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This Article is From Feb 25, 2015

उमाशंकर सिंह की कलम से : पुत्र-मोह नहीं, सोनिया की मजबूरी हैं राहुल!

Umashankar Singh
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  • Updated:
    फ़रवरी 25, 2015 09:08 am IST
    • Published On फ़रवरी 25, 2015 08:55 am IST
    • Last Updated On फ़रवरी 25, 2015 09:08 am IST

राहुल गांधी के छुट्टी पर जाने की बात ने कांग्रेस की स्थिति पर मंथन से ज़्यादा राजनीतिक चुटकुले पैदा कर दिए हैं। आए दिन विदेशों में छुट्टी मनाने की ख़बरों के कारण ये कटाक्ष किया जा रहा है कि क्या छुट्टियों की भी अपनी थकान होती है, जिसे मिटाने के लिए और छुट्टी चाहिए होती है!

ख़ैर। राहुल के छुट्टी पर जाने के फ़ैसले ने कांग्रेस के सामने के सवालों को ज़्यादा गंभीर कर दिया है। राहुल गांधी में क़ाबिलियत नहीं है, फिर भी सोनिया गांधी उन पर दांव खेल रही हैं, क्योंकि वो पुत्र मोह में फंसी है... राहुल गांधी को लेकर सोनिया गांधी पर लगने वाला ये सबसे आम आरोप है। और ये बात सिर्फ कांग्रेस के आलोचक ही नहीं, दबे-छुपे सुर में कांग्रेस के कई दिग्गज भी कह जाते हैं, अपनी-अपनी कोटरी में बैठ कर।

लेकिन शायद आपको ये जानकारी भौंचक्क कर जाए कि राहुल नहीं, प्रियंका थीं सोनिया की पहली पसंद। लेकिन कतिपय कारणों से ये हो न सका। इसलिए सोनिया गांधी पुत्र मोह में फंसी हैं, ये कहना और मान लेना कांग्रेस की अंदरूनी घेरों को अति सरलीकृत तौर पर देखना होगा। 129 साल पुरानी पार्टी के तीन गांधियों के आपसी रिश्तों की परतें प्याज़ के छिलके की तरह हैं। जितना मर्ज़ी छीलते जाओ, अंत में छिलका ही हाथ लगेगा। इसी क्रम में आंखों से आंसू निकल आएगा, सो अलग। आइए थोड़ा सिलसिलेवार ढंग से समझने की कोशिश करते हैं।

पहले 2004 में चलते हैं। एनडीए 6 साल के अपने शासन के बाद शाइनिंग इंडिया के स्लोगन के साथ चुनाव में उतर रही थी। कांग्रेस को तनिक भी उम्मीद नहीं थी कि चुनाव में कहीं से भी यूपीए की सरकार बनने की कोई गुंजाइश है। पर पार्टी चुनाव में टक्कर में रहना चाहती थी। पार्टी को सोनिया का साथ तो था ही, लेकिन सोनिया अंदर से चाहती थीं कि कमान गांधी परिवार की नई पीढ़ी को सौंपने का वक्त आ गया है। सुनने में ये अजीब लग सकता है कि जब पार्टी की जीत का भरोसा न हो, तो फिर सोनिया अपनी संतान को क्यों दांव पर लगाना चाहेगी। लेकिन तब सोनिया की सोच कुछ अलग थी। उन्हें आगे के लिए कांग्रेस का नेतृत्व तैयार करना था।

आम चुनाव किसी नए नेतृत्व को उभारने का सबसे बेहतरीन मौक़ा होता है। सोनिया इसी मौक़े का इस्तेमाल करना चाहती थीं। अटल-आडवाणी के बरख़िलाफ अपनी अगली पीढ़ी को पेश कर वो एक मज़बूत संदेश देना चाहती थी। वे ये भी जताना चाहती थीं कि चुनाव से पहले ही हार मानना उनकी फितरत में नहीं। वो टक्कर देना और टक्कर लेना चाहती थी।

गांधी परिवार के क़रीबी रहे एक सूत्र के मुताबिक़ सोनिया गांधी ने प्रियंका गांधी को बुलाकर अपने मन की बात बताई। सलाह-मशविरा किया और प्रियंका को मैदान में आने को कहा। लेकिन प्रियंका ने बहुत ही सोचकर मना कर दिया। जिस प्रियंका के बारे में ख़ुद राजीव गांधी कह चुके हों कि शुरुआती उम्र से ही वो राजनीतिक गहराईयों को समझने लगीं थीं, भला एक ऐसे समय में अपना चेहरा आगे क्यों करती, जब हाथ जलने का पूरा ख़तरा था। पूरी कांग्रेस के साथ-साथ प्रियंका को भी इस बात का तनिक भी भरोसा नहीं था कि कहीं से भी कांग्रेस के नेतृत्व में कोई सरकार बन सकती है। प्रियंका के इसी आकलन ने प्रियंका-सोनिया-राहुल के बीच राजनीति का ऐसा त्रिकोण बना दिया, जिसके हर कोण की चुभन आज भी रह-रहकर पार्टी को हो रही है।

