
मुंबई:
यह कहानी एक ऐसे शख्स की है, जो काम तो करता है, लेकिन तनख्वाह नहीं लेता। बैंक चलाता है पर ब्याज नहीं देता। बावजूद इसके ग्राहक उसे दुआ देते हैं। इस शख्स से मिलना है तो आपको मुंबई के दादर स्टेशन आना होगा जहां मौजूद है रफीक शेख का मोबाइल बैंक।
देश में कई रेलवे स्टेशनों पर आपको थकी-बूढ़ी आंखें दिखेंगी, जिनमें शायद अब कोई सपना नहीं पलता, ज़िंदगी के आखिरी पड़ाव में भीख मांगकर गुजर करना मजबूरी है। रेलवे स्टेशन की सीढ़ियां आशियाना हैं और भीख मांगने वाले इस सूनेपन के साथी। सर्दी-गर्मी-धूप-छांव-बरसात-दिन-रात, इनके लिए कोई मायने नहीं रखता दो पैसे कमाएंगे, तभी निवाला मिलेगा। हाथ लाचार हैं, शरीर कमज़ोर भीख से मिले पैसों पर कभी चोर हाथ साफ कर लेते तो कभी कोई छीन लेता था। दादर स्टेशन में चाय का स्टॉल चलाने वाले रफीक ने दुआ के बदले इनका दर्द बांटना शुरू किया। रफीक ने अपने ठेले को ही बैंक बना लिया, उनका ठेला भीख मांगकर गुजर करने वाले 15-20 भिखारियों का मुख्यालय है, रफीक यहां मैनेजर भी हैं, कैशियर भी. चपरासी भी। चाय बेचने के बाद कुछ वक्त ग्राहकों के लिए निकालते हैं, डायरी में बकायदा कलेक्शन की एंट्री करते हैं 25 दिनों या ज़रूरत पड़ने पर पूरे वापस कर देते हैं। कोई ब्याज नहीं देते और ना ही कोई मेहनताना लेते हैं।

रफीक खुद ही सालों पहले घर से भागकर मुंबई आए थे उनका कहना है इस काम से उन्हें खुशी मिलती है" बुजुर्ग हैं 1-2 रु कमाते हैं मुझे ऐसा लगता है मेरी दादी जैसे हैं। मैं उनकी सेवा करता हूं मुझे अच्छा लगता है मुझे बहुत दुआ देते हैं।"
रफीक चार साल से बैंक चला रहे हैं, बुजुर्गों को भी यहां अपनी कमाई के महफूज रहने का भरोसा है। रफीक़ का कहना है " मेरे पास 4-5 साल से ये लोग आ रहे हैं, पहले कहीं जाते थे तो कोई पैसे छीन लेता था, चुरा लेता था अब जब भी ज़रूरत होती है तो मेरे पास से लेकर जाते हैं।"
बॉम्बे प्रिवेंशन ऑफ बेगिंक एक्ट के मुताबिक, सार्वजनिक जगहों पर नाचने-गाने के बाद भी पैसे मांगने अपराध के दायरे में आता है, भीख मांगने पर सज़ा का भी प्रावधान है, एक्ट के मुताबिक भिखारी को बिना वारंट के गिरफ्तार किया जा सकता है और बिना किसी ट्रायल के जेल या आश्रय घरों में भेजा जा सकता है। बावजूद इसके देश में लगभग 4 लाख भिखारी हैं और उनकी संख्या में इज़ाफा हो ही रहा है। भिखारी वोट बैंक नहीं है इसलिए उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने की जरूरत हुक्मरान महसूस नहीं करते शायद बगैर ब्याज और बगैर तनख्वाह जैसे बैंक चलाने की कोशिश इस हालात को थोड़ा बदलें।
देश में कई रेलवे स्टेशनों पर आपको थकी-बूढ़ी आंखें दिखेंगी, जिनमें शायद अब कोई सपना नहीं पलता, ज़िंदगी के आखिरी पड़ाव में भीख मांगकर गुजर करना मजबूरी है। रेलवे स्टेशन की सीढ़ियां आशियाना हैं और भीख मांगने वाले इस सूनेपन के साथी। सर्दी-गर्मी-धूप-छांव-बरसात-दिन-रात, इनके लिए कोई मायने नहीं रखता दो पैसे कमाएंगे, तभी निवाला मिलेगा। हाथ लाचार हैं, शरीर कमज़ोर भीख से मिले पैसों पर कभी चोर हाथ साफ कर लेते तो कभी कोई छीन लेता था। दादर स्टेशन में चाय का स्टॉल चलाने वाले रफीक ने दुआ के बदले इनका दर्द बांटना शुरू किया। रफीक ने अपने ठेले को ही बैंक बना लिया, उनका ठेला भीख मांगकर गुजर करने वाले 15-20 भिखारियों का मुख्यालय है, रफीक यहां मैनेजर भी हैं, कैशियर भी. चपरासी भी। चाय बेचने के बाद कुछ वक्त ग्राहकों के लिए निकालते हैं, डायरी में बकायदा कलेक्शन की एंट्री करते हैं 25 दिनों या ज़रूरत पड़ने पर पूरे वापस कर देते हैं। कोई ब्याज नहीं देते और ना ही कोई मेहनताना लेते हैं।

रफीक खुद ही सालों पहले घर से भागकर मुंबई आए थे उनका कहना है इस काम से उन्हें खुशी मिलती है" बुजुर्ग हैं 1-2 रु कमाते हैं मुझे ऐसा लगता है मेरी दादी जैसे हैं। मैं उनकी सेवा करता हूं मुझे अच्छा लगता है मुझे बहुत दुआ देते हैं।"
रफीक चार साल से बैंक चला रहे हैं, बुजुर्गों को भी यहां अपनी कमाई के महफूज रहने का भरोसा है। रफीक़ का कहना है " मेरे पास 4-5 साल से ये लोग आ रहे हैं, पहले कहीं जाते थे तो कोई पैसे छीन लेता था, चुरा लेता था अब जब भी ज़रूरत होती है तो मेरे पास से लेकर जाते हैं।"
बॉम्बे प्रिवेंशन ऑफ बेगिंक एक्ट के मुताबिक, सार्वजनिक जगहों पर नाचने-गाने के बाद भी पैसे मांगने अपराध के दायरे में आता है, भीख मांगने पर सज़ा का भी प्रावधान है, एक्ट के मुताबिक भिखारी को बिना वारंट के गिरफ्तार किया जा सकता है और बिना किसी ट्रायल के जेल या आश्रय घरों में भेजा जा सकता है। बावजूद इसके देश में लगभग 4 लाख भिखारी हैं और उनकी संख्या में इज़ाफा हो ही रहा है। भिखारी वोट बैंक नहीं है इसलिए उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने की जरूरत हुक्मरान महसूस नहीं करते शायद बगैर ब्याज और बगैर तनख्वाह जैसे बैंक चलाने की कोशिश इस हालात को थोड़ा बदलें।
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