पेशेंट ट्रांसपोर्ट एंबुलेंस यानी पीटीए के तौर पर राजधानी में दौड़ने वाली प्राइवेट एंबुलेंस नियमों को ताख पर रखकर चल रही हैं। न ऑक्सीजन सिलेंडर, न फर्स्ट एड बॉक्स। महज एक गाड़ी, जिसके ऊपर बत्ती लगी होती है और आगे पीछे एंबुलेंस लिखा होता है। नियम कायदों के मुताबिक, एक गाड़ी एंबुलेंस तब बनती है, जब उसमें एक स्ट्रेचर, फर्स्ट एड बॉक्स और ऑक्सीजन सिलेंडर हो।
ये राजधानी में किसी सरकारी अस्पताल के बाहर खड़ी एंबुलेंस शायद नियमों की अनदेखी न कर रही हों। हमने हकीकत का जायजा पांच अस्पतालों के बाहर जाकर लिया। उसमें एम्स, सफदरजंग, एलएनजेपी, आरएमएल और जीटीबी हॉस्पिटल शामिल हैं। कुछ एंबुलेंस के ड्राइवरों ने तो गलती मान ली, तो कुछ हमें ही नियम में उलझाने लग गए। अधिकतर के जवाब थे कि छोटी गाड़ियों में फर्स्ट एड बॉक्स होता ही नहीं है..ये नियम बड़ी गाड़ियों के लिए है, जबकि बॉक्स का न होना नियम का उल्लंघन है। कई एंबुलेंस में तो ऑक्सीजन सिलेंडर न दिखने पर जवाब मिला, मरीज को जरूरत होगी तो दुकान में है। हम ले आएंगे। हर जगह गड़बड़झाला।
एंबुलेंस तीन तरह की होती है। एएलएस यानी एडवांस्ड लाइफ सपोर्ट, बीएलएस यानी बेसिक लाइफ सपोर्ट और तीसरा प्रकार है पीटीए यानी पेशेंट ट्रांसपोर्ट एंबुलेंस। और यही पीटीए धड़ल्ले से नियमों की धज्जियां उड़ाने में लगी हैं। कुछ का जवाब तो और भी दिलचस्प था..."मरने के लिए न ऑक्सीजन सिलेंडर की जरूरत होती है और न फर्स्ट एड बॉक्स की। हम सिर्फ शव ढोने का काम करते हैं, लेकिन नियम कहता है कि एंबुलेंस मरीजों के लिए होती है और शव ढोने के लिए "HEARSE VAN"
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