दूरदर्शन पर प्रसारित हुए धारावाहिक ‘रामायण' के निर्देशक रामानंद सागर के पोते और प्रेम सागर के बेटे शिव सागर ने अपने दादा की याद में और पिता का सपना पूरा करते हुए कर्जत स्थित अपने फार्म हाउस में भगवान श्रीराम का मंदिर बनवाया और सोमवार को श्रीराम की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की. 1987 में प्रसारित हुए इस धारावाहिक का कोई जोड़ नहीं है और आज भी रामायण पर अगर कोई फिल्म या धारावाहिक बनता है, तो लोग उसकी तुलना रामानंद सागर की ‘रामायण' से ही करते हैं. शिव सागर से एनडीटीवी ने खास बातचीत की और उनसे उनके उस बयान के बारे में पूछा, जिसमें उन्होंने निमित मल्होत्रा की ‘रामायण' में रणबीर कपूर की कास्टिंग पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि पर्सनली वह रणबीर कपूर को राम के किरदार में एक्सेप्ट नहीं कर सकते.
क्या बोले शिव सागर
इस बयान के पीछे की वजह बताते हुए शिव सागर ने कहा, “नहीं, देखिए, मैं पर्सनली किसी के अगेंस्ट नहीं हूं. हम खुद क्रिएटिव फील्ड से हैं, इसलिए समझते हैं कि क्रिएटिव फील्ड में कुछ क्रिएटिव लिबर्टीज लेनी पड़ती हैं. हम लोग भी कभी-कभी लेते हैं. लेकिन हमारा जो स्कूल ऑफ थॉट है, हमें बचपन से इतिहास और माइथोलॉजी को लेकर जो ट्रेनिंग मिली है, वह सागर स्कूल ऑफ थॉट है. हम लोग ज्यादा भक्ति रस में खेलते हैं.”
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हमारी रिसर्च भी बहुत ऑथेंटिक होती है, क्योंकि इन चीजों से लोगों की भावनाएं जुड़ी हुई हैं. यह जीवित भगवान हैं. यह कोई माइथोलॉजी नहीं है, यह अपना इतिहास है. आज भी लोग राम जी, हनुमान जी और शिव जी की पूजा करते हैं. जैसे ग्रीक गॉड्स हैं, उनकी आज ग्रीस में कोई पूजा नहीं कर रहा है, ज्यूस की या किसी और की. लेकिन ये जीवित भगवान हैं, इसलिए लोगों की इच्छाएं और भावनाएं इनसे जुड़ी हुई हैं.”
नोन फेस एक बैगेज
उन्होंने आगे कहा, “हमारा स्कूल हमेशा इसके लिए नई कास्टिंग करने में विश्वास रखता है. हम लोग नोन फेसेज लेते हैं, क्योंकि नोन फेसेज के साथ कोई बैगेज नहीं होता. किसी कलाकार का पास्ट और हिस्ट्री होता है, जो कई बार उसके निभाए जाने वाले कैरेक्टर को थोड़ा डिस्टर्ब करता है.
जैसे पापा जी की ‘रामायण' में भी और हमने जो भी ‘रामायण' बनाई, उसमें हमेशा फ्रेश कास्टिंग और फ्रेश फेस लिए, क्योंकि कोई बैगेज नहीं रहता है. इसलिए किसी नोन फेस को लेना मैं एक फायदा मानता हूं.
लेकिन जैसे उन्होंने अरुण गोविल जी को लिया, वो मेरे हिसाब से बहुत अच्छा था, क्योंकि उनको दशरथ का रोल दिया है. मैं मानता हूं कि यह बहुत स्मार्ट कास्टिंग थी. ‘रामायण' की जो अपनी ऑडियंस है, पापा जी की ‘रामायण' ओजी ‘रामायण' है. उसको कोई बीट नहीं कर पाएगा, कोई भी. वो बन गई, वो कोई दिव्य कृपा थी, जो भी बन गई. तो उससे कम से कम इनको जो फैन ऑडियंस है, उसका थोड़ा फायदा मिलेगा.”
शिव सागर के मुताबिक, रामानंद सागर की ‘रामायण' दर्शकों के लिए सिर्फ एक धारावाहिक नहीं, बल्कि आस्था और भावनाओं से जुड़ा अनुभव है. ऐसे में रामायण पर बनने वाली नई फिल्मों या धारावाहिकों में कास्टिंग के साथ-साथ इन भावनाओं का भी ध्यान रखना जरूरी है.
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