
नालंदा विश्वविद्यालय के चांसलर पद को लेकर अमर्त्य सेन की चिट्ठी सार्वजनिक होने के बाद विवाद गहरा गया है। उन्होंने नालंदा विश्वविद्यालय की गर्वनिंग बोर्ड को चिट्ठी लिखकर कहा है, "सरकार नहीं चाहती कि मैं इस पद पर आगे भी बना रहूं, इसलिए मैं यहां नहीं रुक सकता...ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज भी देश के शिक्षण संस्थान सरकार के इशारों पर काम करते हैं"।
दरअसल 13 जनवरी को ही नालंदा यूनिवर्सिटी की गवर्निंग बोर्ड ने सर्वसम्मति से अमर्त्य सेन को चांसलर चुना था। लेकिन पिछले एक महीने में सरकार की तरफ से कोई पहल नहीं हुई जिससे वो नाराज़ हैं। एनडीटीवी से एक्सक्लूसिव बातचीत में अमर्त्य सेन ने कहा कि इस मामले में उनके लिए सबसे अहम सवाल शिक्षा के क्षेत्र में राजनीतिक हस्तक्षेप का है।
अमर्त्य सेन को नालंदा यूनिवर्सिटी का चांसलर बनाया जाए कि नहीं इस अहम सवाल पर राजनीति शुरू हो गई है। जेडी-यू ने तय किया है कि वो इस मामले को राष्ट्रपति के पास ले जाएंगे। पार्टी के वरिष्ठ महासचिव केसी त्यागी ने एनडीटीवी से कहा, "हम इस मामले को राष्ट्रपति के पास ले जाएंगे...और उनसे इस मामले में हस्तक्षेप करने को कहेंगे"।
उधर, कांग्रेस ने भी इस विवाद पर सवाल उठाते हुए कहा है कि अमर्त्य सेन के साथ जो हो रहा है वो दुर्भाग्यपूर्ण है। पार्टी के प्रवक्ता अजय कुमार ने कहा, "अमर्त्य सेन के साथ ऐसा नहीं होना चाहिए। वो राष्ट्रीय धरोहर हैं"।
दरअसल 2014 के चुनाव अभियान के दौरान अमर्त्य सेन, नरेन्द्र मोदी की दावेदारी के आलोचक रहे थे... और अब ताज़ा विवाद से एक बार फिर संबंधों में तल्खी दिखाई दे रही है।
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