दिवाली कई सांस्कृतिक कारणों से मनाई जाती है, लेकिन ऐतिहासिक रूप से इसे 'नरक चतुर्दशी' कहा जाता है, क्योंकि इसी दिन कृष्ण ने नरकासुर नामक एक अत्यंत क्रूर राजा का वध किया था. इसी कारण यह उत्सव इतने बड़े पैमाने पर मनाया जाने लगा. जरूरी नहीं कि बुराई हमेशा राक्षसों के रूप में आए. निराशा, अवसाद और कुंठा, किसी व्यक्ति के जीवन को उन राक्षसों से कहीं ज्यादा नुकसान पहुँचा सकती हैं जिन्हें आपने कभी देखा भी नहीं है. दिवाली हमें याद दिलाती है कि हमारे जीवन में मौजूद हर नकारात्मक चीज का अंत कर देना चाहिए.
यह उत्सव कई मायनों में बहुत शुभ है. कहा जाता है कि इस दिन, अगर किसी को धन की आवश्यकता है, तो लक्ष्मी आती हैं; अगर किसी को स्वास्थ्य चाहिए, तो शक्ति आती हैं; और अगर किसी को ज्ञान चाहिए, तो सरस्वती आती हैं. ये सब यह बताने के अलग-अलग तरीके हैं कि इससे जीवन में खुशहाली आती है.
भारतीय संस्कृति में एक समय ऐसा था जब साल के हर दिन कोई न कोई उत्सव होता था यानी साल में 365 उत्सव- क्योंकि उत्सव जीवन में उल्लास और उत्साह भरने का जरिया होते हैं. आज, लोग साल भर में बस आठ-दस उत्सव ही मनाते हैं, क्योंकि हमें रोज दफ्तर जाना होता है या कोई और काम करना पड़ता है. दुर्भाग्य से, आजकल उत्सव का मतलब बस इतना रह गया है कि उस दिन छुट्टी मिलती है, और लोग दोपहर 12 बजे सोकर उठते हैं. फिर वे खूब खाते-पीते हैं, फिल्म देखने जाते हैं या घर पर टीवी देखते हैं. पहले ऐसा नहीं था. उत्सव का मतलब था कि पूरा शहर एक जगह इकट्ठा होता था और एक बड़ा जश्न मनाया जाता था. उत्सव का मतलब होता था कि हम सुबह चार बजे उठते थे, और पूरे घर में बहुत सारी गतिविधियाँ बड़े उल्लास से होती थीं.
लोगों के बीच इस संस्कृति को वापस लाने के लिए, ईशा चार महत्वपूर्ण त्योहार मनाती है: पोंगल या मकर संक्रांति, महाशिवरात्रि, दशहरा और गुरु पूर्णिमा. अगर हम इस तरह की चीजें पैदा नहीं करते हैं, तो अगली पीढ़ी के आने तक, उन्हें पता नहीं होगा कि त्योहार क्या होता है. वे बस खाएंगे, सोएंगे और दूसरों की परवाह किए बिना बड़े हो जाएंगे. भारतीय संस्कृति में इन सभी चीजों को इसलिए शामिल किया गया था ताकि इंसान कई तरह से सक्रिय और उत्साही बना रहे. इसके पीछे विचार हमारे पूरे जीवन को उत्सव बना देना था.
अगर आप हर चीज को उत्सव की तरह देखते हैं, तो आप जीवन के प्रति 'गैर-गंभीर' होना सीखते हैं, लेकिन साथ ही पूरी तरह से उसमें शामिल भी रहते हैं. आज ज्यादातर लोगों के साथ समस्या यह है कि अगर उन्हें कोई चीज महत्वपूर्ण लगती है, तो वे उसे लेकर बहुत ज्यादा गंभीर हो जाते हैं और अगर उन्हें लगता है कि कोई चीज उतनी महत्वपूर्ण नहीं है, तो वे उसे लेकर लापरवाह हो जाते हैं - यानी वे उसमें जरूरी भागीदारी नहीं दिखा पाते. पता है, भारत में जब कोई कहता है कि "वह गंभीर है," तो इसका मतलब क्या होता है. बहुत से लोग आज गंभीर हालत में हैं. उनके जीवन में बस एक ही चीज मायने रखती है, बाकी सब उनके पास से गुजर जाता है क्योंकि जिन चीजों को वे 'गंभीर' नहीं मानते, उनमें वे अपना जुड़ाव और समर्पण नहीं दिखा पाते. यही पूरी समस्या है. जीवन का रहस्य यही है कि आप हर चीज को एक 'गैर-गंभीर' नजरिए से देखें, लेकिन उसमें पूरी तरह शामिल रहें - बिल्कुल किसी खेल की तरह. यही कारण है कि जीवन के सबसे गहरे पहलुओं को एक उत्सव के रूप में देखा जाता है, ताकि आप जीवन के असली सार से न चूक जाएं.
दिवाली का विचार आपके जीवन में उत्सव के उस पहलू को लाना है. इसीलिए पटाखे जलाए जाते हैं, ताकि आपमें भी थोड़ी सी चिंगारी पैदा हो सके! तो इसका मकसद बस इस एक दिन मौज-मस्ती करना नहीं है. अगर आप अंदर से बुझे हुए हैं, तो आपको हर दिन बाहर से किसी पटाखे की जरूरत पड़ेगी. वरना, इसे हमारे भीतर हर दिन होना चाहिए. अगर हम बस शांत बैठे हों, तो भी हमारी जीवन ऊर्जा, हृदय, मन और शरीर किसी जलते हुए पटाखे की तरह ऊर्जा से भरपूर होने चाहिए.
भारत के पचास सबसे प्रभावशाली लोगों में शामिल, सद्गुरु एक योगी, रहस्यदर्शी, दूरदर्शी और बेस्टसेलिंग लेखक हैं. सद्गुरु को 2017 में भारत सरकार द्वारा 'पद्म विभूषण' से सम्मानित किया गया था. यह देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक है, जो असाधारण और विशिष्ट सेवा के लिए दिया जाता है.
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