वित्तमंत्री जी ध्यान दें... शून्य बजट प्राकृतिक खेती के लिए किसानों को चाहिए बजट

शून्य बजट शब्द का अर्थ है शून्य लागत से फसलों का उत्पादन. यह किसी भी रासायनिक खाद, कीटनाशक या किसी अन्य बाहरी सामग्री का उपयोग किए बिना फसल उगाने की एक प्रणाली है.

वित्तमंत्री जी ध्यान दें... शून्य बजट प्राकृतिक खेती के लिए किसानों को चाहिए बजट

किसानों को जीरो बजट फॉर्मिंग के लिए प्रोत्साहन की जरूरत है.

नई दिल्ली:

साल 2016 में सरकार ने कृषि के लिए सुभाष पालेकर को पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया था. उनको शून्य बजट प्राकृतिक खेती (ZBNF) नामक कृषि पद्धति के लिए जाना जाता है. शून्य बजट शब्द का अर्थ है शून्य लागत से फसलों का उत्पादन. यह किसी भी रासायनिक खाद, कीटनाशक या किसी अन्य बाहरी सामग्री का उपयोग किए बिना फसल उगाने की एक प्रणाली है. ZBNF को रासायनिक खाद और कीटनाशकों आधारित खेती के विकल्प के तौर पर देखा जाता है. हरित क्रांति ने भारत को अनाज के लिए आत्म-निर्भर बनाया, लेकिन इसने किसानों को रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर निर्भर बना दिया. इसने कई किसानों को कर्ज के जाल में धकेल दिया. 

2021 में प्रकाशित the Situation Assessment of Agricultural Households and Land Holdings of Households in Rural India 2019  रिपोर्ट के अनुसार, किसानों की औसत मासिक आय रु 10,218 थी जबकि भारतीय किसानों पर औसत कर्ज रु 74,121 हैं. इस रिपोर्ट के अनुसार, 50.2% किसान परिवार कर्ज में डूबे हुए हैं.

इस संदर्भ में, प्राकृतिक खेती भारतीय किसानों और खेती के लिए वरदान साबित हो सकती है. केंद्रीय कृषि मंत्री ने 22 मार्च 2022 को लोकसभा में अपने लिखित उत्तर में प्राकृतिक खेती की क्षमता के बारे में कहा था कि "देश के विभिन्न हिस्सों से ZBNF के कार्यान्वयन के साक्ष्य इंगित करते हैं कि ZBNF की ओर बदलाव लागत को काफी कम करने में मदद करता है.”
ZBNF और प्राकृतिक खेती के महत्व का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसे केंद्रीय वित्त मंत्री के पिछले चार बजट भाषणों में से तीन में स्थान मिला है. जुलाई 2019 के बजट भाषण में, निर्मला सीतारमन ने कहा, “(जीरो बजट फार्मिंग) हमें इस नवाचार मॉडल को दोहराने की जरूरत है जिसके माध्यम से कुछ राज्यों में इस कार्य के लिए किसानों को पहले ही प्रशिक्षित किया जा रहा है. ऐसे कदम उठाने से स्वतंत्रता के 75वें वर्ष तक हमारे किसानों की आय दोगुनी हो सकती है.”  

प्रधानमंत्री मोदी ने भी शून्य बजट खेती में गहरी दिलचस्पी दिखाई है और कहा कि शून्य बजट प्राकृतिक खेती को एक जन आंदोलन बनना चाहिए और लोगों को इसके लाभों के बारे में जागरूक किया जाना चाहिए
इससे यह प्रमाणित होता है कि ZBNF और प्राकृतिक खेती हमारे सर्वोच्च निर्णय निर्माताओं के लिए प्राथमिकता में है. लेकिन जब धरातल पर क्रियान्वयन की बात आती है, तो प्रगति खराब रही है. सरकार भारतीय प्राकृतिक कृषि पद्धति (बीपीकेपी) योजना के माध्यम से प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दे रही है, जिसके तहत किसानों को 3 वर्ष के लिए Rs. 12200/हेक्टेयर प्रदान किया जाता है. लेकिन, ZBNF और जैविक खेती पर पूछे गए सवालों के संबंध में संसद में सरकार द्वारा दिए गए जवाबों से पता चलता है कि सरकार ने मार्च 2021 से अगस्त 2022 के 17 महीनों के दौरान BPKP योजना के लिए एक भी रुपया खर्च नहीं किया है.

