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56 साल पुरानी वो गजल जिसने गाया उसकी भी हुई मौत, जिसने लिखा वो भी खुदा को हुआ प्यारा, गाने से डरते हैं बड़े-बड़े फनकार

70 के दशक में लिखी गई एक गजल को लेकर ऐसा दावा किया जाता है कि इससे जुड़े शायर, सिंगर्स और कई अन्य लोगों की मौत के बाद इसे 'शापित' या 'मनहूस' कहा जाने लगा. यही वजह है कि दशकों बाद भी कई बड़े फनकार इस गजल को गाने से कतराते हैं और इसका किस्सा आज भी लोगों को हैरान कर देता है.

56 साल पुरानी वो गजल जिसने गाया उसकी भी हुई मौत, जिसने लिखा वो भी खुदा को हुआ प्यारा, गाने से डरते हैं बड़े-बड़े फनकार
70s का ये गजल माना गया शापित, लिखने से लेकर गाने वाले तक की हुई मौत
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गजल का नाम सुनते ही दिल में एक खास तरह की शांति उतर आती है. खासकर जब आवाज जगजीत सिंह जैसी हो, तो शब्द सीधे दिल तक पहुंचते हैं. लेकिन क्या हो अगर किसी गजल को लेकर ऐसी कहानी सामने आए, जिसे सुनकर लोग उसे गाने से ही कतराने लगें? पाकिस्तान की संगीत दुनिया में एक ऐसी ही गजल का किस्सा लंबे समय से चर्चा में रहा है. दावा किया जाता है कि इस गजल से जुड़े कई लोगों की असमय मौत ने इसे इतना रहस्यमयी बना दिया कि बड़े-बड़े गायक भी इसे अपनी आवाज देने से बचने लगे. इस गजल का नाम है- ‘इंशा जी उठो अब कूच करो'.

इब्ने इंशा की कलम से निकली थी ये गजल

इस गजल के पीछे मशहूर शायर इब्ने इंशा का नाम जुड़ा है. पंजाब के फिल्लौर में जन्मे शेर मोहम्मद खान को साहित्य की दुनिया में इब्ने इंशा के नाम से पहचान मिली. बंटवारे के बाद उन्होंने पाकिस्तान को अपना ठिकाना बनाया और अपनी शायरी के जरिए लोगों के दिलों में खास जगह बनाई. इब्ने इंशा की लेखनी सिर्फ इसी गजल तक सीमित नहीं थी. उनकी लिखी कई रचनाएं बाद में संगीत का हिस्सा बनीं. उनकी चर्चित रचनाओं में ‘कल चौदहवीं की रात थी' भी शामिल है, जिसे अलग-अलग दौर में गुलाम अली और जगजीत सिंह जैसे दिग्गजों ने अपनी आवाज दी. लेकिन ‘इंशा जी उठो अब कूच करो' की कहानी बाकी गजलों से बिल्कुल अलग बताई जाती है.

अमानत अली ने टीवी पर गाया और कुछ ही समय बाद हो गया निधन

साल 1974 के आसपास पटियाला घराने से ताल्लुक रखने वाले मशहूर गायक उस्ताद अमानत अली ने इस गजल को पाकिस्तान टेलीविजन पर पेश किया. उनकी शानदार गायकी ने इस रचना में ऐसा असर पैदा किया कि सुनने वालों के बीच यह तेजी से लोकप्रिय हो गई. मगर इसके कुछ ही समय बाद एक ऐसी घटना हुई, जिसने इस गजल के साथ जुड़े किस्से को रहस्यमयी बना दिया. अमानत अली का महज 52 वर्ष की उम्र में निधन हो गया.

इसके बाद लोगों ने इस गजल और उससे जुड़े लोगों की घटनाओं को जोड़कर देखना शुरू कर दिया. धीरे-धीरे इसे लेकर तरह-तरह की बातें कही जाने लगीं और यह रचना एक सामान्य गजल से बढ़कर ‘मनहूस गजल' के नाम से चर्चित होने लगी.

