12वीं के बाद इंजीनियरिंग और मेडिकल में एडमिशन के लिए ली जाने वाली JEE-NEET परीक्षाओं और देशभर में पढ़ाए जा रहे स्कूली सिलेबस में बड़ा अंतर है. सरकार की एक्सपर्ट कमेटी ने अपनी हालिया रिपोर्ट में ये बात कही है. इसमें साफ कहा गया है कि स्कूलों में दी जा रही शिक्षा छात्रों को ऐसी मुश्किल परीक्षाओं के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं कर पाती है, जिसके चलते उन्हें कोचिंग और बाकी चीजों का सहारा लेना पड़ता है. रिपोर्ट में बदलाव के कुछ सुझाव भी दिए गए हैं.
रिपोर्ट में बताया गया अंतर
इकनॉमिक टाइम्स ने इस रिपोर्ट को एक्सेस कर इसमें मौजूद तमाम चीजों को बताया है. इसमें बताया गया है कि स्कूलों में पढ़ाई मुख्य रूप से बोर्ड परीक्षाओं और थ्योरी पर केंद्रित होती है, जबकि NEET और JEE जैसी परीक्षाओं में हाई लेवल एनालिटिकल और प्रॉब्लम सॉल्विंग स्किल को टेस्ट किया जाता है. स्कूलों में इस तरह की चीजे नहीं होने के चलते छात्र ऐसे परीक्षाओं में पास नहीं हो पाते हैं और फिर महंगी कोचिंग जैसी चीजों का सहारा लेते हैं. स्कूलों और प्रतियोगी परीक्षाओं में इस करिकुलम गैप के चलते छात्रों पर 9वीं या फिर 10वीं से ही कोचिंग का दबाव बनाया जाता है.
पैनल ने दिए सुझाव
सरकार की एक्सपर्ट कमेटी ने इस समस्या से निपटने के लिए कुछ सुझाव भी दिए हैं. कमेटी ने सुझाव दिया है कि NCERT और राज्य बोर्डों के करिकुलम को इस तरह री-डिजाइन किया जाए कि छात्रों को प्रतियोगी परीक्षाओं की बुनियादी तैयारी स्कूल में ही मिल सके. इससे कोचिंग कल्चर पर लगाम लगेगी और स्कूलों में ही कॉन्सेप्ट क्लियर हो जाएंगे. मानसिक दबाव और आर्थिक बोझ कम करने में भी ये मदद करेगा.
मेंटल हेल्थ को लेकर चिंता
कमेटी की तरफ से रिपोर्ट में कोटा और देशभर के बाकी कोचिंग हब्स में छात्रों पर बढ़ते मानसिक दबाव और डिप्रेशन का जिक्र किया है. हर साल कोटा और देश के बाकी शहरों में छात्रों की खुदकुशी की खबरें सामने आती हैं. रिपोर्ट में साफ किया गया है कि जब तक स्कूली शिक्षा को मजबूत नहीं किया जाएगा, तब तक कोचिंग संस्थानों पर निर्भरता खत्म नहीं होगी.
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