संघ लोक सेवा आयोग यानी UPSC अपने 100 साल पूरे कर रहा है. पिछले कई दशकों से लगातार यूपीएससी देश को काबिल अफसर दे रहा है. हर साल लाखों युवा इस परीक्षा को देते हैं, लेकिन महज कुछ को ही सफलता मिलती है. हालांकि सिविल सेवा में अफसर बनने के लिए परीक्षा का चलन इतना भी नया नहीं है, ये प्रथा औपनिवेशिक काल से चली आ रही है और इसमें समय-समय पर बदलाव होते रहे. आज हम आपको बताएंगे कि यूपीएससी से पहले भारत में सिविल सर्वेंट कैसे बनते थे और इसके लिए कौन सी परीक्षा देनी होती थी.
UPSC से पहले होती थी ये परीक्षा
भारत में यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन (UPSC) से कई साल पहले ब्यूरोक्रेसी की शुरुआत हो चुकी थी. गवर्नर-जनरल लॉर्ड कॉर्नवालिस ने 1786 से 1793 के दौरान इसकी शुरुआत की थी. ये वो दौर था, जब ईस्ट इंडिया कंपनी भारत के तमाम हिस्सों पर अपना कब्जा कर रही थी. इन इलाकों में काम करने के लिए एक प्रशासन की जरूरत थी, जिसका काम लगान वसूलने से लेकर न्याय व्यवस्था और कानून व्यवस्था बनाए रखना था.
शुरुआत में तो ये पद उन अंग्रेजों को दिए जाते थे, जो हुकूमत के करीबी होते थे. कई साल बाद 1855 में बड़ा बदलाव हुआ और 'इंडियन कोवेनेंटेड सिविल सर्विस' (ICS) के लिए खुली प्रतियोगी परीक्षा शुरू की गई. तब भारत में तैनात होने वाले अफसरों के लिए परीक्षा लंदन में हुआ करती थी. यही वजह है कि भारतीय युवाओं के लिए ये एक दूर की कौड़ी थी, वहीं परीक्षा के स्तर को मैच करना भी एक बड़ी चुनौती थी. हालांकि इसके बावजूद कुछ भारतीयों ने ये कमाल कर दिखाया.
भारत के पहले IAS अफसर
भारत के पहले आईएएस अफसर यानी सिविल सर्वेंट सत्येंद्रनाथ टैगोर थे. 1863 में उनका चयन सिविल सर्विस के लिए हुआ और फिर लंदन ट्रेनिंग के लिए जाना पड़ा. उन्होंने 1864 में वापसी की और अहमदाबाद के सहायक मैजिस्ट्रेट और कलेक्टर के पद पर उनकी तैनाती हुई. करीब 30 साल तक सेवा में रहने के दौरान उन्होंने कई अहम पदों पर काम किया. सत्येंद्रनाथ टैगोर महान कवि रबींद्रनाथ टैगोर के बड़े भाई थे.
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