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This Article is From Oct 02, 2018

दिल्ली में इलाज के लिए आए मजबूर लोग रोजी-रोटी का कुछ इस तरह करते हैं इंतजाम

ये उन मरीजों की कहानी है जो इलाज के लिए दिल्ली तो आए पर घर वापस नहीं हो पाए. सुनने में अटपटा भले लगे पर इलाज इतना लंबा चलता है कि इन गरीबों को अपने इलाके में सालों साल लौटने का मौका ही नहीं मिलता.

दिल्ली में इलाज के लिए आए मजबूर लोग रोजी-रोटी का कुछ इस तरह करते हैं इंतजाम
इलाज के लिए दिल्ली तो आए पर घर वापस नहीं जा पाए
नई दिल्ली: ये उन मरीजों की कहानी है जो इलाज के लिए दिल्ली तो आए पर घर वापस नहीं हो पाए. सुनने में अटपटा भले लगे पर इलाज इतना लंबा चलता है कि इन गरीबों को अपने इलाके में सालों साल लौटने का मौका ही नहीं मिलता. इलाज से लेकर जंग ज़िन्दगी की है लिहाज़ा अस्पताल के आसपास ही इलाज के साथ-साथ ये दिहाड़ी मज़दूरी में जुट जाते हैं. पिछले 8 साल से ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस (एम्‍स) के स्टोर रूम के पास इलाहाबाद के केशव देव मिश्रा पत्नी के इलाज के लिए दिहाड़ी कर रोज़ी रोटी जुटा रहे हैं. ये इलाज का बोझ है. एम्‍स के के सामने का रैन बसेरा का बिस्तर 4 साल से इनका घर है. इससे पहले के 4 साल फुटपाथ पर बीते थ. पत्नी नीलू शादी के बाद से बीमार है. न्यूरो की समस्या है और 3-4 दिन पर ओपीडी में डॉक्टर से मिलने की जरूरत पड़ती है. मजबूरी में डेरा डाल लिया और रोज़गार ढूंढ लिया. 

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केशव बताते हैं कि डॉ छुट्टी नहीं दे रहे. दवाई और बढ़ेगी 3-4 दिन में ओपीडी में दिखवाना ही पड़ता है. ऐसे में भला घर जाने की कैसे सोचें? हां इन 8 सालों में बस दो बार घर जाने का मौका मिला. वो भी 2-3 दिनों के लिए. अब रहना है. इलाज करवाना है तो एम्‍स कैंपस में ही सामान ढोने का काम मिल गया. उत्तर-प्रदेश के मऊ की 40 साल की रानी कैंसर की मरीज़ हैं. चार साल पहले दिल्ली आईं और दिल्ली राज्य कैंसर संस्थान में इलाज चलने लगा. बीमारी ने ऐसा जकड़ा की दिल्ली छूट नहीं रही है, लिहाजा नाबालि बेटा चाय की दुकान में खुद से काम करके मां के दुख को आर्थिक तौर पर कम करने में जुटा है. दो एनजीओ की भी मदद मिल रही है. सब कुछ छूट गया कहते-कहते रानी रो पड़ीं.

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जब दिल्ली गेट के पास आप लोकनायक अस्पताल के गेट नंबर 3 पर जाएंगे तो बगल में फुटपाथ पर वज़न तौलने की मशीन लिए 55 साल का एक बुजुर्ग दिखेगा. दरअसल ये एक मरीज़ की दुकान है. पुणे के बाबू राओ खरात इलाज और खुद के गुजर बसर के लिए दिल्ली के लोकनायक अस्पताल के गेट नंबर 3 के पास बीते करीब 6 महीनों से दुकान लगा रहे हैं. बाएं हाथ की चार अंगुलियां गन्ने के रस निकलने की मशीन में चली गईं और कट गईं. पुणे में इलाज करवाया तो डेढ़ लाख का खर्च बताया. फिर परिवार को छोड़ दिल्ली आ गए. जिस लोकनायक अस्पताल में इलाज चलता है उसी में रहते हैं और बाहर दुकान है. खरात बताते हैं कि ये काम इसलिए बाबूजी क्योंकि इलाज चलेगा तब तक तो कुछ न कुछ करना पड़ेगा. रहने के लिए पैसा चाहिए. एक हाथ से जो काम हो सकता है. वही कर रहे हैं. 2000 रुपये लेकर चले थे. 1000 रुपये का टिकट हुआ था. बाकी बचे 1000 में से 500 रुपये का ये वजन काटा खरीद लिया.

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ऐसी कहानी कुछ मरीजों तक ही नहीं सिमटी. जानकार बताते हैं कि दिल्ली के सरकारी अस्पताल में करीब 45% मरीज़ बाहर के आते हैं और इसमें करीब 10% को लंबे इलाज की जरूरत पड़ती है. तादाद हज़ारों में है पर इसको कम करने के तरीके भी हैं. EWS मॉनिटरिंग कमिटी के सदस्य अशोक अग्रवाल कहते हैं कि हेल्थ राज्य का विषय है. पर इसको समवर्ती सूची में लाया जाए. समवर्ती सूची में लाकर फंडामेंटल राइट बनाया जाए और पार्लियामेंट सेंट्रल लॉ बनाए. इसलिए क्योंकि वो राज्य को शासनादेश कर सके कि दो से 3 साल में इतना फिजिकल या इंफ्रास्ट्रक्चरल चीजें क्रिएट कर सके।ताकि जब सब कुछ राज्य में मुमकिन होगा तब दिल्ली आने की जरूरत इन जैसे मरीजों को नही पड़ेगी.

VIDEO: दिल्ली में इलाज भी रोजगार है
 

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