23 मार्च 2021 को केंद्रीय कैबिनेट मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने लोकसभा में लिखित जवाब में बताया कि अब तक, प्राकृतिक खेती के तहत 4.09 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को कवर किया गया है और तमिलनाडु राज्य सहित देशभर के 8 राज्यों में 4980.99 लाख रुपये की कुल धनराशि जारी की गई है. उन्होंने ZBNF विषय पर 22 मार्च 2022 को द्रमुक सांसद टी.आर. बालू द्वारा पूछे गए प्रश्न के लिखित उत्तर में यही जानकारी को दोहराया. बाद में 2 अगस्त 2022 को सांसद संगीता आज़ाद और हबी ईडन के सवालों के जवाब में तोमर ने कहा बीपीकेपी के तहत प्राकृतिक खेती के अंतर्गत 4.09 लाख हैक्टेयर क्षेत्र को शामिल किया गया है और 8 राज्यों जिनमें आन्ध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, केरल, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, ओडिशा, मध्य प्रदेश और तमिलनाडु को कुल 4980.99 लाख रुपये की निधि जारी की गई है.

इसका मतलब साफ़ है कि मार्च 2021 से अगस्त 2022 के 17 महीनों के दौरान BPKP के लिए भारत सरकार ने एक भी रुपया खर्च नहीं किया. इसके अलावा, बजट 2021-22 में, सरकार ने परम्परागत कृषि विकास योजना के लिए 450 करोड़ रुपये आवंटित किए थे, जिसे घटाकर 2021-22 के संशोधित बजट में 100 करोड़ रुपये कर दिया गया था. 

एक तरफ प्रधानमंत्री ने प्राकृतिक खेती को जन आंदोलन बनाने का आह्वान किया है तो दूसरी तरफ रासायनिक खाद पर सरकार का खर्च बढ़ रहा है. Centre for Science and Environment (CSE) की रिपोर्ट के अनुसार, प्रति हेक्टेयर रासायनिक खाद पर दी जाने वाली सब्सिडी 2016 से 2020 के बीच 5000 से 6000 रुपया तक की थी जो 2020-21 में बढ़कर 9400 रुपया हो गई. साल 2019 में भारत रासायनिक उर्वरकों का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता था.  भारत दुनिया भर में उत्पादित रासायनिक उर्वरकों का लगभग 15 प्रतिशत उपभोग करता था. रासायनिक उर्वरकों पर खर्च की तुलना में सरकार जैविक खाद और जैविक खेती पर बहुत कम खर्च करती है. 

पिछले बजट भाषण में, वित्त मंत्री ने घोषणा कि देशभर में रसायन मुक्त प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दिया जाएगा जिसके प्रथम चरण में गंगा नदी के पांच किमी. चौड़े कोरिडोर्स में आने वाले किसानों की जमीनों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा.
इसे धरातल पर लागू करने के लिए, सरकार को ऐसी नीतियां बनाने की जरूरत है जो किसानों को रासायनिक खेती से प्राकृतिक खेती की ओर ले जाएं. सरकारों को दो मोर्चों पर साथ-साथ काम करना पड़ेगा, प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देना और रासायनिक आधारित खेती को कम करना.

नवंबर 2021 में प्रधानमंत्री मोदी ने तीन कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा की थी और उन्होंने एमएसपी और अन्य मुद्दों की चर्चा लिए एक समिति बनाने की भी घोषणा की थी. सरकार ने 18 जुलाई 2022 को उस समिति का गठन किया है. समिति को संदर्भित विषयों में प्राकृतिक खेती से संबंधित पांच विषय शामिल हैं. सरकार ने इस समिति से प्राकृतिक खेती से संबंधित मूल्य श्रृंखला के विकास, किसान अनुकूल प्रमाणन प्रक्रिया, प्रमाणीकरण के लिए प्रयोगशालाओं के विकास आदि से संबंधित सुझाव मांगे हैं. ये सभी विषय प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र जहां सरकार को काम करने की जरूरत है, वह है किसानों को रसायन युक्त खेती से प्राकृतिक खेती की ओर स्थानांतरित करने के लिए एक अच्छा वित्तीय प्रोत्साहन पैकेज प्रदान करना.

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यह सर्वविदित तथ्य है कि, जब कोई किसान अपनी भूमि को रासायनिक आधारित खेती से जैविक खेती में परिवर्तित करता है, तो उपज में कमी का खतरा होता है. प्राकृतिक खेती की ओर सहज बदलाव की सुविधा के लिए सरकार को किसानों को वित्तीय सहायता प्रदान करने की आवश्यकता है. सरकार को बीजों और जैविक उर्वरकों की उपलब्धता और गुणवत्ता और आपूर्ति बढ़ाने की भी आवश्यकता है. आज सरकार रासायनिक खाद सब्सिडी और पीएम किसान योजना पर करीब 1.6 लाख करोड़ रुपये खर्च करती है. सरकार को इस तरह की पॉलिसी बनाने की जरूरत है जिससे यह 1.6 लाख करोड़ का उपयोग करके धीरे धीरे किसानों को रासायनिक आधारित खेती से प्राकृतिक खेती की ओर परिवर्तन लिए प्रोत्साहित किया जा सके.