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सिर्फ अवैध संबंध के आरोप से नहीं छिन सकता विधवा का दर्जा: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा- पति की मौत के बाद महिला पर अवैध संबंध का आरोप लगने से उसका विधवा का कानूनी दर्जा खत्म नहीं होता. जुबानी आरोपों से किसी को वैध संतान मानने से इनकार नहीं किया जा सकता.

सिर्फ अवैध संबंध के आरोप से नहीं छिन सकता विधवा का दर्जा: इलाहाबाद हाईकोर्ट
विधवा स्टेटस से जुड़े मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा फैसला. (File Photo)
प्रयागराज:

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पारिवारिक संपत्ति और उत्तराधिकार से जुड़े एक मामले में अहम फैसला सुनाया है. किसी महिला के विधवा होने की कानूनी स्थिति विवाह और पति की मौत से उत्पन्न होती है. कोर्ट ने कहा कि पति के निधन के बाद अगर किसी महिला पर किसी अन्य शख्स के साथ अवैध संबंध रखने का आरोप भी लगाया जाता है, तो मात्र इस आधार पर उसका विधवा का कानूनी दर्जा और उससे जुड़े विधिक अधिकार खत्म नहीं किए जा सकते. इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि सिर्फ जुबानी आरोपों या दावों के आधार पर किसी शख्स से उसकी वैध संतान और कानूनी उत्तराधिकारी होने का अधिकार नहीं छीना जा सकता. संतान की वैधता को चुनौती देने के लिए भारतीय साक्ष्य कानून के निर्धारित मानकों के तहत पुख्ता, स्वतंत्र और विश्वसनीय प्रमाण पेश करना जरूरी है. जस्टिस अनिल कुमार की सिंगल बेंच ने यह टिप्पणी बलिया जिले से संबंधित साल 2001 से लंबित दीवानी विवाद की प्रथम अपील को स्वीकार करते हुए की.

कोर्ट ने बलिया के द्वितीय अपर जिला जज द्वारा वर्ष 2000 में पारित उस फैसले और डिक्री को पूरी तरह खारिज कर दिया, जिसमें महिला को उसके दिवंगत पति की विधवा मानने से इनकार कर दिया गया था. हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए वादी द्वारा दायर मूल वाद को सिरे से खारिज कर दिया.

क्या है पूरा मामला?

यह पूरा विवाद बलिया जिले के एक परिवार से जुड़ा हुआ है. जानकारी के मुताबिक, स्वर्गीय श्रीपति पांडे के तीन पुत्र राम अवध पांडे, विंध्याचल पांडे और जगत नारायण पांडे थे. विंध्याचल पांडे की शादी राजेश्वरी देवी से हुई और साल 1938 में विंध्याचल पांडे की बिना किसी संतान के मौत हो गई. इसके बाद स्वर्गीय राम अवध पांडे के पुत्र हरिशंकर पांडे ने वर्ष 1988 में एक मूल दीवानी वाद दायर किया. वादी हरिशंकर पांडे ने कोर्ट से यह घोषणा करने की मांग की थी कि राजेश्वरी देवी स्वर्गीय विंध्याचल पांडे की विधवा नहीं हैं.

इसके साथ ही, यह भी दावा किया गया कि प्रतिवादी संख्या दो और तीन यानी शिव सागर और शिव कुमार, स्वर्गीय राम अवध पांडे के वैध पुत्र और कानूनी वारिस नहीं है बल्कि वो राजेश्वरी देवी और राम अवध पांडे के पुत्र है. वादी का तर्क था कि एक ब्राह्मण विधवा होने के नाते राजेश्वरी देवी को पुनर्विवाह करने की अनुमति नहीं थी और बाद में कथित संबंध में रहने के कारण उन्होंने अपने पहले पति की विधवा होने की वैधानिक हैसियत व अधिकार खो दिए है.

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बलिया के द्वितीय अपर जिला जज ने वर्ष 2000 में दिए गए अपने फैसले में वादी के तर्कों को स्वीकार करते हुए वाद को डिक्री कर दिया था. ट्रायल कोर्ट का यह फैसला साल 1963 में सीआरपीसी की धारा 488 के तहत पारित भरण-पोषण के एक पुराने आदेश और उसमें दर्ज टिप्पणियों पर आधारित था, जिसमें कथित तौर पर अवैध संबंधों का जिक्र किया गया था.

ट्रायल कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ राजेश्वरी देवी और अन्य की तरफ से हाईकोर्ट में 2001 में प्रथम अपील दायर की गई थी. अपीलीय कोर्ट में पूरे साक्ष्यों और कानूनी पहलुओं का विश्लेषण करते हुए हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के नतीजों को पूरी तरह गलत और कानून के उलट पाया. हाईकोर्ट ने कहा कि कानूनी हैसियत या विधिक दर्जा किसी शख्स की व्यक्तिगत क्षमता से जुड़ा होता है, जिसे कानून मान्यता देता है.

'मनगढंत आरोप नहीं सबूत जरूरी...'

कोर्ट ने कहा कि खुद वादी ने अपने वादपत्र में यह स्वीकार किया है कि राजेश्वरी देवी का विवाह विंध्याचल पांडे से हुआ था और वर्ष 1938 में विंध्याचल पांडे का देहांत हो गया था. कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि एक बार जब विवाह और पति की मौत के तथ्य स्वीकार कर लिए जाते है तो विधवा होने का कानूनी परिणाम खुद ही स्थापित हो जाता है. ऐसे तथ्यों के बाद वादी सिर्फ किसी बाद के कथित संबंध का हवाला देकर उस कानूनी नतीजे के विपरीत कोई आदेश पाने का हकदार नहीं हो सकता. 

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कोर्ट ने कहा कि विधवा का दर्जा विवाह और पति के निधन से मिलने वाला एक विधिक अधिकार है. इसे सिर्फ इसलिए खत्म नहीं माना जा सकता क्योंकि कोई शख्स या समाज अपनी व्यक्तिगत मान्यताओं, आचरण या सुविधा के मुताबिक उस दर्जे को मान्यता नहीं देना चाहता. किसी कानूनी स्थिति को सिर्फ कानून द्वारा मान्यता प्राप्त कारणों और सबूतों के आधार पर ही खत्म किया जा सकता है, न कि मनगढ़ंत आरोपों से. 

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 50 और धारा 112 का जिक्र करते हुए कोर्ट ने कहा कि वादी ने इस मामले में कोई ठोस या प्रत्यक्ष सबूत प्रस्तुत नहीं किया. गवाहों के बयानों में ऐसा कोई विशेष व्यक्तिगत ज्ञान नहीं था जो साल 1960 के कथित संबंधों को विश्वसनीय तरीके से साबित कर सके. सिर्फ मौखिक बयानों को दोहराना कानून द्वारा अपेक्षित उच्च स्तर के सबूत का स्थान नहीं ले सकता.

हाईकोर्ट ने सीआरपीसी की धारा 488 के पुराने आदेश पर ट्रायल कोर्ट  की निर्भरता को भी गंभीर कानूनी गलती करार दिया. कोर्ट ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता के तहत भरण-पोषण की कार्यवाही संक्षिप्त और त्वरित राहत के लिए होती है, जिसका मकसद सिर्फ भरण-पोषण तय करना होता है न कि संपत्ति के स्वामित्व, उत्तराधिकार या किसी पक्ष के स्थायी सिविल दर्जे का निर्धारण करना.

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