
नई दिल्ली:
ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ सीरीज़ के पुणे में खेले गए पहले टेस्ट मैच में मिली करारी हार के बाद अब टीम इंडिया पलटवार करने की तैयारी में है, लेकिन उसके लिए पांच ऐसी चीज़ें हैं, जिन पर काम करने की टीम को सख्त ज़रूरत है, और इन्हें दुरुस्त किए बिना टीम इंडिया कंगारुओं पर शिकंजा नहीं कस सकती.
फील्डिंग में मुस्तैदी ज़रूरी : टीम इंडिया को अपनी फील्डिंग में निरंतरता की ज़रूरत है. पुणे में टीम इंडिया के खिलाड़ियों ने स्टीवन स्मिथ के कम से कम चार कैच छोड़े, मैट रेनशॉ को भी कैच आउट किया जा सकता था, लेकिन वह भी न हो सका. मैच के बाद कप्तान विराट कोहली ने भी कहा था कि लो-स्कोरिंग टेस्ट मैच में एक गलती इतनी बार करने के बाद कोई टीम जीत की हकदार नहीं होती. कहावत बेहद पुरानी है, लेकिन इस वक्त टीम इंडिया पर सटीक बैठती है - Catches win matches.
डीआरएस को समझना ज़रूरी : इंग्लैंड सीरीज़ से पहले डीआरएस, यानी डिसीज़न रिव्यू सिस्टम के इस्तेमाल का फैसला लिया गया और विराट कोहली ने कहा कि यह कोई रॉकेट साइंस नहीं है, मगर सात टेस्ट मैचों के बाद टीम इंडिया को समझ आ गया कि तकनीक का इस्तेमाल उतना सहज भी नहीं है. दूसरी पारी में स्मिथ 72 रन पर आउट हो गए होते, अगर टीम इंडिया के पास रिव्यू बचा होता. यह भी समझना होगा कि हर मौके पर इसका इस्तेमाल नहीं हो सकता. दूसरी पारी में दोनों सलामी बल्लेबाज़ों ने छह ओवर के भीतर ही दोनों रिव्यू गंवा दिए और बाकी के बल्लेबाज़ों को अंपायर के भरोसे छोड़ दिया.
लाइन के साथ लेंथ भी ज़रूरी : एक टेस्ट मैच हारने के बाद रविचंद्रन अश्विन और रवींद्र जडेजा की बुराई करना पाप करने जैसा होगा, लेकिन सच्चाई यह भी है कि पुणे में इन दोनों की लाइन ठीक थी, लेकिन लेंथ नहीं. जडेजा ने गुड लेंथ पर गेंद को टप्पा दिया, जिससे गेंद घूमी ज़रूर, मगर बल्ले का किनारा नहीं लिया, ओकीफ़ ने गुड लेंथ और फुल लेंथ के बीच टप्पा रखा और बल्लेबाज़ को हर गेंद खेलने पर मजबूर किया. बस, इतने-से फर्क ने पुणे मैच के नतीजे पर बड़ा फर्क डाला. कोच कुंबले को यह गुत्थी सुलझानी होगी.
क्या पांच गेंदबाज़ ज़रूरी हैं : पुणे में भारतीय टीम ने 182 ओवर गेंदबाज़ी की और इनमें से सिर्फ 14 ओवर ईशांत शर्मा ने डाले. जिस सीरीज़ में गेंद इतना घूम रही हो, वहां पुरानी सोच यही कहती है कि बल्लेबाज़ी को मज़बूत करो. सुनीन गावस्कर भी छह बल्लेबाज़ खिलाने के हक में हैं. बेंगलुरू में भी पिच अगर स्पिनरों के लिए मददगार हुई तो लोकल ब्वॉय करुण नायर को मौका देना सही फैसला होगा.
घबराने की ज़रूरत नहीं : 17 जीत या फिर यू कहें कि लगातार 19 टेस्ट में हार न देखने के बाद अगर एक टेस्ट मैच में हार मिलती है, तो उससे बौखलाने की ज़रूरत नहीं. हार के बजाय जीत को याद रखना इस समय बेहतर होगा, क्योंकि इस टीम और इन खिलाड़ियों को जीतना आता है. पुणे टेस्ट और उसमें मिली हार के बारे में ज़रूरत से ज़्यादा सोचने से फायदा कम, नुकसान ज़्यादा होगा, क्योंकि वक्त की मांग मानसिक तौर पर मज़बूत बनने की है.
