीत भी सार्वजनिक चर्चा में आई. इसका हवाला अपराध जगत की फिल्म इंडस्ट्री में दिलचस्पी और पहुंच के संदर्भ में अब भी दिया जाता है. 
ये भी पढ़ें: Gen Z का ‘अंडरवर्ल्ड' : दोस्ती, Instagram का स्वैग और बंदूक... कैसे गैंग में फंस रहे 18-25 साल के लड़के

रिश्ते दोस्ती से भी आगे गए?

टाइगर श्रॉफ पर हुई फायरिंग ने अब पुराने सवाल फिर खड़े कर दिए हैं. हमले की जिम्मेदारी लॉरेंस बिश्नोई गिरोह से जुड़े होने का दावा करने वाले लोगों ने ली है, हालांकि पुलिस को इस दावे और हमले के बीच पूरी कड़ी स्थापित करना अभी बाकी है. इससे पहले सलमान खान के घर के बाहर फायरिंग और फिल्म निर्माता रोहित शेट्टी के आवास को निशाना बनाए जाने जैसी घटनाएं भी चर्चा में रही हैं. इसीलिए सवाल यह नहीं कि 90 के दशक का अपराध जगत हूबहू वापस आ गया है. सवाल यह है कि क्या बड़े और चर्चित चेहरों को निशाना बनाकर अपना खौफ और ताकत दिखाने की पुरानी रणनीति नए गिरोहों के दौर में फिर दिखाई दे रही है?

वैसे 90 के दशक और आज के अपराध जगत को एक जैसा मानना सही नहीं होगा. हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की आर्थिक संरचना बदल चुकी है और मुंबई का पुराना अपराध जगत भी काफी कमजोर हो चुका है. फिर भी टाइगर श्रॉफ जैसे बड़े फिल्मी चेहरे को निशाना बनाए जाने की घटना उस दौर की याद जरूर दिलाती है जब फिल्म इंडस्ट्री और अपराध की दुनिया के बीच रिश्ता कई परतों में फैला था.

कभी फिल्मवाले शिकार बने, कभी फिल्मों में अपराध के पैसे लगने के आरोप लगे, कभी सितारे गैंगस्टरों की महफिलों में पहुंचे. हिंदी सिनेमा और अपराध जगत के रिश्ते का सबसे चर्चित और संवेदनशील पहलू कथित प्रेम संबंध रहे हैं. संगठित अपराध से जुड़े मामलों की जांच कर चुके कुछ पूर्व पुलिस अधिकारियों के हवाले से दाऊद इब्राहिम और मंदाकिनी के कथित संबंधों की चर्चा होती रही. अबू सलेम और मोनिका बेदी का नाम भी इसी संदर्भ में लंबे समय तक सुर्खियों में रहा. इनमें अलग-अलग मामलों की परिस्थितियां और उपलब्ध सबूत अलग हैं.  
ये भी पढ़ें: दाऊद इब्राहिम को 'डॉन', लॉरेंस बिश्नोई को 'गैंगस्टर' क्यों कहते हैं ? टाइगर श्रॉफ पर हमले के बीच समझिए फर्क

तब मुंबई में चलता था खौफ

80 और 90 के दशक के अपराध जगत की ताकत सिर्फ हथियारों में नहीं थी. गिरोहों के विदेशों में ठिकाने, स्थानीय शूटर, अवैध कारोबार से आने वाला पैसा और फिल्म इंडस्ट्री तक कथित पहुंच उसके प्रभाव को बढ़ाते थे. हालत ऐसी थी कि अगर किसी निर्माता के एक गिरोह को पैसे देने की जानकारी दूसरे गिरोह तक पहुंच जाए तो वहां से भी वसूली की मांग आ सकती थी. यानी फिल्म निर्माता कई स्तरों पर दबाव में थे. अपराध जगत कभी शिकारी बनकर सामने आता था और कभी कारोबारी साझेदार होने के आरोप लगते थे. समय के साथ मुंबई के अपराध जगत की तस्वीर बदल गई. छोटा राजन, अबू सलेम और अरुण गवली जैसे पुराने बड़े नाम जेल पहुंचे. दाऊद इब्राहिम के गिरोह का भी मुंबई में पहले जैसा सीधा प्रभाव नहीं रहा. दूसरी तरफ हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में कॉरपोरेट निवेश बढ़ा और फिल्मों की फाइनेंसिंग का तरीका बदला. इससे वह खाली जगह भी कम हुई जिसका फायदा अपराध जगत द्वारा उठाए जाने के आरोप लगते रहे थे.

अब फिर सितारे निशाने पर?

अब बात मौजूदा दौर की... टाइगर श्रॉफ पर हुई फायरिंग ने अब पुराने सवाल फिर खड़े कर दिए हैं. हमले की जिम्मेदारी लॉरेंस बिश्नोई गिरोह से जुड़े होने का दावा करने वाले लोगों ने ली है, हालांकि पुलिस को इस दावे और हमले के बीच पूरी कड़ी स्थापित करना अभी बाकी है. इससे पहले सलमान खान के घर के बाहर फायरिंग और फिल्म निर्माता रोहित शेट्टी के आवास को निशाना बनाए जाने जैसी घटनाएं भी चर्चा में रही हैं. इसीलिए सवाल यह नहीं कि 90 के दशक का अपराध जगत हूबहू वापस आ गया है. सवाल यह है कि क्या बड़े और चर्चित चेहरों को निशाना बनाकर अपना खौफ और ताकत दिखाने की पुरानी रणनीति नए गिरोहों के दौर में फिर दिखाई दे रही है? 90 के दशक और आज के अपराध जगत को एक जैसा मानना सही नहीं होगा. हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की आर्थिक संरचना बदल चुकी है और मुंबई का पुराना अपराध जगत भी काफी कमजोर हो चुका है. फिर भी टाइगर श्रॉफ जैसे बड़े फिल्मी चेहरे को निशाना बनाए जाने की घटना उस दौर की याद जरूर दिलाती है जब फिल्म इंडस्ट्री और अपराध की दुनिया के बीच रिश्ता कई परतों में फैला था.
ये भी पढ़ें: टाइगर श्रॉफ पर हमला... 20 साल बाद फिर बॉलीवुड में लौट रहा अंडरवर्ल्ड का खौफ ? चेहरे बदले, तरीका वही

पूरी स्टोरी पढ़ें

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
Bollywood News, Mumbai News, Tiger Shroff Firing, Dawood Ibrahim
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com