इब्ने इंशा ने आखिरी दिनों में खुद किया था इसका जिक्र

कहानी का सबसे भावुक हिस्सा इससे जुड़ा शायर इब्ने इंशा है. अमानत अली के निधन के कुछ साल बाद इब्ने इंशा खुद गंभीर बीमारी की चपेट में आ गए. कैंसर के इलाज के लिए वह लंदन गए, जहां उन्होंने अपने जीवन के आखिरी दिन बिताए. कहा जाता है कि अपने अंतिम दिनों में लिखे एक पत्र में उन्होंने अमानत अली को याद किया और इस गजल का जिक्र करते हुए इसे ‘मनहूस' तक कह दिया था. इसके अगले ही दिन इब्ने इंशा का निधन हो गया. यहीं से इस गजल को लेकर फैली कहानी को और हवा मिली. लोगों के बीच यह सवाल उठने लगा कि आखिर इस रचना से जुड़े लोगों के साथ बार-बार ऐसी घटनाएं क्यों हो रही हैं?

अमानत अली के बेटे असद ने भी गाई थी गजल

किस्सा यहीं खत्म नहीं हुआ. अमानत अली के बेटे असद अमानत अली खान भी अपने पिता की तरह संगीत की दुनिया में एक जाना-पहचाना नाम बने. एक कार्यक्रम में उन्होंने भी ‘इंशा जी उठो अब कूच करो' को अपनी आवाज दी. बताया जाता है कि इसके कुछ महीनों बाद उनका भी निधन हो गया. पिता और बेटे दोनों की मौतों को इस गजल से जोड़कर देखने वालों ने इसे महज संयोग मानने से इनकार कर दिया.

हालांकि, इन घटनाओं के बीच किसी तरह का वैज्ञानिक या प्रमाणित संबंध सामने नहीं आया है. फिर भी संगीत जगत में इससे जुड़ा किस्सा आज तक लोगों की दिलचस्पी बनाए हुए है.

शफकत अली ने आज तक नहीं गाई ये गजल

इस कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू मशहूर पाकिस्तानी गायक शफकत अली से जुड़ा बताया जाता है. एक इंटरव्यू में उन्होंने इस गजल को लेकर अपने परिवार की मान्यता का जिक्र किया था. उनके मुताबिक उनके बड़े भाई अमजद अली ने भी कभी इस गजल को गाया था और इससे जुड़े प्रोड्यूसर की भी बाद में मौत हो गई. ऐसे में परिवार की ओर से शफकत अली से कहा गया कि वह इस गजल को अपनी आवाज न दें. शफकत अली का कहना रहा है कि वह खुद अंधविश्वासी नहीं हैं, लेकिन परिवार की इस बात का सम्मान करते हुए उन्होंने इस रचना से दूरी बनाए रखी.

संयोग या सिर्फ एक डरावनी कहानी?

आज भी यह गजल संगीत प्रेमियों के बीच मौजूद है और इसके साथ जुड़ा किस्सा उतनी ही उत्सुकता पैदा करता है. एक तरफ इब्ने इंशा की बेहद खूबसूरत शायरी है, तो दूसरी ओर इसके गायकों और रचनाकार से जुड़ी मौतों की घटनाएं हैं.

क्या यह महज संयोग था या वाकई इस गजल के साथ कुछ ऐसा जुड़ा था, जिसे समझ पाना मुश्किल है? इसका कोई पुख्ता जवाब नहीं है. लेकिन इतना जरूर है कि ‘इंशा जी उठो अब कूच करो' की कहानी ने इसे सिर्फ एक गजल नहीं रहने दिया. करीब पांच दशक बाद भी इसका नाम आते ही लोग इसकी धुन से ज्यादा इसके पीछे छिपी रहस्यमयी कहानी को याद करते हैं.

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