मैं यह पोस्ट साझा करने वाली ध्रुवी गोस्वामी के बारे में नहीं जानता। उन्होंने साझा ही की तो जाहिर है कहीं और से इन्हें भी मिला होगा। इसे बनाया नहीं है। बताया गया है ध्रुवी गोस्वामी हिन्दी के किसी अखबार से जुड़ी हैं। ध्रुवी गोस्वामी ने साझा करने के बाद हुई बहस में कमेंट में भी लिखा है। हम उनके चेहरे को यहां 'ब्लर' कर दे रहे हैं। ढंक दे रहे हैं। मेरे लिए नाम और चेहरा महत्वपूर्ण नहीं है।

ध्रुवी को किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले चेक करना चाहिए था। मुझे नहीं मालूम कि अनजाने और भावावेश में युवा पत्रकार से नादानी हुई है। बात एक या दो पत्रकारों की नहीं है। यहां सोच का एक खतरनाक पैटर्न नजर आता है जो झूठ की बुनियाद पर खड़ा है। ऐसी सोच को कश्मीर से कोई लेना देना नहीं हैं।
जितनी मेहनत से ऐसे मटेरियल तैयार किए जा रहे हैं उससे लगता है कि कोई संगठित गिरोह है, जो एक राजनीतिक जमात के खतरनाक मंसूबों के लिए यह सब कर रहा है। इस मटेरियल में किसी हिन्द न्यूज़ का लोगो है ताकि लोगों की नजर में इसे विश्वसनीय बनाया जा सके। आप कभी फेसबुक और ट्विटर पर ऐसे लोगों की टाइम लाइन देखिएगा। खोजिए कि क्या यह लोग गरीब,आम लोगों की समस्याएं, दाल की कीमत, बेरोजगारी, ठेके पर रखे गए लाठी खाते मास्टरों, सरकारी शिक्षा संस्थानों को मारकर लाखों की फीस वाले शिक्षण संस्थानों के बारे में लिखते हैं? क्या यह लोग लिखते हैं कि हमारा सिपाही अठारह हजार की नौकरी में कैसे गुजारा करता होगा? एक सिपाही ने पत्र भी लिखा है कि मरने के बाद तो सब शहीद-शहीद करते हैं मगर कोई यह भी तो देखे कि हम अठारह हजार में गुजारा कैसे करते हैं? अगर मेरे बारे में ऐसे मटेरियल ही चलाने हैं तो मेरे नाम से चलाइए कि मैं मांग करता हूं कि देश के लिए लड़ने वाले सिपाही की तनख्वाह एक सांसद और विधायक से ज़्यादा होनी चाहिए।
आप कभी सोशल मीडिया के ज़रिए सही सवालों का प्रसार नहीं देखेंगे। आखिर क्या वजह है कि व्हाट्स ऐप फेसबुक पर हिन्दू बनाम मुस्लिम वाले मटेरियल ही साझा किए जा रहे हैं? देश के लोगों का ही ख़्याल नहीं तो यह राष्ट्रवाद किसके लिए है? कहीं असहमति के स्वर को कुचलने के लिए तो नहीं है?
बहुत से लोग व्हाट्स ऐप में चल रही ऐसी अफवाहों पर यकीन करने की मूर्खता कर लेते हैं। उनसे गलती हो जाती है। ऐसी बात लिखकर फैलाने वाले कौन लोग हैं? यह अब कैराना पर चुप हैं। कैराना को लेकर अफवाह फैलाई तो पोल खुल गई। गनीमत है मीडिया ने पोल खोल दी वरना व्हाट्स ऐप और फेसबुक के जरिए समाज के दिमाग में कबाड़ फैला चुके होते।
मेरे बारे में जो शेयर किया है उसमें दोनों ही बातें गलत हैं। याकूब मेमन की माफी की किसी याचिका पर मैंने कभी दस्तखत नहीं किया है। मेरे नाम से कश्मीर के बारे में जो लिखा गया है वह भी गलत है। मेरे प्राइम टाइम के जिस इंट्रो से यह पंक्ति उठाई गई है वह मेरे चैनल की वेबसाइट ndtv.in पर लिखित रूप में मौजूद है। मेरे ब्लॉग कस्बा पर भी है। मैंने प्राइम टाइम में जो कहा है उसकी दो पंक्तियां यहां पेश कर रहा हूं। इनसे पहले कश्मीर की बेरोजगारी का संदर्भ है।
"हमें कश्मीर का सुंदर पहाड़ ही दिखता है वहां की गरीबी और बेकारी नहीं दिखती है। हालात जिम्मेदार हैं तो वहां की राज्य सरकार क्या करती रही है।" जबकि अफवाह मटेरियल में यह लिखा गया है- "लोगों को सिर्फ कश्मीर की खूबसूरती दिखती है। कश्मीर के युवाओं की बेरोजगारी नहीं दिखती है। बेरोजगार युवा आखिर हथियार और पत्थर न उठाएं तो क्या करें?- रवीश कुमार ।"
मुझे बंदूक किसी के हाथ में अच्छी नहीं लगती। मैं क्यों ऐसी बातें करूंगा। आप पाठक खुद सोचें कि कौन हैं यह लोग जो अफवाह फैलाने में इतनी मेहनत कर रहे हैं। कहीं यूपी चुनाव के लिए ऐसी चीजों की आपूर्ति तो नहीं की जा रही है।आप इन खतरनाक लोगों के बारे में सोचिए जो आपके भीतर जहर फैलाना चाहते हैं। वरना गवर्नेंस और विकास के नाम पर आपकी जेहन में जहर के नाले बहते मिलेंगे।
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