प्लेग का नाम सुनते ही जहन में कोई आम बीमारी नहीं, सीधा सन्नाटा कौंधता है. सदियों बाद भी इस शब्द में जो खौफ है, वो बेवजह नहीं है. इतिहास के पन्नों में यह सिर्फ एक महामारी नहीं, बल्कि वो गहरा और डरावना दौर है जिसने पूरी दुनिया की सूरत बदल दी थी. जिसने इतना खौफ पैदा किया था कि इंसान को अपना वजूद बचाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ा था.
बात 1347 की है. युरोप में समंदर के रास्ते सिसिली के बंदरगाह पर कुछ जहाज आ रुके थे. किनारे खड़े लोग हैरान थे. जहाज में मौजूद अधिकतर नाविक मर चुके थे और जो चंद जिंदा दिख भी रहे थे उनके जिस्म पर काले, रिसते हुए फफोले थे. मानो शरीर के ज्वालामुखी हो और काली मवाद फटकर बाहर आ रही हो.
किसी को अंदाज़ा नहीं था कि जहाजों के साथ सिर्फ सामान नहीं, बल्कि मौत का वो तूफान उतर चुका था, जिसे बाद में दुनिया ने नाम दिया- 'द ब्लैक डेथ'.
'ब्लैक डेथ' एक ऐसी महामारी थी जिसने 1347 और 1353 के बीच यूरोप में भारी तबाही मचाई. बताया जाता है कि जितनी तबाइी इस बीमारी से उस समय हुई उतनी तब तक किसी दूसरी महामारी या युद्ध से भी नहीं हुई थी. एक अनुमान के अनुसार इसमें 2.5 करोड़ लोगों की मौत हुई थी.

'ब्लैक डेथ' के समय की मध्ययुगीन सड़क के दृश्य, जिसमें एक मुनादी करने वाला लोगों से "अपने मरे हुओं को बाहर लाने" के लिए कहता है. इसके बाद मृतकों को सामूहिक कब्रों में दफनाने के लिए ले जाया जाता था. तस्वीर @britannica.com से साभार
महज छह साल (1347–1353) के भीतर यूरोप, एशिया और उत्तरी अफ्रीका में जो मंजर दिखा, उसने इंसानियत की रूह कंपा दी. गलियां लाशों से पटी थीं, दफनाने वाले कम पड़ गए थे. मां अपने बीमार बच्चे को छूने से डरती थी और अपने ही अपनों को तड़पता छोड़ घरों के दरवाजे बाहर से बंद कर भाग रहे थे.
कहते हैं कि उस दौर की एक तिहाई से ज़्यादा आबादी का नामोनिशान मिट गया.
यह सिर्फ चूहों और पिस्सुओं से फैलने वाला बैक्टीरिया नहीं था, यह वह दौर था जब इंसान ने पहली बार अपनी पूरी बेबसी को इतने नज़दीक से देखा था.
आज जब भी कोई नई बीमारी सिर उठाती है, तो प्लेग का इतिहास हमें अंदर तक इसलिए डरा देता है, क्योंकि यह याद दिलाता है कि एक अदना-सा रोगाणु भी इंसानी गुरूर को कितनी बेरहमी से घुटनों पर ला सकता है.
यह बीमारी यर्सिनिया पेस्टिस (Yersinia pestis) नाम के बैक्टीरिया से फैलती है, जो चूहों के बदन पर मौजूद पिस्सुओं (fleas) के जरिये इंसानों तक पहुंची.

ब्लैक डेथ: 14वीं सदी में ब्लैक डेथ (प्लेग) के शिकार लोग. तस्वीर @britannica.com से साभार.
इतिहास में प्लेग की तीन सबसे बड़ी महामारियों (Pandemics) ने दुनिया की आबादी को हिला कर रख दिया:
1. पहली लहर: जस्टिनियन का प्लेग (541–549 ईस्वी)
शुरुआत: बैजेंटाइन साम्राज्य (रोमन साम्राज्य का पूर्वी हिस्सा) और मिस्र के रास्ते फैली.
असर: राजधानी कॉन्स्टेंटिनोपल (आज का इस्तांबुल) में हालात इतने बिगड़ गए थे कि रोजाना हजारों लोग दम तोड़ रहे थे. सम्राट जस्टिनियन भी इससे संक्रमित हुआ, हालांकि वह बच गया.
नतीजा: इस लहर और इसके बाद के दौर में करीब 3 से 5 करोड़ लोग मारे गए. इस तबाही ने पूरे भूमध्यसागरीय व्यापार को ठप कर दिया और रोमन साम्राज्य के पतन की राह और तेज कर दी. Also Read: रूस में फैल रही है कोरोना जैसी बीमारी? लैब में हादसे से मौत तक का पूरा घटनाक्रम और 'प्लेग' के दावों की हकीकत
2. दूसरी लहर: द ब्लैक डेथ (1347–1353 ईस्वी)
यह मानव इतिहास की सबसे जानलेवा महामारी मानी जाती है, जिसने दुनिया का नक्शा बदल दिया.
शुरुआत और फैलाव: यह मध्य एशिया से सिल्क रूट और मंगोल सेनाओं की हलचलों के जरिये काला सागर तक पहुंची. 1347 में जेनोआ के व्यापारिक जहाजों से यह इटली के सिसिली बंदरगाह पहुंची और देखते ही देखते पूरे यूरोप, उत्तरी अफ्रीका और पश्चिम एशिया में फैल गई.
लक्षण: गर्दन, बगल और जांघों में दर्दनाक गिल्टियां (buboes) निकल आती थीं, जो पक कर काली पड़ जाती थीं. तेज बुखार, खून की उल्टियां और 3 से 5 दिन के भीतर मौत. शरीर के काले पड़ जाने के कारण ही इसे 'ब्लैक डेथ' कहा गया.
तबाही का दायरा:आबादी घटने से मजदूरों की भारी कमी हो गई. ब्लेक डेथ ने इस बार यूरोप की सामंतवादी व्यवस्था (Feudalism) की जड़ें हिला दी थीं.
अंधविश्वास का काला घेरा हुआ और भी बढ गया था. लोगों को लगा कि ये भगवान का कहर है. अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया गया था.
क्वारंटाइन की पैदाइश यहीं से हुई. वेनिस में आने वाले जहाजों को शहर में घुसने से पहले 40 दिनों तक समंदर में अलग रोका जाने लगा. इतालवी शब्द Quaranta Giorni जिसका मतलब है 40 दिन, से ही आज का शब्द Quarantine बना.

