
नरेंद्र मोदी के साथ नीतीश कुमार की फाइल फोटो
नई दिल्ली:
अगस्त महीने में बिहार की राजनीति में कई महत्वपूर्ण फैसले लिए जाएंगे। ये एक ऐसा महीना है जो राज्य की राजनीति आखिर किस करवट लेगी वो तय करेगा। सबसे ज्यादा सस्पेंस नीतीश कुमार, लालू यादव और कांग्रेस पार्टी के बीच सीटों के तालमेल को लेकर है।
अब जब ये तय मन जा रहा है कि ये तीनों दल एक साथ चुनावी मैदान में जाएंगे तब तीनों दलों की संयुक्त चुनावी सभा या कार्यकर्ता सम्मलेन बस इस बात पर अटका है कि सीटों के तालमेल पर बातचीत कब शुरू होती है और कब खत्म होगी। सबसे बड़ा पेंच इस बात को लेकर है कि आखिर तीनों दल कितनी सीटों पर चुनाव लड़ेंगे और इसका फॉर्मूला या आधार क्या होगा।
राष्ट्रीय जनता दल पूरा प्रयास करेगी कि सीटों के बंटवारे पर पिछले लोकसभा चुनावों के परिणाम, खसकर विधानसभा के नतीजों को नजरअंदाज नहीं किया जाये। और यहां पर उनका तर्क होगा कि अगर राष्ट्रीय जनता दल को सम्मानजनक सीटें नहीं मिलेंगी तब यादव वोटरों में असंतोष हो सकता है।
वहीं जनता दल यूनाइटेड 2010 के चुनाव परिणाम के आधार पर सीटों के तालमेल का तर्क देगी क्योंकि तब वो न केवल 100 से अधिक सीटों पर चुनाव लड़ेगी बल्कि अपने वोटरों में सन्देश देगी कि आखिर गठबंधन में नीतीश कुमार की तूती अभी भी बोल रही है।
कांग्रेस पार्टी का प्रयास होगा कि उसे अधिक से अधिक सीटें मिलें और मनमाफिक सीटों की संख्या हो या नहीं लेकिन जो सीटें मिलें उससे जीतने में उसे बहुत ज्यादा मुश्किलों का सामना ना करना पड़े। लेकिन ये सब इस बात पर निर्भर करता है कि लालू यादव और नीतीश कुमार सीटों के तालमेल को कितनी प्राथमिकता देते हैं।
वहीं उनके विरोधी जो इस बात का कयास लगाये बैठे थे कि लालू यादव ने भले नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री मान लिया हो, लेकिन सीटों के तालमेल पर शायद ये गठबंधन टूट जाये, अब महागठबंधन के सीटों पर बातचीत के नतीजों का इंतजार कर रही है। लेकिन बीजेपी का प्रयास होगा कि वो न केवल कम से कम 160 सीटों पर चुनाव लड़े बल्कि अपने सभी सहयोगियों को साथ लेकर चले। हालांकि इस महीने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तीन रैलियां भी बिहार में होनी हैं, इसलिए इन रैलियों की आड़ में फ़िलहाल वो सीटों पर बातचीत के मसले को टालने की कोशिश करेगी।
लेकिन बीजेपी के रणनीतिकार इस बात से संतुष्ट हैं कि उनके गठबंधन में हर सहयोगी अपना वोट ट्रांसफर करा पाने की क्षमता रखते हैं और लालू यादव की तरह उन्हें अपने आधारभूत वोट को बागी उम्मीदवारों के मैदान में रहने पर कोई चिंता नहीं करनी। बीजेपी सबसे ज्यादा इस बात को लेकर आश्वस्त है कि पिछली बार जनता दल यूनाइटेड द्वारा जीती गई अधिकांश सीटों पर आरजेडी उम्मीदवार दूसरे स्थान पर थे और इस बार वो सीटें अगर जनता दल यूनाइटेड को चली भी जाती हैं तब हारे उम्मीदवार घर बैठने के बदले बागी उम्मीदवार के रूप में चुनावी मैदान में होंगे।
लेकिन सब जानते हैं कि इस बार सत्ता की चाभी बिहार के तीन मतदाताओं - महिला, अति पिछड़ा और नए वोटरों के हाथ में होगी और जिस गठबंधन के तरफ इन तीन वोटरों का रुझान ज्यादा होगा, जीत उसी की होगी।
