आज से पहले शायद आपने किसी ट्रेन का नाम बदलते नहीं सुना होगा। खासकर जब वह लंबे समय से पटरी पर दौड़ रही हो और ट्रेन रेलमंत्री की अहम घोषणा का हिस्सा हो, लेकिन अदालत के आदेश के बाद अमृतसर−लालकुंआ एक्सप्रेस का नाम अब गरीब रथ एक्सप्रेस हो गया है।
इस ट्रेन का नाम बदलने की कहानी बहुत दिलचस्प है। दरअसल इस ट्रेन की घोषणा 2013−14 के रेल बजट में पवन कुमार बंसल ने की थी। आम आदमी की पहुंच से दूर फुली एसी कोच। इसमें न स्लीपर बोगी और न ही जनरल बोगी।
आनन फानन में दो अक्टूबर 2013 को इस ट्रेन को हरी झंडी दिखाई गई। कुल 18 डब्बों वाली यह ट्रेन 676 किलोमीटर के अपने सफर में 16 स्टेशनों पर रुकती है। इसमें थ्री टियर एसी के 13 कोच और 3 कोच चेयरकार के थे। बाकी बचे दो जेनरेटर कोच जिससे बोगियों में पावर की सप्लाई होती।
रेलवे की यह एसी एक्सप्रेस पटरी पर गरीब रथ की बोगियों के साथ दौड़ने लगी। इस ट्रेन में सहरसा गरीब रथ की बोगियों को लगाया गया और किराया एसी का वसूला जाने लगा। जबकि खुद रेलवे के नियम के मुताबिक अगर बोगी गरीब रथ की है तो किराया गरीब रथ का ही लगेगा। यहां रेलवे पब्लिक को चूना लगाती रही। लेकिन उत्तराखंड के केशव पासी को कहानी समझ में आ गई और उन्होंने नैनिताल हाईकोर्ट में केस दायर कर दिया।
इस मामले में अदालत ने 10 जून को फैसला सुनाया कि अमृतसर−लालकुंआ एक्सप्रेस का नाम तुरंत बदलकर गरीब रथ एक्सप्रेस किया जाए और नतीजा 11 जून को रेलवे की वेबसाइट ने इस ट्रेन का नाम बदल दिया।
हालांकि कोर्ट के इस आदेश के बाद अब भी कई सवाल बाकी हैं। नया किराया तो गरीब रथ का ही होगा, लेकिन अब तक जिन यात्रियों से रेलवे ने ज्यादा पैसे वसूले उनका हिसाब कैसे होगा। क्या रेलवे उनको पैसे लौटाएगी? अगर नहीं तो फिर उन पैसों का क्या होगा और अगर हां तो फिर उन यात्रियों की तलाश कैसे होगी।
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