प्लेग की तीसरी लहर में चूहों और पिस्सुओं की भूमिका साबित हुई. तस्वीर @britannica.com से साभार.
3. तीसरी लहर: आधुनिक प्लेग (1855–1960 के दशक तक)
शुरुआत : चीन के युन्नान प्रांत से शुरू होकर यह हांगकांग और फिर समुद्री व्यापार मार्गों से पूरी दुनिया में फैली.
भारत पर कहर (1896) : यह प्लेग भारत के बॉम्बे (मुंबई) पहुंचा और पूरे देश में फैल गया. अकेले भारत में 1 करोड़ से ज्यादा लोगों की जान गई. भारत में प्लेग ने एंट्री की मुंबई के गेटवे ऑफ़ इंडिया से. बदलते मौसम के बीच अगस्त महीने में प्लेग की शुरुआत यहीं से हुई. यह ब्रिटिश भारत के सबसे अहम बंदरगाहों और व्यापारिक केंद्रों में से एक था. 1896 तक, यहां की आबादी 8 लाख से ज्यादा थी.
इसी दौर में वैज्ञानिकों ने इस रहस्य को सुलझाया. 1894 में अलेक्जेंड्रे यर्सिन ने उस बैक्टीरिया की पहचान की, जिसका नाम बाद में उन्हीं के नाम पर येर्सिनिया पेस्टिस (Yersinia pestis) रखा गया. इसके साथ ही चूहों और पिस्सुओं की भूमिका साबित हुई.
प्लेग डॉक्टर और वह डरावना मास्क
17वीं सदी में यूरोप के प्लेग डॉक्टरों की पोशाक इतिहास की सबसे खौफनाक छवियों में से एक बन गई. वे चमड़े का लंबा कोट, दस्ताने और एक पक्षियों जैसी लंबी चोंच वाला मास्क पहनते थे. उस चोंच में खुशबूदार जड़ी-बूटियां, कपूर और सूखे फूल भरे जाते थे. ऐसा इसलिए था क्योंकि यह माना जा रहा था कि ये बीमारी गंदी हवा से फैल रही है. हालांकि यह वैज्ञानिक रूप से गलत था. लेकिन इस गलतफहमी का फायदा यह हुआ कि डॉक्टरों के भारी कोट ने अनजाने में उन्हें पिस्सुओं के काटने से काफी हद तक बचा लिया.

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और फिर आई दवा
20वीं सदी के मध्य में एंटीबायोटिक्स (जैसे स्ट्रेप्टोमाइसिन) और बेहतर स्वच्छता व्यवस्था आने के बाद प्लेग पर काबू पाया गया. आज भी दुनिया के कुछ हिस्सों में इसके इक्का-दुक्का मामले सामने आते हैं, लेकिन समय पर दवा मिलने से यह पूरी तरह ठीक हो जाता है.
इलाज के बारे में पूरी जानकारी पाने के लिए हमने बात की BLK-Max अस्पताल, दिल्ली के प्रिंसिपल डायरेक्टर और पल्मोनोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. संदीप नायर ने विस्तार से. उन्होंने बताया कि डॉक्टर मरीज के खून, बलगम या सूजी हुई लिम्फ नोड्स से लिक्विड का सैंपल लेकर लैब में जांच करते हैं ताकि यर्सिनिया पेस्टिस बैक्टीरिया की पुष्टि हो सके.
प्लेग का इलाज एंटीबायोटिक दवाओं से पूरी तरह संभव है. यह दवाएं गोलियों के रूप में या नस के ज़रिए (IV ड्रिप) दी जाती हैं. हां, इस बात को ध्यान में रखना होगा कि इलाज काफी हद तक बीमारी के स्टेज पर निर्भर करता है.
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