अब जब ये तय मन जा रहा है कि ये तीनों दल एक साथ चुनावी मैदान में जाएंगे तब तीनों दलों की संयुक्त चुनावी सभा या कार्यकर्ता सम्मलेन बस इस बात पर अटका है कि सीटों के तालमेल पर बातचीत कब शुरू होती है और कब खत्म होगी। सबसे बड़ा पेंच इस बात को लेकर है कि आखिर तीनों दल कितनी सीटों पर चुनाव लड़ेंगे और इसका फॉर्मूला या आधार क्या होगा।
राष्ट्रीय जनता दल पूरा प्रयास करेगी कि सीटों के बंटवारे पर पिछले लोकसभा चुनावों के परिणाम, खसकर विधानसभा के नतीजों को नजरअंदाज नहीं किया जाये। और यहां पर उनका तर्क होगा कि अगर राष्ट्रीय जनता दल को सम्मानजनक सीटें नहीं मिलेंगी तब यादव वोटरों में असंतोष हो सकता है।
वहीं जनता दल यूनाइटेड 2010 के चुनाव परिणाम के आधार पर सीटों के तालमेल का तर्क देगी क्योंकि तब वो न केवल 100 से अधिक सीटों पर चुनाव लड़ेगी बल्कि अपने वोटरों में सन्देश देगी कि आखिर गठबंधन में नीतीश कुमार की तूती अभी भी बोल रही है।
कांग्रेस पार्टी का प्रयास होगा कि उसे अधिक से अधिक सीटें मिलें और मनमाफिक सीटों की संख्या हो या नहीं लेकिन जो सीटें मिलें उससे जीतने में उसे बहुत ज्यादा मुश्किलों का सामना ना करना पड़े। लेकिन ये सब इस बात पर निर्भर करता है कि लालू यादव और नीतीश कुमार सीटों के तालमेल को कितनी प्राथमिकता देते हैं।
वहीं उनके विरोधी जो इस बात का कयास लगाये बैठे थे कि लालू यादव ने भले नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री मान लिया हो, लेकिन सीटों के तालमेल पर शायद ये गठबंधन टूट जाये, अब महागठबंधन के सीटों पर बातचीत के नतीजों का इंतजार कर रही है। लेकिन बीजेपी का प्रयास होगा कि वो न केवल कम से कम 160 सीटों पर चुनाव लड़े बल्कि अपने सभी सहयोगियों को साथ लेकर चले। हालांकि इस महीने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तीन रैलियां भी बिहार में होनी हैं, इसलिए इन रैलियों की आड़ में फ़िलहाल वो सीटों पर बातचीत के मसले को टालने की कोशिश करेगी।
लेकिन बीजेपी के रणनीतिकार इस बात से संतुष्ट हैं कि उनके गठबंधन में हर सहयोगी अपना वोट ट्रांसफर करा पाने की क्षमता रखते हैं और लालू यादव की तरह उन्हें अपने आधारभूत वोट को बागी उम्मीदवारों के मैदान में रहने पर कोई चिंता नहीं करनी। बीजेपी सबसे ज्यादा इस बात को लेकर आश्वस्त है कि पिछली बार जनता दल यूनाइटेड द्वारा जीती गई अधिकांश सीटों पर आरजेडी उम्मीदवार दूसरे स्थान पर थे और इस बार वो सीटें अगर जनता दल यूनाइटेड को चली भी जाती हैं तब हारे उम्मीदवार घर बैठने के बदले बागी उम्मीदवार के रूप में चुनावी मैदान में होंगे।
लेकिन सब जानते हैं कि इस बार सत्ता की चाभी बिहार के तीन मतदाताओं - महिला, अति पिछड़ा और नए वोटरों के हाथ में होगी और जिस गठबंधन के तरफ इन तीन वोटरों का रुझान ज्यादा होगा, जीत उसी की होगी।
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं
बिहार चुनाव 2015, नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव, नरेंद्र मोदी, बिहार विधानसभा चुनाव 2015, जेडीयू, आरजेडी, बीजेपी, Bihar Assembly Election 2015, Nitish Kumar, Lalu Prasad, Narendra Modi, JDU, RJD