प्रियंका के मना करने के बाद सोनिया ने और कोई चारा न देख राहुल गांधी के सामने चुनाव लड़ने का प्रस्ताव रखा। मां की इच्छा को राहुल टाल नहीं पाए। वे आए और अमेठी से मैदान में उतार दिए गए। 2004 में कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए वन बनना किसी चमत्कार से कम नहीं था। राहुल गांधी संसद में दस्तक दे चुके थे, लेकिन लालन के पांव अभी पालन से निकले ही थे। ज़ाहिर है उनसे अभी ऐसी राजनीतिक परिपक्वता की उम्मीद बेमानी थी, जिसको आधार बना कर उन्हें शासन सत्ता सौंप दी जाए।

ये सोनिया के आसपास की उस मंडली को भी मंज़ूर नहीं होता, जो बेशक 10, जनपथ के सामने अपना सब कुछ न्यौछावर करने को तैयार दिखते हों, लेकिन अंदर ही अंदर अपनी महत्वाकांक्षा भी लेकर चलते हों। राहुल तो वैसे भी मां की इच्छा पूरी करने के लिए चुनाव में कूदे थे, सो उनमें प्रधानमंत्री पद की कोई ललक पैदा नहीं हुई थी। सोनिया, राहुल पर एकदम से इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी डालने की जोख़िम भी नहीं लेना चाहती थीं। सोनिया पर ख़ुद दबाव था प्रधानमंत्री बनने का। वे प्रधानमंत्री बनते-बनते क्यों रह गईं, ये एक सर्वविदित तथ्य है।

ख़ैर। मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने। यूपीए वन के बाद यूपीए टू भी बनी। पर राहुल सत्ता से दूर रहे। बीच-बीच में उन्हें सत्ता सौंपने का ज़िक्र उठता रहा। पर प्रधानमंत्री तो दूर, मंत्री तक बनने से बचते रहे। कई इसे 10, जनपथ के बलिदान की तरह पेश करने की कोशिश करते हैं। लेकिन यहां भी स्थिति प्याज़ के छिलके वाली ही थी। छीलने पर क्या निकलेगा पता नहीं। सोनिया से राहुल पर ज़िम्मेदारी डाली नहीं गई या राहुल ने ज़िम्मेदारी उठाने के लिए कोई भरसक कोशिश नहीं की। बड़ा सवाल गठबंधन दलों के नेताओं के बीच उनकी स्वीकार्यता का जितना था, उतना ही कांग्रेस के पुराने दिग्गजों के बीच भी उनको अपना समझे जाने का था।

इसके बाद आता है 2014 का चुनाव, जहां राहुल का चेहरा आगे करने के बाद भी कांग्रेस 44 सीटों पर सिमट कर रह जाती है। उसके पहले और बाद के विधानसभा चुनावों में भी कांग्रेस लगातार गोते लगाती गई है। पिछले 10 साल में राहुल की जो टीम बनी है, वो इस तरह की हार के लिए उस टीम पर उंगुली उठाती रही है, जो सोनिया गांधी के आसपास बनी है। बेशक सोनिया ने उसे नहीं बनाया हो, लेकिन सोनिया उस टीम के सुझाव और सहयोग के बिना चल भी नहीं सकती। टीम राहुल और टीम सोनिया के बीच के टकराव की यही स्थिति गहराती चली गई है। सोनिया के स्वास्थ्य और सक्रियता में कमी को आधार मानकर टीम राहुल हर बड़े फ़ैसले राहुल के हाथों चाहती है, लेकिन दूरंदेशी पुराने सिपहसालार सोनिया को सजग रखने में एक हद तक अभी तक कामयाब रहे हैं।

