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क्या बिना सफलता मिले भी संतुष्टि प्राप्त हो सकती है? जानिए प्रेमानंद महाराज के विचार

प्रेमानंद महाराज ने बताया कि बिना सफलता के भी आत्म-संतुष्टि प्राप्त की जा सकती है. सच्ची शांति और संतोष ज्ञान से मिलता है, न कि धन और भौतिक उपलब्धियों से.

क्या बिना सफलता मिले भी संतुष्टि प्राप्त हो सकती है? जानिए प्रेमानंद महाराज के विचार
प्रेमानंद महाराज के विचार
Photo Credit: NDTV

Premanand Maharaj: आज के समय में ज्यादातर लोग मानते हैं कि सफलता मिलने पर ही जीवन में संतुष्टि और शांति आती है. इसी को लेकर प्रसिद्ध संत और कथावाचक प्रेमानंद महाराज से एक भक्त ने सवाल किया. प्रेमानंद महाराज ने बताया कि आत्म-संतुष्टि का संबंध सफलता से नहीं, बल्कि ज्ञान, भक्ति और आंतरिक संतोष से है. ऐसे में अगर आपके मन में भी सवाल है कि क्या बिना सफलता के भी संतुष्टी प्राप्त हो सकती है तो आपके लिए प्रेमानंद महाराज के ये विचार महत्वपूर्ण हो सकते हैं.

क्या सफलता जरूरी है?

एक श्रद्धालु ने प्रश्न किया कि क्या आत्म-संतुष्टि पाने के लिए सफलता जरूरी है? इस पर प्रेमानंद महाराज ने कहा कि बिना सफलता के भी आत्म-संतुष्टि प्राप्त की जा सकती है. सच्ची शांति और संतोष ज्ञान से मिलता है, न कि धन और भौतिक उपलब्धियों से. उन्होंने एक उदाहरण देते हुए कहा कि एक व्यक्ति गंगा किनारे बैठकर शीतल हवा और गंगा की लहरों का आनंद ले रहा था. तभी उसका मित्र आया और बोला कि कुछ काम करो, धन कमाओ. जब उसने पूछा कि धन कमाने के बाद क्या होगा, तो मित्र ने कहा कि भोग-विलास की वस्तुएं खरीदोगे और फिर शांति से बैठोगे. इस पर वह व्यक्ति बोला कि जब मैं अभी ही शांति से बैठा हूं, तो फिर इतनी भागदौड़ क्यों?

कैसे प्राप्त होती है वास्तविक शांति?

महाराज ने कहा कि सफलता और धन अक्सर व्यक्ति के भीतर और अधिक पाने की इच्छा पैदा करते हैं. लखपति करोड़पति बनना चाहता है, करोड़पति अरबपति और अरबपति खरबपति बनने की चाह रखता है. ऐसे में धन से लोभ बढ़ता है, लेकिन शांति नहीं मिलती. उनके अनुसार वास्तविक शांति ज्ञान, त्याग और भगवान की भक्ति से प्राप्त होती है. जो व्यक्ति इच्छाओं से मुक्त हो जाता है, वही वास्तव में समृद्ध होता है.

भगवान का भक्त ही सच्चा बादशाह

महाराज ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति आर्थिक रूप से साधारण है, लेकिन भगवान का सच्चा भक्त है, तो वह संसार के सबसे बड़े राजा से भी अधिक सुखी है. जिन लोगों की इच्छाएं लगातार बढ़ती रहती हैं, वे किसी न किसी रूप में भिखारी ही हैं. असल बादशाह वही है, जिसे किसी वस्तु की चाह न हो और जो ईश्वर के प्रेम में स्थित हो.

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