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30 साल पुरानी नज्म से बना 14 साला पुराना गाना, शायर को चांद मे दिखी रोटियां, पीयूष मिश्रा के बोल और आवाज में एवरग्रीन

14 साल पहले फिल्म में एक गाना आया जो 30 साल पहले एक नाटक से बना. जिसने चांद को मामा और महबूब की जगह रोटी से तुलना करते हुए जिंदगी की ऐसी सच्चाई को बयां किया, जिससे हर कोई जुड़ गया. पियूष मिश्रा ने इसे ऐसे सजाया कि ये सालों बाद भी लोगों के दिलों में खास जगह बनाए हुए है.

30 साल पुरानी नज्म से बना 14 साला पुराना गाना, शायर को चांद मे दिखी रोटियां, पीयूष मिश्रा के बोल और आवाज में एवरग्रीन
30 साल पुराना गाना, 14 साल बाद फिल्म में आकर चांद को रोटी बता गया
नई दिल्ली:

कभी चांद मामा बन जाता है, तो कभी चांद में महबूब नजर आता है. लेकिन क्या आपको कभी चांद में रोटियां दिखी हैं? एक शायर या कवि की कल्पना के बारे में सोच पाना बेहद मुश्किल होता है. एक शायर ने यही बात सच साबित की और उसको चांद में महबूब या मामा नहीं बल्कि रोटियां दिखीं. उस तस्वीर को शब्दों में ऐसा पिरोया गया कि उसमें जिंदगी की सच्चाई नजर आई. यहां तक की सुनने वाला भी कुछ पल के लिए अपनी जिंदगी के बारे में सोचने पर मजबूर हो जाए. चांद को लेकर के फिल्मों में खूब गाने बने हैं. लेकिन इस 8 लाइनों ने चांद के साथ जिंदगी के सच को रुबरु करा दिया.

14 साल पुरानी फिल्म में आया गाना

साल 2012 में एक फिल्म आई, जिसमें बंदूकें थीं, बदले की कहानी थी, खून-खराबा था, इन्हीं सबके बीच फिल्म में एक ऐसा गाना है जिसने उस कहानी और शोर से बिल्कुल अलग होकर के अपनी पहचान बनाई. फिल्म की कहानी से बिल्कुल हटकर. इसमें न महंगे सपनों की बात थी, न इश्क की, बल्कि पेट, नींद, मां की सिसकियों और जिंदगी से लड़ते रहने की बात थी. ये गाना था पीयूष मिश्रा का 'इक बगल में चांद होगा, इक बगल में रोटियां'. गाने के बोल इस तरह हैं-

इक बगल में चाँद होगा, इक बगल में रोटियाँ
इक बगल में नींद होगी, इक बगल में लोरियाँ
हम चाँद पे, हम चाँद पे रोटी की चादर डाल कर सो जाएँगे
और नींद से, और नींद से कह देंगे लोरी कल सुनाने आएँगे 

इक बगल में खनखनाती, सीपियाँ हो जाएँगी
इक बगल में कुछ रुलाती, सिसकियाँ हो जाएँगी
हम सीपियों में भर के सारे तारे छू के आएँगे
और सिसकियों को, गुदगुदी कर के यूँ बहलाएँगे

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'चांद' और 'रोटी' के बीच छिपी जिंदगी की कहानी

'इक बगल में चांद होगा' गाना साल 2012 में आई अनुराग कश्यप की फिल्म 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' में आया था. इस नज्म को पीयूष मिश्रा ने लिखा, गाया और संगीत से भी जोड़ा. ये पीयूष की ही एक नज्म थी जिसे उसको तैयार किया और गाया. फिर इसी गाने को इस फिल्म में लिया गया. इस नज्म में चांद सिर्फ चांद नहीं है और रोटी सिर्फ खाना नहीं था. एक तरफ बड़े सपने और इच्छाएं हैं, तो दूसरी तरफ जिंदगी चलाने की बुनियादी जरूरतें. यही वजह है कि इसकी लाइनें सुनते ही इसका दर्द समझ आने लगता है. पीयूष मिश्रा ने बताया था कि 'इक बगल' उनके 1996 के नाटक से आया था. इस नजम को फिल्म में बहुत ही बखूबी तरीके से इस्तेमाल किया गया.

14 साल बाद भी लोगों के दिल में क्यों जिंदा है?

इस गाने की खासियत है इसके बोल और चांद और रोटी की खोज जो हर शख्स करता है. किसी के लिए चांद एक सपना होता है, किसी के लिए उसका करियर, किसी के लिए सुकून और किसी के लिए वो जिंदगी, जिसे वो जीना चाहता है. लेकिन इन सबके बीच रोटी वो जरूरत है, जिसे टाला नहीं जा सकता है. 'इक बगल में चांद होगा' आज भी पियूष शर्मा के चर्चित गानों में शामिल है. टी-सीरीज के ऑफिशियल यूट्यूब चैनल पर इसके लिरिकल वीडियो को 1.6 करोड़ से ज्यादा व्यूज मिल चुके हैं. 
 

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