फील्डिंग में मुस्तैदी ज़रूरी : टीम इंडिया को अपनी फील्डिंग में निरंतरता की ज़रूरत है. पुणे में टीम इंडिया के खिलाड़ियों ने स्टीवन स्मिथ के कम से कम चार कैच छोड़े, मैट रेनशॉ को भी कैच आउट किया जा सकता था, लेकिन वह भी न हो सका. मैच के बाद कप्तान विराट कोहली ने भी कहा था कि लो-स्कोरिंग टेस्ट मैच में एक गलती इतनी बार करने के बाद कोई टीम जीत की हकदार नहीं होती. कहावत बेहद पुरानी है, लेकिन इस वक्त टीम इंडिया पर सटीक बैठती है - Catches win matches.
डीआरएस को समझना ज़रूरी : इंग्लैंड सीरीज़ से पहले डीआरएस, यानी डिसीज़न रिव्यू सिस्टम के इस्तेमाल का फैसला लिया गया और विराट कोहली ने कहा कि यह कोई रॉकेट साइंस नहीं है, मगर सात टेस्ट मैचों के बाद टीम इंडिया को समझ आ गया कि तकनीक का इस्तेमाल उतना सहज भी नहीं है. दूसरी पारी में स्मिथ 72 रन पर आउट हो गए होते, अगर टीम इंडिया के पास रिव्यू बचा होता. यह भी समझना होगा कि हर मौके पर इसका इस्तेमाल नहीं हो सकता. दूसरी पारी में दोनों सलामी बल्लेबाज़ों ने छह ओवर के भीतर ही दोनों रिव्यू गंवा दिए और बाकी के बल्लेबाज़ों को अंपायर के भरोसे छोड़ दिया.
लाइन के साथ लेंथ भी ज़रूरी : एक टेस्ट मैच हारने के बाद रविचंद्रन अश्विन और रवींद्र जडेजा की बुराई करना पाप करने जैसा होगा, लेकिन सच्चाई यह भी है कि पुणे में इन दोनों की लाइन ठीक थी, लेकिन लेंथ नहीं. जडेजा ने गुड लेंथ पर गेंद को टप्पा दिया, जिससे गेंद घूमी ज़रूर, मगर बल्ले का किनारा नहीं लिया, ओकीफ़ ने गुड लेंथ और फुल लेंथ के बीच टप्पा रखा और बल्लेबाज़ को हर गेंद खेलने पर मजबूर किया. बस, इतने-से फर्क ने पुणे मैच के नतीजे पर बड़ा फर्क डाला. कोच कुंबले को यह गुत्थी सुलझानी होगी.
क्या पांच गेंदबाज़ ज़रूरी हैं : पुणे में भारतीय टीम ने 182 ओवर गेंदबाज़ी की और इनमें से सिर्फ 14 ओवर ईशांत शर्मा ने डाले. जिस सीरीज़ में गेंद इतना घूम रही हो, वहां पुरानी सोच यही कहती है कि बल्लेबाज़ी को मज़बूत करो. सुनीन गावस्कर भी छह बल्लेबाज़ खिलाने के हक में हैं. बेंगलुरू में भी पिच अगर स्पिनरों के लिए मददगार हुई तो लोकल ब्वॉय करुण नायर को मौका देना सही फैसला होगा.
घबराने की ज़रूरत नहीं : 17 जीत या फिर यू कहें कि लगातार 19 टेस्ट में हार न देखने के बाद अगर एक टेस्ट मैच में हार मिलती है, तो उससे बौखलाने की ज़रूरत नहीं. हार के बजाय जीत को याद रखना इस समय बेहतर होगा, क्योंकि इस टीम और इन खिलाड़ियों को जीतना आता है. पुणे टेस्ट और उसमें मिली हार के बारे में ज़रूरत से ज़्यादा सोचने से फायदा कम, नुकसान ज़्यादा होगा, क्योंकि वक्त की मांग मानसिक तौर पर मज़बूत बनने की है.
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