टीम सोनिया, सोनिया को ये समझाने में एक हद तक क़ामयाब रही है कि राहुल पूरी ज़िम्मेदारी नहीं उठा सकते। इसलिए एक वक्त राहुल के पीछे खुलकर खड़ीं सोनिया समय-समय पर अपने रिजर्वेशन्स भी दिखाती रहीं हैं। वे एक तरफ जहां अपने पुराने गार्ड्स को राहुल के कोप से बचाती हुईं चलती नज़र आ रही हैं, वहीं दूसरी तरफ वो राहुल की क़ाबिलियत पर ख़ुद शक करती नहीं दिखना चाहती हैं। ऐसा नहीं है कि सोनिया ने राहुल को खुलकर फ़ैसला लेने-देने की आज़ादी नहीं दी। लोकसभा चुनाव के चाहे 15 सीटों पर प्राइमरीज का प्रयोग हो या हाल के दिल्ली विधानसभा में अंतिम समय में अजय माकन का चेहरा आगे कर चुनाव लड़ने का फ़ैसला, राहुल की पहल कहीं भी रंग लाती प्रतीत नहीं हुईं हैं। यही वजह है कि सांगठनिक चुनाव 'लोकतांत्रिक' तरीक़े से कराने के राहुल के आग्रह को अब ज़िद के तौर पर देखा जाने लगा है और पार्टी के भीतर इसे लेकर कोई उत्साह नज़र नहीं आता। सोनिया को इस सच्चाई का बख़ूबी एहसास है। एक मां के तौर पर बेशक उन्हें अपने बेटे में अपार संभावनाएं दिख रहीं हो, लेकिन एक राजनीतिक मां के तौर पर वे अपने बेटे को अच्छी तरह पढ़ चुकी हैं। लेकिन सोनिया के साथ मजबूरी ये है कि अब वो गोल पोस्ट नहीं बदल सकती। राहुल की जगह अब वे फिर से प्रियंका का दरवाज़ा नहीं खटखटा सकती।

प्रियंका घोषित तौर पर बच्चों और परिवार के प्रति अपनी ज़िम्मेदारियों का हवाला देकर बेशक राजनीति से दूर ही रहने की बात करती हों, लेकिन अंदरखाने की जानकारी ये है कि अब वे इसके लिए ख़ुद को मानसिक तौर पर तैयार करने लगी हैं। समस्याएं दो हैं। न तो भाई का जूठन खाना चाहती हैं, और न ही भाई की पूरी थाली ही छीनते दिखना चाहती हैं। ये भी कि जिस मां के शुरुआती ऑफर को ठुकरा दिया था, अब उस मां से मौक़ा कैसे हासिल करना है। और प्रियंका की फ़ितरत ऐसी है कि वो कुछ भी आधा-अधूरा नहीं चाहती हैं। जब स्टेज पूर सेट हो, तो वो गाज़े-बाजे के साथ अवतरित होना चाहती हैं। और जब तक ऐसा नहीं हो जाता, वो एक बहन के तौर पर भाई की हर राजनीतिक समस्या को सुलझाने में लगातार संतुलित भूमिका निभाते दिख रही हैं। तभी जब राहुल चुनावी हार के बाद पार्टी के कई पुराने नेताओं से नाराज़ होते हैं, तो पंचायत प्रियंका के सामने लगती है और वे मध्यस्थ के तौर पर दर्रे को पाटने की कोशिश करती नज़र आती हैं। वो किसी भी तरह से मां को नाराज़ कर या उनकी न सुनती नज़र आकर भारतीय जनमानस में बनी मां की भरोसेमंद और क़र्तव्यपालक बेटी की छवि को तोड़ भविष्य के लिए अपना नुकसान नहीं करना चाहतीं।

एक समस्या सोनिया के सामने भी है। प्रियंका के हाथ में कमान जाते ही 10, जनपथ पर ताला पड़ना तय है। सोनिया के अकेले पड़ने का ख़तरा होगा। पार्टी के वो तमाम दिग्गज जो अभी सोनिया के सामने शीश नवाते हैं, पार्टी की कमान खिसकते ही प्रियंका की जी-हज़ूरी में लग जाएंगे। कुल मिला कर माता-पुत्री के बीच उसी तरह की खींचतान हो सकती है, जैसे राजनीति में अक्सर पिता-पुत्र के बीच देखने को मिलती रही है।

जबकि राहुल को पूरा कमान देकर भी सोनिया उस पर अपना एक स्वाभाविक दख़ल रख सकती है। उन्हें भरोसा है कि राहुल मां के तौर पर मार्गदर्शक की भूमिका में उन्हें हमेशा रखेंगे न कि आडवाणी की तरह की मार्गदर्शक की भूमिका में धकेल देंगे। इसलिए ये पुत्र-मोह नहीं है, राहुल, सोनिया की मजबूरी का नाम है। इसलिए बेटे के छुट्टी से लौट कर आने का इंतज़ार है।

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