- छह साल की उम्र में पिता के निधन के बाद बिहार की तीन बहनों ने आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद शिक्षा जारी रखी
- शिखा शबनम ने मैट्रिक के बाद गांव में ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया और समाजशास्त्र में ऑनर्स की डिग्री हासिल की
- शादी के बाद भी शिखा ने घर और बच्चों की देखभाल के साथ BPSC TRE-3 परीक्षा में सफलता पाई और शिक्षक बनीं
Success Story: शिखा की उम्र छह साल थी, जब उनके पिता का निधन हो गया. घर में कोई भाई भी नहीं था. मां सीता देवी पर तीन बेटियों की परवरिश की पूरी जिम्मेदारी आ गई. परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि पढ़ाई पर ज्यादा खर्च किया जा सके, लेकिन इसके बावजूद बेटियों की शिक्षा नहीं रुकी.
यह सक्सेस स्टोरी बिहार के शेखपुरा जिले के चेवाड़ा प्रखंड स्थित लोहान गांव की है. संजय सिंह पेशे से किसान थे और राशन डीलर का काम करते थे, लेकिन 1997 में उनका आकस्मिक निधन हो गया. पिता के जाने के बाद तीनों बेटियों के सिर से उनका साया उठ गया.
बड़ी बहन शिखा ने संभाली जिम्मेदारी
ऐसे में सबसे बड़ी बेटी शिखा शबनम ने मैट्रिक पास करने के बाद गांव में बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया. वह दिन में बच्चों को पढ़ातीं और स्वयं भी पढ़ाई करती थीं. इसी तरह उन्होंने समाजशास्त्र में ऑनर्स की डिग्री हासिल की. वर्ष 2016 में नवादा सदर प्रखंड के भदोखरा गांव निवासी आनंद कुमार से उनका विवाह हुआ.

Success Story bihar three sisters: पिता की मौत के बाद मां सीता बनी तीनों की बहनों की ताकत
शादी के बाद जीवन की चुनौतियां बदल गईं. घर की जिम्मेदारियों के साथ दो बच्चों का पालन-पोषण करना पड़ा. ससुर का भी निधन हो चुका था और पति आनंद भी उस समय रोजगार की तलाश में संघर्ष कर रहे थे. ऐसे में पढ़ाई जारी रखना आसान नहीं था, फिर भी शिखा ने हार नहीं मानी. वह घर के काम निपटाने और बच्चों की देखभाल के बाद मिलने वाले हर खाली समय में पढ़ाई करती रहीं.

पिता के जाने के बाद तीनों बहनों ने एक-दूसरे का सहारा बनकर पढ़ाई जारी रखी.
तीनों बहनों ने एक-दूसरे का दिया साथ
शिखा की दो छोटी बहनें पूजा और मानसी हैं. पिता के जाने के बाद तीनों बहनों ने एक-दूसरे का सहारा बनकर पढ़ाई जारी रखी. शिखा के विवाह के बाद पूजा और मानसी ने गांव के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया, जिससे वे अपनी पढ़ाई का खर्च निकाल सकीं. पूजा ने इतिहास में ऑनर्स किया, जबकि मानसी ने केमिस्ट्री में ऑनर्स किया. तीनों बहनों का पढ़ाई का तरीका लगभग एक जैसा रहा; आर्थिक तंगी के कारण उन्होंने ट्यूशन पढ़ाया, पढ़ाई की और विवाह के बाद भी किताबों से नाता बनाए रखा.
दूसरी बहन पूजा की सक्सेस स्टोरी
पूजा का विवाह वर्ष 2019 में नवादा के कौआकोल प्रखंड के विशनपुर निवासी कुमार पंकज से हुआ. पूजा के ससुर का पूर्व में ही निधन हो चुका था और पति भी करियर के लिए संघर्षरत थे. शादी के बाद पूजा के दो बच्चे हुए, जिससे जिम्मेदारियां बढ़ गईं. इसके बावजूद उन्होंने पढ़ाई जारी रखी. सास, पति और बड़े जीजा आनंद कुमार ने उन्हें शिक्षक बनने के लिए प्रेरित किया.

सबसे छोटी बहन मानसी ने पूजा के विवाह के बाद भी ट्यूशन पढ़ाकर अपनी पढ़ाई जारी रखी
पूजा पुलिस सेवा में जाना चाहती थीं, लेकिन बचपन से ट्यूशन पढ़ाने के कारण उनका रुझान शिक्षा क्षेत्र की ओर हो गया. उन्होंने शिक्षक भर्ती की तैयारी शुरू की और BPSC TRE-1 परीक्षा में सफलता प्राप्त की. वर्तमान में वह नवादा जिले के नरहट प्रखंड के नवसृजित प्राथमिक विद्यालय पुरबौद्ध में कार्यरत हैं. उनके पति कुमार पंकज भी नवादा के नरहट प्रखंड स्थित सैदापुर गोवासा के उच्च माध्यमिक विद्यालय में शिक्षक हैं.
सबसे छोटी बहन मानसी की सफलता
सबसे छोटी बहन मानसी ने पूजा के विवाह के बाद भी ट्यूशन पढ़ाकर अपनी पढ़ाई जारी रखी. वर्ष 2022 में उनका विवाह नवादा के पकरीबरावां प्रखंड के डुमरी निवासी विकास कुमार से हुआ. विवाह के समय उनके पति भी करियर के शुरुआती दौर में थे. एक बच्चे की मां बनने के बावजूद मानसी ने तैयारी नहीं छोड़ी. पति और सास-ससुर के सहयोग से उन्हें पढ़ाई का अनुकूल माहौल मिला. कठिन परिश्रम के बल पर उन्होंने BPSC TRE-1 की परीक्षा उत्तीर्ण की. उनके पति विकास कुमार पेशे से इंजीनियर हैं.

तीनों बहनों की जीवन यात्रा में अद्भुत संयोग रहा. बचपन में ही पिता का साया उठ गया, कोई भाई नहीं था, और तीनों ने ट्यूशन पढ़ाकर पढ़ाई पूरी की.
संघर्ष से सफलता तक का संयोग
तीनों बहनों की जीवन यात्रा में एक अद्भुत संयोग रहा. बचपन में ही पिता का साया उठ गया, कोई भाई नहीं था, और तीनों ने ट्यूशन पढ़ाकर पढ़ाई पूरी की. तीनों का विवाह ऐसे समय में हुआ जब उनके पति भी अपने करियर के लिए संघर्ष कर रहे थे. विवाह के बाद मायके से मिला हौसला ससुराल में भी कायम रहा, जहां पति और सास-ससुर ने पढ़ाई का पूरा अवसर दिया.
सीता देवी बनीं 'मास्टरनी की मां'
मां सीता देवी के लिए यह केवल तीन बेटियों की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि उस लंबे संघर्ष का प्रतिफल है जो उन्होंने पति के निधन के बाद अकेले शुरू किया था. कभी बेटियों के भविष्य को लेकर चिंतित रहने वाली मां आज उनकी सफलता से जानी जाती हैं. समाज में अपनी बेटियों के बूते सम्मान पाने वाली सीता देवी की नई पहचान अब 'मास्टरनी की मां' के रूप में बन चुकी है.
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